भाषा बचाने की मुहिम: दिल्ली में गूंज उठी गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी की मिठास

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नई दिल्ली के आया नगर में “मेरी भाषा मेरी पहचान” अभियान के तहत गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं की पहली कक्षा शुरू हुई। बच्चों और अभिभावकों में उत्साह दिखा। उद्देश्य नई पीढ़ी को मातृभाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं से जोड़ना है, ताकि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान भविष्य में भी सुरक्षित रह सके।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

भारत विविधताओं का देश है। यहां हर कुछ किलोमीटर पर बोली बदल जाती है, लोकगीतों की धुन बदल जाती है और संस्कृति का रंग नया रूप ले लेता है। यही विविधता भारत की असली ताकत है। लेकिन आधुनिकता, तकनीक और अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के बीच देश की कई क्षेत्रीय भाषाएं धीरे-धीरे अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। विशेष रूप से महानगरों में रहने वाली नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में यदि कोई पहल बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ने का कार्य करे, तो वह केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आंदोलन बन जाता है।
नई दिल्ली के आया नगर में “मेरी भाषा मेरी पहचान” अभियान के अंतर्गत गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाओं की प्रथम कक्षा का शुभारंभ इसी दिशा में एक प्रेरणादायक और ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है। यह कार्यक्रम केवल भाषा सिखाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का गंभीर प्रयास दिखाई दिया।
कार्यक्रम में बच्चों और अभिभावकों का उत्साह यह दर्शा रहा था कि लोग अपनी मातृभाषा से आज भी भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। वर्षों से महानगरों में रह रहे उत्तराखंडी परिवारों के मन में यह चिंता लगातार बनी हुई थी कि उनके बच्चे गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी बोलना तो दूर, समझना भी भूलते जा रहे हैं। ऐसे में इस पहल ने लोगों के भीतर एक नई आशा जगा दी है।
कार्यक्रम में दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुमन डोभाल, रोटरी क्लब गवर्नर अर्चना डोभाल, आईएमआई कॉलेज के रजिस्ट्रार राजेंद्र बोहरा तथा समाजसेवी लखीराम डिमरी सहित अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। इसके अतिरिक्त नीरज दसमाना, कमल रावत, प्रकाश जोशी, वीरेंद्र सिंह और अरुण बिष्ट की सक्रिय भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह अभियान समाज के सामूहिक सहयोग से आगे बढ़ रहा है।
इस पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि इसमें महिलाओं ने शिक्षिका और मार्गदर्शक के रूप में अग्रणी भूमिका निभाई। बीना तिवारी, कमला गोस्वामी, गायत्री धोनी, रेखा धोनी तथा अनामिका चौधरी ने बच्चों को मातृभाषा सिखाने का दायित्व संभाला। केंद्र प्रमुख अनीता जोशी के नेतृत्व में प्रथम कक्षा का सफल संचालन हुआ। यह दृश्य अपने आप में अत्यंत भावुक और प्रेरक था, जहां एक ओर बच्चे उत्सुकता से अपनी भाषा के शब्द सीख रहे थे और दूसरी ओर बुजुर्गों की आंखों में अपनी संस्कृति के भविष्य को लेकर संतोष दिखाई दे रहा था।
आज के दौर में भाषा  संवाद का माध्यम के साथ साथ हमारी पहचान, संस्कृति और सामाजिक स्मृति का आधार बन चुकी है। जब कोई समाज अपनी भाषा खो देता है, तो धीरे-धीरे उसकी लोककथाएं, गीत, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक विरासत भी कमजोर पड़ने लगती है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में स्थानीय भाषाओं के संरक्षण को लेकर बड़े स्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं।
उत्तराखंड की बात करें तो यहां की गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाएं सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन भाषाओं में लोकगीतों की मधुरता है, लोककथाओं की जीवंतता है और पहाड़ के संघर्षपूर्ण जीवन का अनुभव भी समाहित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हो रहे पलायन ने इन भाषाओं को चुनौती दी है। गांव खाली हो रहे हैं, लोग रोजगार के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं और नई पीढ़ी हिंदी तथा अंग्रेजी तक सीमित होती जा रही है।
दिल्ली, मुंबई, देहरादून, चंडीगढ़ और अन्य महानगरों में बसे उत्तराखंडी परिवारों में यह समस्या और अधिक गंभीर है। बच्चे घर में भी हिंदी या अंग्रेजी में बातचीत करते हैं। कई अभिभावक स्वयं भी यह महसूस करते हैं कि यदि अभी प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में गढ़वाली और कुमाऊनी केवल लोकगीतों और सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित होकर रह जाएंगी।
