उत्तराखंड की रियल एस्टेट इंडस्ट्री पर शिकंजा या अंडरवर्ल्ड का साम्राज्य?धामी सरकार की सख्ती के बीच उठे बड़े सवाल, क्या कॉलोनाइजरों की ईडी-सीबीआई जांच से खुलेंगे अरबों के काले खेल?

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उत्तराखंड में वर्षों से “सपनों का घर” बेचने के नाम पर चल रहे रियल एस्टेट कारोबार पर अब बड़ा सवाल खड़ा हो चुका है। फ्लैट बेचकर करोड़ों रुपये समेटना, परियोजनाएं अधूरी छोड़ देना, खरीदारों को बैंक कर्ज और ईएमआई के बोझ में डुबो देना और फिर कार्यालय बंद कर गायब हो जाना — यह सब अब सिर्फ उपभोक्ता विवाद नहीं बल्कि संगठित आर्थिक अपराध की शक्ल लेने लगा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


अब प्रदेश की उत्तराखंड रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) ने जिस प्रकार हर परियोजना का अनिवार्य बीमा, एस्क्रो निगरानी और रिजर्व सेफ्टी फंड जैसी व्यवस्था लागू करने की तैयारी शुरू की है, उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि सरकार अब केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बिल्डरों की पूरी आर्थिक संरचना को नियंत्रण में लेने की तैयारी में है।
लेकिन असली सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बिल्डर पैसा लेकर क्यों भाग रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर कुछ वर्षों में ही मामूली आय वाले लोग अरबों की संपत्ति के मालिक कैसे बन गए? आखिर कैसे उत्तराखंड बनने के बाद अचानक जमीन कारोबार में ऐसे चेहरे उभरे जिनकी पृष्ठभूमि पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं?
क्या रियल एस्टेट की आड़ में काले धन का खेल?
प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों विशेषकर रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, हरिद्वार और देहरादून में पिछले डेढ़ दशक में कॉलोनाइजिंग का जो विस्फोट हुआ, उसने जमीन की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया। लेकिन स्थानीय लोगों के बीच लगातार यह चर्चा भी रही कि इस कारोबार में सिर्फ वैध निवेश नहीं, बल्कि संदिग्ध धन भी लगाया गया।
सूत्रों की मानें तो कई ऐसे कॉलोनाइजर और बिल्डर सामने आए, जो कभी मामूली नौकरी करते थे, कुछ पर विभागीय कार्रवाई हुई, कुछ बर्खास्त कर्मचारी रहे, लेकिन देखते ही देखते आलीशान फार्महाउस, लग्जरी गाड़ियां, बाहरी राज्यों और विदेशों में निवेश तथा अरबों की जमीनों के मालिक बन बैठे।
यहीं से सवाल उठता है — क्या यह सिर्फ व्यापारिक सफलता थी या फिर इसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक नेटवर्क काम कर रहा था?
“अंडरवर्ल्ड की दस्तक” की चर्चाएं क्यों?
उत्तराखंड लंबे समय तक शांत प्रदेश माना जाता रहा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मैदानी क्षेत्रों से अवैध हथियार, नशे के नेटवर्क, भूमि कब्जे, फर्जी रजिस्ट्री और भू-माफिया से जुड़े कई मामले सामने आए। रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों में समय-समय पर हथियारों की बरामदगी, ड्रग्स नेटवर्क और जमीन विवादों ने यह आशंका पैदा की कि कहीं रियल एस्टेट सेक्टर अवैध धन को सफेद करने का माध्यम तो नहीं बन रहा।
हालांकि बिना आधिकारिक जांच या प्रमाण के किसी व्यक्ति या समूह को अपराधी कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि रियल एस्टेट सेक्टर लंबे समय से देशभर में काले धन की सबसे बड़ी खपत वाले क्षेत्रों में माना जाता रहा है।
इसीलिए अब मांग उठ रही है कि केवल रेरा की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। जिन परियोजनाओं में हजारों करोड़ का निवेश हुआ, वहां धन के स्रोत, बैंकिंग लेनदेन, शेल कंपनियों और बेनामी संपत्तियों की भी गहन जांच होनी चाहिए।
खरीदारों का पैसा बना “ओपन एटीएम”
