उत्तराखंड में अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट की दस्तक: ‘ऑपरेशन रेजपिल’ ने खोली देश की नई नार्को-चुनौती

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देहरादून के सहसपुर स्थित एक साधारण दिखने वाले औद्योगिक परिसर से निकली कहानी अब केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रही। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के ‘ऑपरेशन रेजपिल’ ने उस भयावह सच्चाई को उजागर किया है, जिसमें उत्तराखंड की धरती का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क द्वारा प्रतिबंधित और बेहद खतरनाक मादक पदार्थ “कैप्टागन” बनाने के लिए किया जा रहा था। यह वही ड्रग है जिसे दुनिया के कई हिस्सों में “जिहादी ड्रग” या “वॉर ड्रग” के नाम से जाना जाता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


एनसीबी की जांच में सामने आया कि देहरादून के सहसपुर स्थित “ग्रीन हर्बल” फैक्ट्री को हाई-टेक ड्रग लैब में बदल दिया गया था। यहां से भारी मात्रा में रसायन, मशीनरी, कैप्सूल और पैकेजिंग सामग्री बरामद हुई। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस नेटवर्क में विदेशी नागरिकों की भूमिका भी सामने आई है, जिनमें सीरियाई नागरिक शामिल हैं।
यह खुलासा केवल एक फैक्ट्री या एक गिरोह की कहानी नहीं है। यह उस बड़े खतरे का संकेत है, जहां अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया अब उत्तराखंड जैसे शांत और धार्मिक राज्य को अपने सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखने लगे हैं।
क्या है कैप्टागन?
कैप्टागन मूल रूप से “फेनेथाइलाइन” नामक उत्तेजक रसायन पर आधारित ड्रग है। 1960 के दशक में इसे कुछ चिकित्सीय उपयोगों के लिए विकसित किया गया था, लेकिन बाद में इसके दुष्प्रभावों और लत की वजह से अधिकांश देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया।
आज अवैध बाजार में बिकने वाला कैप्टागन अक्सर कई खतरनाक रसायनों का मिश्रण होता है, जिसमें एम्फेटामाइन, कैफीन और अन्य सिंथेटिक पदार्थ शामिल होते हैं। यह ड्रग व्यक्ति को अस्थायी रूप से अत्यधिक ऊर्जा, आक्रामकता और जागरूकता का अनुभव कराता है। लंबे समय तक सेवन करने पर यह मानसिक विकार, हिंसक प्रवृत्ति, हार्ट अटैक और मौत तक का कारण बन सकता है।
क्यों कहा जाता है ‘जिहादी ड्रग’?
पिछले एक दशक में पश्चिम एशिया के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में इस ड्रग का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सामने आया। सुरक्षा एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि आतंकवादी संगठनों और लड़ाकों द्वारा कैप्टागन का उपयोग लंबे समय तक जागने, डर खत्म करने और हिंसक गतिविधियों के दौरान मानसिक उत्तेजना बनाए रखने के लिए किया जाता था।
सीरिया, लेबनान और मध्य-पूर्व के कई देशों में कैप्टागन की तस्करी अरबों डॉलर का अवैध कारोबार बन चुकी है। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इसे “नार्को-टेरर” की श्रेणी में देखने लगी हैं, क्योंकि इससे होने वाली कमाई का इस्तेमाल हथियारों और आतंकवादी गतिविधियों में भी होने की आशंका रहती है।
देहरादून तक कैसे पहुंचा यह नेटवर्क?
एनसीबी की जांच के अनुसार, दिल्ली में कैप्टागन की पहली बरामदगी के बाद एजेंसी ने जब नेटवर्क की तह तक जाना शुरू किया, तब उसके तार उत्तराखंड से जुड़ते चले गए। पूछताछ में गिरफ्तार सीरियाई नागरिक ने खुलासा किया कि देहरादून के सहसपुर स्थित “ग्रीन हर्बल” फैक्ट्री में यह ड्रग तैयार किया जा रहा था।
इसके बाद एनसीबी ने छापेमारी कर फैक्ट्री से अत्याधुनिक मशीनें, रसायन, कैप्सूल और पैकेजिंग सामग्री जब्त की। जांच में यह भी सामने आया कि फैक्ट्री मालिक कथित रूप से परिसर उपलब्ध कराने के एवज में प्रतिदिन 50 हजार रुपये तक ले रहा था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसी फैक्ट्री का नाम पहले भी नकली दवा निर्माण में सामने आ चुका था। दिसंबर 2024 में उत्तराखंड पुलिस ने यहां नकली दवाओं का भंडाफोड़ किया था। कार्रवाई के बाद परिसर सील हुआ, लेकिन बाद में कोर्ट के आदेश पर इसे फिर खोल दिया गया। अब वही परिसर अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट की प्रयोगशाला बन गया।
उत्तराखंड क्यों बन रहा है माफियाओं का नया ठिकाना?
विशेषज्ञ मानते हैं कि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक चुनौतियां इसे अपराधियों के लिए आकर्षक बना रही हैं।
राज्य की सीमाएं उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और नेपाल से जुड़ी हैं।
नेपाल सीमा लंबे समय से तस्करी और अवैध गतिविधियों के लिए संवेदनशील मानी जाती रही है।
पहाड़ी और दूरदराज के क्षेत्रों में निगरानी सीमित रहती है।
औद्योगिक क्षेत्रों में छोटी फैक्ट्रियों और गोदामों का इस्तेमाल अवैध गतिविधियों के लिए आसान माना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में नकली दवाओं, नशे, भूमि माफिया, हवाला और अवैध कारोबार के कई मामले सामने आए हैं। अब कैप्टागन जैसे अंतरराष्ट्रीय ड्रग का खुलासा यह संकेत देता है कि राज्य को केवल स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि वैश्विक अपराध नेटवर्क भी निशाना बना रहे हैं।
नकली दवा से ड्रग लैब तक का सफर
ग्रीन हर्बल फैक्ट्री का इतिहास अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
पहले नकली आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं के निर्माण के आरोप, फिर परिसर सील होना, और अब उसी जगह से अंतरराष्ट्रीय स्तर के सिंथेटिक ड्रग का उत्पादन — यह बताता है कि अवैध कारोबारी लगातार कानून की कमजोरियों का फायदा उठा रहे हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि ऐसे नेटवर्क पहले नकली दवाओं के कारोबार से शुरुआत करते हैं क्योंकि वहां पहले से रसायन, मशीनें और पैकेजिंग की व्यवस्था मौजूद रहती है। बाद में यही ढांचा सिंथेटिक ड्रग निर्माण में इस्तेमाल होने लगता है।
अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की आशंका
एनसीबी अब इस मामले को केवल स्थानीय अपराध नहीं मान रही। जांच का फोकस उन विदेशी कनेक्शनों पर है जो भारत में ड्रग निर्माण कर इसे दूसरे देशों तक पहुंचाने की योजना में शामिल हो सकते हैं।
कैप्टागन की मांग मध्य-पूर्व में बेहद अधिक है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि भारत को ट्रांजिट या प्रोडक्शन हब के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही थी।
भारत की फार्मास्युटिकल क्षमता, रसायनों की उपलब्धता और बड़े औद्योगिक नेटवर्क का दुरुपयोग अंतरराष्ट्रीय तस्कर कर सकते हैं। यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां इस मामले को बेहद गंभीरता से देख रही हैं।
युवाओं के लिए बड़ा खतरा
कैप्टागन जैसे सिंथेटिक ड्रग केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रहते। जब इनका उत्पादन किसी देश में शुरू होता है, तो धीरे-धीरे स्थानीय बाजार भी इसकी चपेट में आने लगता है।
उत्तराखंड के युवाओं में पहले ही स्मैक, चरस, गांजा और सिंथेटिक नशों की समस्या बढ़ती रही है। कॉलेजों, पर्यटन स्थलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में नशे की उपलब्धता लगातार चिंता का विषय बनी हुई है।
यदि कैप्टागन जैसे हाई-पावर ड्रग राज्य में फैलते हैं, तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं —
युवाओं में हिंसक प्रवृत्ति
मानसिक रोगों में वृद्धि
अपराध दर में बढ़ोतरी
ड्रग गैंग्स का विस्तार
परिवार और समाज का विघटन
क्या सिर्फ एनसीबी की कार्रवाई काफी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल छापेमारी और गिरफ्तारी से इस समस्या का समाधान संभव नहीं होगा। इसके लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है।