“मेरी भाषा मेरी पहचान” अभियान इसी चिंता से जन्मा एक सकारात्मक प्रयास है। यह पहल केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को अपनी लोकसंस्कृति से भावनात्मक रूप से जोड़ने का माध्यम बन रही है। भाषा सीखने के साथ-साथ बच्चे लोकगीत, पारंपरिक कहावतें, पहाड़ी रीति-रिवाज और सांस्कृतिक मूल्य भी सीखेंगे। यही इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत है।
कार्यक्रम में बच्चों के लिए बिस्कुट, फ्रूटी और पानी की व्यवस्था “नई सोच नई पहल” संस्था द्वारा की गई। साथ ही बच्चों को कॉपियां वितरित की गईं और प्योर ऑर्गेनिक बांस से बने टूथब्रश उपहार स्वरूप दिए गए। देखने में यह एक छोटा प्रयास लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह बच्चों के मन में अपनापन और उत्साह पैदा करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जब बच्चे सम्मान और प्रेम के वातावरण में सीखते हैं, तो उनका जुड़ाव और मजबूत होता है।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूरी तरह सामाजिक सहभागिता पर आधारित दिखाई देती है। यहां किसी सरकारी आदेश का दबाव नहीं, बल्कि समाज की स्वैच्छिक भागीदारी और सांस्कृतिक जिम्मेदारी का भाव नजर आता है। यही किसी भी जनआंदोलन की असली शक्ति होती है।
भारत में नई शिक्षा नीति भी मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि बच्चे अपनी मातृभाषा में बेहतर तरीके से सीखते और समझते हैं। मातृभाषा बच्चों के मानसिक विकास, भावनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत बनाती है। ऐसे में गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी जैसी भाषाओं को बच्चों तक पहुंचाना केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि शैक्षिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि इस प्रकार के अभियानों को लंबे समय तक चलाना आसान नहीं होता। इसके लिए नियमित संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक, पाठ्य सामग्री और समाज का निरंतर सहयोग आवश्यक होता है। अक्सर देखा गया है कि उत्साह के साथ शुरू हुई कई पहल समय के साथ कमजोर पड़ जाती हैं। इसलिए जरूरी है कि इस अभियान को केवल एक कार्यक्रम तक सीमित न रखा जाए बल्कि इसे संगठित और स्थायी स्वरूप दिया जाए।
यदि इस पहल को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जाए, तो भविष्य में दिल्ली सहित देश के अन्य शहरों में भी ऐसे भाषा केंद्र खोले जा सकते हैं। ऑनलाइन कक्षाओं, मोबाइल एप, डिजिटल सामग्री और सांस्कृतिक कार्यशालाओं के माध्यम से भी इसे व्यापक रूप दिया जा सकता है। उत्तराखंड सरकार, सांस्कृतिक संस्थाओं और प्रवासी उत्तराखंडी संगठनों को भी इस दिशा में सहयोग करना चाहिए।
भाषा संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती। यह समाज, परिवार और हर व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है। यदि घरों में माता-पिता बच्चों से अपनी मातृभाषा में बातचीत करें, लोकगीत सुनाएं और अपनी संस्कृति से परिचित कराएं, तो भाषा स्वतः जीवित रहती है। लेकिन जब परिवार स्वयं अपनी भाषा बोलने में संकोच करने लगते हैं, तब भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग अपनी मातृभाषा को पिछड़ेपन का प्रतीक मानने की बजाय गर्व और पहचान का विषय समझें। अंग्रेजी और हिंदी सीखना जरूरी है, लेकिन अपनी जड़ों से कट जाना कभी भी प्रगति नहीं हो सकती। दुनिया के विकसित देशों ने भी अपनी भाषाओं को बचाकर ही आधुनिकता को अपनाया है।
उत्तराखंड की भाषाएं केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे पहाड़ की आत्मा हैं। उनमें मां की लोरी है, खेतों की खुशबू है, लोकदेवताओं की आस्था है और संघर्षमय जीवन की प्रेरणा भी है। यदि ये भाषाएं कमजोर पड़ती हैं, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान से दूर हो जाएंगी।
आया नगर में शुरू हुई यह पहल इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह समाज को एक सकारात्मक संदेश देती है कि यदि इच्छा शक्ति हो तो भाषा और संस्कृति को बचाया जा सकता है। यह अभियान उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं।
कार्यक्रम के अंत में गूंजा यह संदेश वास्तव में पूरे अभियान की आत्मा है—
“अपनी भाषा – अपनी पहचान,
अपनी संस्कृति – अपना सम्मान।”
यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष है। यदि समाज इसी भावना के साथ आगे बढ़ता रहा, तो निश्चित रूप से गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी भाषाएं आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत बनी रहेंगी और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रहेगी।
इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि भाषा बचाने की लड़ाई अपनी पहचान, अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई होती है। नई दिल्ली से शुरू हुई यह छोटी सी कक्षा आने वाले समय में एक बड़े सांस्कृतिक आंदोलन का रूप ले सकती है। समाज को बस इसे निरंतर सहयोग और विश्वास के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।


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