उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जनपद के रुद्रपुर ब्लॉक स्थित किच्छा विधानसभा में जवाहर नगर गांव इन दिनों जल जीवन मिशन की विफलताओं और कथित भ्रष्टाचार को लेकर चर्चा के केंद्र में है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गांव के रूप में पहचाने जाने वाले इस क्षेत्र में “हर घर नल” योजना के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए गए, पाइपलाइनें बिछाई गईं, नई पानी की टंकी का निर्माण हुआ और घर-घर कनेक्शन देने का दावा किया गया। सरकारी फाइलों में विकास की तस्वीर चमकती दिखाई गई, मगर जमीन पर हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं। गांव के लोगों का आरोप है कि जिस नई टंकी से शुद्ध पेयजल की आपूर्ति होनी थी, वह निर्माण पूरा होने के तुरंत बाद ही टपकने लगी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
पाइपलाइनें जगह-जगह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, पुराने कनेक्शनों से गंदा पानी आ रहा है और पूरी योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती दिखाई दे रही है।
ग्रामीणों के अनुसार पूर्व प्रधान के कार्यकाल में जल जीवन मिशन के अंतर्गत बड़े स्तर पर निर्माण कार्य कराए गए। गांव में नई टंकी बनाई गई, घरों तक पाइपलाइन डाली गई और लोगों को भरोसा दिलाया गया कि अब उन्हें सालों पुरानी पेयजल समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। कुछ समय तक लोगों ने इसे गांव के विकास की दिशा में बड़ा कदम माना। मगर जब टंकी में पहली बार पानी भरा गया तो उसकी दीवारों से रिसाव शुरू हो गया। धीरे-धीरे स्थिति ऐसी बन गई कि टंकी उपयोग के लायक ही नहीं बची। आज हालत यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनी यह संरचना गांव के बीच खड़ी होकर सरकारी लापरवाही और निर्माण में कथित अनियमितताओं की कहानी बयान कर रही है।
वर्तमान ग्राम प्रधान तारा पांडे ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया। उन्होंने संबंधित विभागों को जानकारी दी कि नई टंकी में लगातार रिसाव हो रहा है और गर्मी शुरू होने के बावजूद गांव को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा। शिकायत मिलने के बाद विभागीय अधिकारी गांव पहुंचे। निरीक्षण के दौरान जलापूर्ति, पाइपलाइन, पुरानी टंकी और नई टंकी की स्थिति पर चर्चा हुई। ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने खुलकर अपनी समस्याएं रखीं। लोगों का कहना था कि गांव में वर्षों से पानी की समस्या बनी हुई है। पुराने कनेक्शनों से कभी कम दबाव में पानी आता है तो कभी कई दिनों तक सप्लाई बंद रहती है। कई जगह पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने के कारण गंदा और मटमैला पानी घरों तक पहुंच रहा है। इससे बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि नई टंकी निर्माण में भारी स्तर पर घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। सूत्रों के अनुसार निर्माण कार्य में निर्धारित मानकों का पालन नहीं हुआ। लोगों का कहना है कि लोहे की सरिया की गुणवत्ता कमजोर थी, बालू में अत्यधिक मिट्टी मिली हुई थी और सीमेंट की मात्रा भी मानकों के अनुरूप नहीं रखी गई। आरोप यह भी है कि निर्माण में खेतों से निकाली गई मिट्टी मिश्रित बालू का उपयोग किया गया, जिससे ढांचा मजबूत नहीं बन पाया। नतीजा यह हुआ कि टंकी पानी का दबाव सहन नहीं कर सकी और जगह-जगह से रिसाव शुरू हो गया।
यह मामला केवल एक टंकी तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि जवाहर नगर में पूर्व में हुए कई विकास कार्यों में भी अनियमितताएं हुईं। चाहे सड़क निर्माण हो, नालियों का निर्माण हो, सौर ऊर्जा से लाइटिंग की व्यवस्था हो या हैंडपंप लगाने की योजनाएं, हर जगह गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे हैं। लोगों का आरोप है कि सरकार से जारी धनराशि का बड़ा हिस्सा धरातल पर दिखाई नहीं देता। गांव में चर्चा है कि विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए, मगर सुविधाएं अधूरी और खराब गुणवत्ता की मिलीं।
जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण भारत को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना को देश के गांवों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने की दिशा में ऐतिहासिक पहल बताया था। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी और ग्रामीण राज्य में यह योजना और भी महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि यहां लंबे समय से पेयजल संकट बड़ी समस्या रहा है। मगर जवाहर नगर का मामला यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर योजनाओं का लाभ जनता तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा। यदि निर्माण कार्य शुरू होने के कुछ समय बाद ही ढहने लगें तो यह केवल तकनीकी विफलता नहीं मानी जा सकती। यह प्रशासनिक जवाबदेही, निगरानी व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया था, मगर महीनों बीतने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। नई टंकी अभी तक चालू नहीं हो सकी। गांव के लोग पुराने और जर्जर सिस्टम के सहारे पानी लेने को मजबूर हैं। गर्मी बढ़ने के साथ संकट और गंभीर हो गया है। कई परिवारों को पानी भरने के लिए दूर जाना पड़ता है। महिलाएं और बुजुर्ग सबसे अधिक परेशान हैं।
