तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना: उत्तराखंड की नदियां, उत्तराखंड की जमीन, फिर उत्तराखंड के हिस्से में क्या आया?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
गोपेश्वर में एनटीपीसी की 520 मेगावाट तपोवन-विष्णुगाड़ जलविद्युत परियोजना की हेड रेस टनल का सफल ब्रेकथ्रू बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अधिकारियों ने इसे तकनीकी सफलता बताया है और परियोजना को अंतिम चरण की ओर बढ़ता हुआ बताया है। सुरंगों का सटीक मिलन निश्चित रूप से इंजीनियरों की मेहनत का परिणाम है, जिसकी सराहना की जानी चाहिए।
परंतु उत्तराखंड की जनता के सामने एक बड़ा प्रश्न आज भी खड़ा है—क्या किसी परियोजना की सफलता केवल सुरंग, बांध और मेगावाट से मापी जाएगी, या उस राज्य के लोगों के जीवन में आए बदलाव से भी?
उत्तराखंड की नदियां वर्षों से देश को ऊर्जा दे रही हैं। पहाड़ अपनी जलधाराएं, जंगल और भूमि दे रहे हैं। गांव अपनी खेती, घर और पुश्तैनी जमीन छोड़ रहे हैं। बदले में उत्तराखंड को क्या मिला? यही प्रश्न तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना के साथ फिर सामने खड़ा है।
टिहरी बांध परियोजना को भी कभी विकास का प्रतीक बताया गया था। हजारों परिवारों ने अपने घर छोड़े। पुनर्वास और मुआवजे को लेकर वर्षों तक संघर्ष चला। आज भी अनेक प्रभावित परिवार अपने अधिकारों की बात करते हैं। यदि अतीत से सीख नहीं ली गई, तो क्या तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ रही है?
सबसे बड़ा प्रश्न स्थानीय रोजगार का है। सरकार और एनटीपीसी सार्वजनिक रूप से बताएँ कि परियोजना में कुल कितने कर्मचारी कार्यरत हैं? उनमें उत्तराखंड के कितने युवक-युवतियां हैं? स्थायी नियुक्तियों में स्थानीय युवाओं की हिस्सेदारी कितनी है? कितने तकनीकी पदों पर राज्य के युवाओं को अवसर मिला? यदि अधिकांश रोजगार बाहरी राज्यों के लोगों को मिला है, तो स्थानीय जनता इस परियोजना को अपनी उपलब्धि क्यों माने?
दूसरा प्रश्न बिजली का है। जिस राज्य की नदियों से बिजली पैदा हो रही है, क्या उसी राज्य के लोगों को सस्ती बिजली उपलब्ध होगी? क्या पहाड़ के गांवों को बिजली दरों में विशेष राहत मिलेगी? यदि उत्तराखंड की जनता सामान्य उपभोक्ताओं की तरह ही बिजली खरीदेगी, तो उसके प्राकृतिक संसाधनों का प्रत्यक्ष लाभ उसे कहाँ मिला?
तीसरा प्रश्न मुआवजे और पुनर्वास का है। जिन परिवारों ने भूमि दी, क्या उन्हें केवल चेक देकर जिम्मेदारी पूरी मान ली गई? कितने परिवारों को स्थायी आजीविका मिली? कितनों के बच्चों को नौकरी मिली? कितनों का पुनर्वास पूरी तरह हुआ? इन सवालों का उत्तर सरकार को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
चौथा प्रश्न पर्यावरण और आपदा सुरक्षा का है। हिमालय अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। वर्ष 2021 की आपदा ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था। ऐसे क्षेत्र में बड़े निर्माण कार्यों की निरंतर वैज्ञानिक निगरानी आवश्यक है। स्थानीय लोगों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि विकास उनकी सुरक्षा की कीमत पर नहीं हो रहा।
पाँचवाँ प्रश्न आर्थिक न्याय का है। यदि परियोजना का ठेका बाहरी कंपनियों को मिले, मशीनें बाहर से आएँ, विशेषज्ञ बाहर से आएँ, रोजगार बाहर के लोगों को मिले और लाभ भी मुख्य रूप से राज्य से बाहर जाए, तो उत्तराखंड के हिस्से में क्या बचता है? केवल सुरंग, धूल, विस्थापन और पर्यावरणीय जोखिम?
