उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक पर लापता हुई रामनगर निवासी बबिता पांडे का मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आखिर आधी रात को गोई बेस कैंप से बबिता कैसे गायब हो गईं? क्या यह केवल एक दुर्घटना है या इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस ट्रेकिंग एजेंसी ने उन्हें भेजा, उसने फर्जी परमिट का इस्तेमाल क्यों किया? यदि क्यूआर कोड स्कैन करने पर पुराने ट्रेकर्स का डेटा सामने आ रहा था, तो सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी कहां थी?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
150 से अधिक जवानों की संयुक्त टीम कई दिनों से खोज अभियान चला रही है, लेकिन अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री राज्य को 12 महीने का एडवेंचर और इको-टूरिज्म हब बनाने, नई चोटियों को खोलने और साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या पर्यटन विस्तार से पहले सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना अधिक जरूरी नहीं है? बबिता पांडे का रहस्य केवल एक लापता व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि एडवेंचर पर्यटन की विश्वसनीयता पर भी बड़ा सवाल है।