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर पहलू जवाबदेही का अभाव है। यदि किसी निर्माण में तकनीकी त्रुटि हुई तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है? निर्माण एजेंसी की, संबंधित इंजीनियरों की, विभागीय अधिकारियों की या उस समय के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की? यह सवाल आज गांव का हर व्यक्ति पूछ रहा है। लोगों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी टंकी उपयोग के योग्य नहीं रही तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। निर्माण कार्य से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। टेंडर प्रक्रिया, सामग्री की गुणवत्ता, भुगतान और तकनीकी स्वीकृतियों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में गुणवत्ता नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। निर्माण के दौरान नियमित तकनीकी निरीक्षण, सामग्री की लैब जांच और कार्य पूर्ण होने के बाद सुरक्षा परीक्षण अनिवार्य होते हैं। यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ तो यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानी जाएगी। जवाहर नगर का मामला इस बात का उदाहरण बनता जा रहा है कि यदि निगरानी कमजोर हो तो विकास योजनाएं जनता के लिए राहत के बजाय परेशानी का कारण बन सकती हैं।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी आक्रोश है कि पुरानी टंकी की नियमित सफाई वर्षों से नहीं हुई। इससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। पाइपलाइन लीकेज के कारण दूषित पानी सप्लाई होने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। कई परिवारों ने त्वचा रोग और पेट संबंधी बीमारियों की आशंका भी जताई है। गांव के लोगों का कहना है कि पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा में लापरवाही सीधे जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ है।
राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ रहा है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि समय रहते जांच और कार्रवाई नहीं हुई तो इससे सरकार की छवि प्रभावित होगी। प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना को स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण नुकसान पहुंच रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार को चाहिए कि इस मामले में उच्च स्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो। जिन अधिकारियों और ठेकेदारों की निगरानी में यह निर्माण हुआ, उनकी भूमिका की जांच होनी चाहिए। यदि भ्रष्टाचार सिद्ध होता है तो संपत्ति की जांच और आर्थिक अनियमितताओं की पड़ताल भी जरूरी है।
जवाहर नगर का मामला केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह उन तमाम ग्रामीण क्षेत्रों की आवाज है जहां विकास योजनाओं के नाम पर कागजों में उपलब्धियां दिखाई जाती हैं, मगर जमीन पर जनता मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करती रहती है। सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट जारी होता है, उद्घाटन होते हैं, मगर जब निर्माण की गुणवत्ता कमजोर हो और निगरानी व्यवस्था निष्क्रिय हो जाए तो जनता का भरोसा टूटने लगता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं को राजनीतिक प्रचार के बजाय जनसेवा की भावना से लागू किया जाए। गांवों में बनने वाले हर निर्माण कार्य की सामाजिक ऑडिट हो, ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार दिए जाएं और स्थानीय जनता की शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई हो। यदि जवाहर नगर मामले में पारदर्शी जांच होती है और दोषियों पर कार्रवाई होती है तो यह पूरे प्रदेश के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। अन्यथा यह मामला सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रतीक बनकर रह जाएगा।
जवाहर नगर की टंकी का ढांचा । जवाहर नगर गांव के लोगों के टूटे विश्वास, अधूरे वादों और विकास की खोखली तस्वीर का प्रतीक बन चुकी है। जनता अब जवाब चाहती है — आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी गांव को शुद्ध पानी क्यों नहीं मिल पाया? जिम्मेदार कौन है? और कब तक ग्रामीण केवल आश्वासन सुनते रहेंगे?
