द्वाराहाट/अल्मोड़ा। उत्तराखंड सरकार ने मार्च 2025 में वन पंचायतों की भूमि पर आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी एवं हर्बल खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शासनादेश जारी किया था। इसके तहत 150 वन पंचायतों का चयन कर गैर-प्रकाष्ठ वन उपज, हर्बल एवं एरोमा टूरिज्म परियोजना लागू की जानी थी। शासनादेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि संबंधित प्रभागीय वनाधिकारी वन पंचायतों से आवेदन लेकर भौतिक निरीक्षण करें और पात्र प्रस्ताव 15 अप्रैल 2025 तक भेजें। एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अनेक वन पंचायत सरपंचों को इस योजना की जानकारी तक नहीं मिल सकी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
द्वाराहाट क्षेत्र में खोजबीन के दौरान 6 जुलाई को अल्मोड़ा डीएफओ कार्यालय से शासनादेश की प्रति प्राप्त होने के बाद यह मामला सामने आया। इसके बाद प्रस्तावित प्रगतिशील कृषक बहुउद्देशीय सहकारी समिति ने उपजिलाधिकारी द्वाराहाट को ज्ञापन देकर ब्लॉक स्तर पर ग्राम प्रधानों, वन पंचायत सरपंचों तथा कृषि, उद्यान, पशुपालन और वन विभाग के अधिकारियों की संयुक्त बैठक आयोजित कराने की मांग की है।
ज्ञापन में कहा गया है कि किसानों को सरकार की “खेत बचाओ योजना” तथा हर्बल मिशन की जानकारी, तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार व्यवस्था और उपलब्ध अनुदानों से अवगत कराया जाए। साथ ही सभी ग्राम सभाओं एवं वन पंचायतों का भूमि विवरण तथा ग्राम प्रधानों और वन पंचायत सरपंचों की सूची उपलब्ध कराने का भी अनुरोध किया गया है।
समिति का कहना है कि यदि सरकार की महत्वाकांक्षी योजना समय पर गांवों तक पहुंचाई जाती तो वन पंचायतों की भूमि पर औषधीय पौधों की खेती से ग्रामीणों की आय बढ़ती, पलायन पर रोक लगती और उत्तराखंड हर्बल उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन सकता था। अब मांग उठ रही है कि योजना के क्रियान्वयन में हुई देरी की जिम्मेदारी तय करते हुए प्रत्येक ब्लॉक में जनजागरूकता अभियान और संयुक्त बैठकें तत्काल आयोजित की जाएं।