  1. औद्योगिक इकाइयों की कड़ी निगरानी
    छोटी फार्मा और हर्बल इकाइयों का नियमित ऑडिट जरूरी है।
  2. नेपाल सीमा पर सख्ती
    सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स और रसायनों की निगरानी बढ़ानी होगी।
  3. स्थानीय पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों का समन्वय
    एनसीबी, पुलिस, इंटेलिजेंस और ड्रग कंट्रोल विभाग के बीच रियल-टाइम सूचना साझा करनी होगी।
  4. युवाओं में जागरूकता
    स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी अभियान चलाना जरूरी है।
  5. राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण पर कार्रवाई
    अक्सर बड़े नेटवर्क बिना प्रभावशाली संरक्षण के नहीं चलते। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
    उत्तराखंड के लिए चेतावनी
    उत्तराखंड को लंबे समय तक “देवभूमि” और शांत पर्यटन राज्य के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह नशे, नकली दवाओं और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के मामले सामने आए हैं, वह गंभीर चेतावनी है।
    अगर समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में राज्य संगठित अपराध और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी का बड़ा केंद्र बन सकता है।
    यह मामला केवल एक फैक्ट्री का नहीं है। यह उस बदलते अपराध जगत की कहानी है, जहां माफिया अब धार्मिक, पर्यटन और औद्योगिक राज्यों को अपने गुप्त अड्डों में बदल रहे हैं।
    ‘ऑपरेशन रेजपिल’ ने पर्दा जरूर उठाया है, लेकिन सवाल अब भी कायम है — क्या उत्तराखंड और भारत की एजेंसियां इस बढ़ते “नार्को नेटवर्क” को समय रहते रोक पाएंगी, या फिर यह खतरा आने वाले समय में और गहरा होता जाएगा?

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