रेरा की जांचों में यह सामने आया कि खरीदारों से ली गई रकम का उपयोग उसी परियोजना में नहीं किया गया। नियमों के अनुसार 70 प्रतिशत राशि एस्क्रो खाते में रहनी चाहिए थी, लेकिन कई मामलों में उसी धन से नई जमीनें खरीदी गईं, दूसरे प्रोजेक्ट लॉन्च किए गए और निजी ऐशोआराम पर पैसा खर्च हुआ।
अब प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार:
खरीदारों की रकम नियंत्रित एस्क्रो खाते में जाएगी
निर्माण प्रगति के आधार पर ही निकासी होगी
इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और रेरा की संयुक्त निगरानी रहेगी
हर लेनदेन का डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा
खरीदार ऑनलाइन ट्रैक कर सकेंगे कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है
यदि यह मॉडल सख्ती से लागू हुआ तो पहली बार बिल्डरों के लिए खरीदारों की पूंजी को निजी “एटीएम” की तरह इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा।
बीमा सुरक्षा से बदलेगा पूरा खेल
रेरा अब हर परियोजना के लिए बीमा सुरक्षा मॉडल पर भी काम कर रहा है। यदि बिल्डर भाग जाए, दिवालिया हो जाए या परियोजना अधूरी छोड़ दे, तो बीमा कंपनी खरीदारों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।
यह व्यवस्था लागू होने पर:
खरीदारों की रकम सुरक्षित रह सकेगी
परियोजना पूरी कराने की जवाबदेही तय होगी
निर्माण गुणवत्ता पर भी क्लेम संभव होगा
विलंब होने पर वित्तीय दंड लागू हो सकेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम उत्तराखंड के रियल एस्टेट सेक्टर में ऐतिहासिक बदलाव ला सकता है।
सिर्फ बिल्डर नहीं, पूरा गठजोड़ जांच के दायरे में आए
सबसे गंभीर सवाल उन तकनीकी और प्रशासनिक तंत्रों पर भी उठ रहे हैं, जिनकी आंखों के सामने विवादित जमीनों, अधूरी सुविधाओं और नियमों के उल्लंघन के बावजूद परियोजनाएं आगे बढ़ती रहीं।
कई मामलों में आरोप लगे कि:
नक्शे बदले गए
पार्किंग और सार्वजनिक भूमि बेची गई
हरित क्षेत्र समाप्त किए गए
खरीदारों को भ्रमित करने वाले विज्ञापन दिए गए
परियोजना धन दूसरी जगह ट्रांसफर किया गया
ऐसे में अब यह मांग तेज हो रही है कि केवल बिल्डरों पर कार्रवाई नहीं, बल्कि उन अधिकारियों, तकनीकी एजेंसियों और फाइनेंसरों की भूमिका भी जांची जाए जिन्होंने इस व्यवस्था को फलने-फूलने दिया।
ईडी और सीबीआई जांच की उठती मांग
जनता के बीच अब यह धारणा तेजी से बन रही है कि कुछ बड़े कॉलोनाइजरों की आर्थिक जांच से चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। मांग उठ रही है कि:
प्रवर्तन निदेशालय (ED) धनशोधन और बेनामी संपत्तियों की जांच करे
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) परियोजनाओं, फर्जी कंपनियों और संभावित संगठित नेटवर्क की जांच करे
संदिग्ध विदेशी निवेश और हवाला लेनदेन की पड़ताल हो
शेल कंपनियों और बेनामी जमीनों का खुलासा किया जाए
हालांकि किसी भी व्यक्ति या संस्था पर आरोप साबित होने से पहले उन्हें दोषी मानना उचित नहीं है, लेकिन यदि जांच एजेंसियां निष्पक्षता से पड़ताल करें तो प्रदेश के रियल एस्टेट सेक्टर की कई परतें खुल सकती हैं।
“ब्रोशर राज” का अंत?
अब तक उत्तराखंड में चमकदार विज्ञापन, लॉन्चिंग पार्टियां और बड़े-बड़े वादों के सहारे करोड़ों रुपये की बुकिंग होती रही। खरीदार केवल भरोसे पर पैसा लगाता था। लेकिन अब संकेत साफ हैं कि सरकार और रेरा यह संदेश देना चाहते हैं:
“अगर सपने बेचने हैं, तो सुरक्षा की गारंटी भी देनी होगी।”
उत्तराखंड के लिए यह सिर्फ रियल एस्टेट सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक पारदर्शिता की बड़ी परीक्षा भी है। आने वाला समय तय करेगा कि यह कार्रवाई केवल कागजी सुधार बनकर रह जाती है या वास्तव में बिल्डर-माफिया, काले धन और संगठित आर्थिक अपराध के गठजोड़ पर निर्णायक प्रहार साबित होती है।


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