प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज गुजरात के ऐतिहासिक सोमनाथ मंदिर में आयोजित भव्य सोमनाथ अमृत महोत्सव में शामिल हुए. यह आयोजन सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया जा रहा है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं और गुजरात के लोगों में खास उत्साह देखने को मिला.मंदिर परिसर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है और कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं.

Spread the love

इस विशेष अवसर पर देश के 11 पवित्र तीर्थ स्थलों से लाए गए जल से विशेष कुंभाभिषेक किया गया. मंदिर परिसर में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ध्वजारोहण समारोह भी आयोजित हुआ. पूरे वातावरण में भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष अनुभव देखने को मिला.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

पीएम मोदी ने कहा, सोमनाथ यह केवल एक मंदिर का नाम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस अमिट चेतना का प्रतीक है जिसने सदियों के संघर्ष, आक्रमण और विनाश के बावजूद कभी हार नहीं मानी. गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर आज भी सनातन धर्म की अदम्य शक्ति, आस्था और भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान का जीवंत प्रमाण बनकर खड़ा है. प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित यह धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र है.

इतिहास गवाह है कि सोमनाथ मंदिर को कई बार तोड़ा गया, लूटा गया और मिटाने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार यह पहले से अधिक भव्य रूप में पुनर्जीवित हुआ. यही कारण है कि सोमनाथ हमारा स्वाभिमान केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष माना जाता है.

प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में विशेष पहचान

सोमनाथ मंदिर गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित है और इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है. पुराणों के अनुसार चंद्रदेव ने यहां सबसे पहले सोने का मंदिर बनवाया था. इसके बाद रावण ने चांदी का मंदिर और भगवान कृष्ण ने चंदन से बने मंदिर का निर्माण कराया था. बाद के समय में कई राजाओं ने पत्थरों से इसका पुनर्निर्माण करवाया.

यह स्थान केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं था, बल्कि व्यापार, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रमुख केंद्र भी माना जाता था. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते थे और मंदिर की समृद्धि की चर्चा पूरे विश्व में होती थी.

बार-बार हुए आक्रमण, लेकिन नहीं टूटा विश्वास

सोमनाथ मंदिर का इतिहास संघर्षों और पुनर्निर्माण की लंबी गाथा से भरा हुआ है. विदेशी आक्रमणकारियों ने मंदिर की संपदा और हिंदुओं की आस्था को निशाना बनाते हुए इसे कई बार ध्वस्त किया. 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला कर इसे लूटा और भारी विनाश किया. इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब जैसे कई शासकों ने भी मंदिर को निशाना बनाया. इतिहासकारों के अनुसार मंदिर को 16 से 17 बार तोड़ा गया, लेकिन हर बार भारतीयों ने अपनी आस्था और आत्मबल से इसे फिर खड़ा किया. आक्रमणकारियों ने मंदिर की संरचना को नुकसान पहुंचाया, लेकिन लोगों के हृदय में बसे भगवान महादेव के विश्वास को कभी समाप्त नहीं कर सके.

सरदार पटेल के संकल्प से हुआ पुनर्निर्माण

स्वतंत्रता के बाद सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटनाओं में माना जाता है. जूनागढ़ के भारत में विलय के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल प्रभास पाटन पहुंचे और समुद्र का जल हाथ में लेकर मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया. उनके इस निर्णय को महात्मा गांधी और कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का भी समर्थन मिला. यह केवल मंदिर निर्माण नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का प्रतीक माना गया.

कब हुई प्राण प्रतिष्ठा

11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा की थी. उस अवसर पर उन्होंने इसे अतीत के अपमान पर भविष्य के गौरव की जीत बताया था. यह क्षण स्वतंत्र भारत के लिए ऐतिहासिक माना गया, जब देश ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का संदेश दिया.

स्थापत्य कला में दिखती है भव्यता

वर्तमान सोमनाथ मंदिर चालुक्य शैली यानी कैलाश महामेरु प्रासाद शैली में निर्मित है. समुद्र किनारे स्थित इसकी भव्य संरचना और ऊंचा शिखर इसे विशेष पहचान देते हैं. मंदिर परिसर में स्थित बाण स्तंभ भी आकर्षण का केंद्र है. यह स्तंभ दर्शाता है कि सोमनाथ और दक्षिणी ध्रुव के बीच कोई भू-भाग नहीं है. इसे भारतीयों के प्राचीन वैज्ञानिक और भौगोलिक ज्ञान का अद्भुत उदाहरण माना जाता है.

नया भारत और विकसित होता सोमनाथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ मंदिर परिसर का लगातार विकास किया जा रहा है. इसे धार्मिक स्थल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय आध्यात्मिक और पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित किया जा रहा है. प्रसाद योजना के तहत बनाए गए नए कॉरिडोर, समुद्र दर्शन पथ और डिजिटल संग्रहालय श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भारत के गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का काम कर रहे हैं.


Spread the love