सरकार हर नई परियोजना को ऐतिहासिक उपलब्धि बताती है। पर जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर आँकड़े मांग रही है। कितनी मुफ्त बिजली राज्य को मिलेगी? परियोजना से राज्य को वार्षिक राजस्व कितना होगा? प्रभावित गांवों के विकास पर कितना खर्च हुआ? स्थानीय विद्यालयों, अस्पतालों और सड़कों पर परियोजना का कितना योगदान है? इन सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
यह भी आवश्यक है कि परियोजना से जुड़े सभी सामाजिक और आर्थिक आंकड़े जनता के लिए उपलब्ध हों। रोजगार की सूची, पुनर्वास की स्थिति, मुआवजे का विवरण, पर्यावरणीय अनुपालन रिपोर्ट और स्थानीय विकास कार्यों की जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर रखी जाए। पारदर्शिता से ही विश्वास पैदा होगा।
उत्तराखंड के लोगों की भावना स्पष्ट है। वे विकास के विरोधी नहीं हैं। वे चाहते हैं कि विकास का पहला अधिकार उन लोगों को मिले जिन्होंने अपनी जमीन, अपने संसाधन और अपना भविष्य इस परियोजना के लिए समर्पित किया है।
आज उत्तराखंड सरकार से कुछ सीधे प्रश्न हैं—
परियोजना में स्थानीय युवाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है?
क्या प्रभावित परिवारों के प्रत्येक पात्र सदस्य को रोजगार या आजीविका का अवसर मिला?
उत्तराखंड को कितनी मुफ्त बिजली मिलेगी?
क्या राज्य के उपभोक्ताओं के लिए बिजली दरों में कोई विशेष व्यवस्था होगी?
परियोजना से होने वाली आय का कितना हिस्सा स्थानीय विकास पर खर्च होगा?
पर्यावरणीय जोखिमों की स्वतंत्र निगरानी कौन करेगा?
यदि भविष्य में कोई आपदा या नुकसान होता है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
इंजीनियरिंग उपलब्धि स्वागतयोग्य है, पर विकास का अर्थ तभी पूर्ण होगा जब उत्तराखंड का युवा रोजगार पाए, प्रभावित परिवार सम्मानपूर्वक जीवन जीएँ, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ सबसे पहले उत्तराखंड की जनता को मिले।
अन्यथा जनता का प्रश्न बना रहेगा—उत्तराखंड की नदियां हमारी, पहाड़ हमारे, जमीन हमारी, विस्थापन हमारा, पर्यावरणीय जोखिम हमारे… फिर सबसे बड़ा लाभ किसके हिस्से में जा रहा है?
उत्तराखंड की नदियों से बन रही बिजली, फिर भी उपभोक्ताओं को राहत कब?
उत्तराखंड को देश की जलविद्युत राजधानी कहा जाता है। , , , , और जैसी बड़ी परियोजनाओं से हजारों मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। इन परियोजनाओं से राज्य सरकार को विभिन्न माध्यमों—जैसे जल उपयोग (रॉयल्टी) के रूप में मिलने वाली निःशुल्क बिजली, कर, शुल्क तथा अन्य राजस्व—से आय प्राप्त होती है। अधिकांश बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में राज्य को निर्धारित अवधि और परियोजना की शर्तों के अनुसार निःशुल्क बिजली का हिस्सा भी मिलता है, जिसका प्रतिशत परियोजना और समझौते के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
इसके बावजूद आम उपभोक्ताओं के बीच सवाल बना हुआ है कि यदि राज्य को जलविद्युत परियोजनाओं से राजस्व और निःशुल्क बिजली मिलती है, तो घरेलू बिजली दरों में अपेक्षित राहत क्यों दिखाई नहीं देती? लोगों का कहना है कि लगभग दस वर्ष पहले जहां कई परिवारों का मासिक बिजली बिल करीब 1,000 रुपये आता था, वहीं अब समान स्तर की खपत पर कई मामलों में बिल 3,000 रुपये के आसपास पहुंचने की शिकायतें सामने आती हैं।
उपभोक्ताओं की मांग है कि सरकार सार्वजनिक रूप से बताए कि जलविद्युत परियोजनाओं से राज्य को प्रतिवर्ष कुल कितना राजस्व प्राप्त होता है, कितनी निःशुल्क बिजली मिलती है, उसका उपयोग किस प्रकार किया जाता है और उसका लाभ आम उपभोक्ताओं तक क्यों नहीं पहुंच पाता। जनता का मानना है कि उत्तराखंड की नदियां, भूमि और पर्यावरणीय चुनौतियां यदि राज्य वहन कर रहा है, तो इन संसाधनों का प्रत्यक्ष लाभ भी सबसे पहले उत्तराखंड के नागरिकों को मिलना चाहिए।
