उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुई रामनगर निवासी बबिता पांडे का मामला अब केवल एक व्यक्ति के गुम होने की घटना नहीं रह गया है। यह प्रकरण उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रहे एडवेंचर पर्यटन, उसकी निगरानी व्यवस्था, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। जिस राज्य को देश और दुनिया के प्रमुख एडवेंचर टूरिज्म गंतव्यों में शामिल करने की महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई जा रही हैं, वहां इस तरह की घटनाएं पूरे तंत्र की तैयारियों की परीक्षा ले रही हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
प्राप्त जानकारी के अनुसार, बबिता पांडे अपने दो साथियों के साथ दयारा बुग्याल ट्रेक पर गई थीं। 29 मई की रात गोई बेस कैंप से उनके रहस्यमय ढंग से लापता होने की सूचना मिली। इसके बाद सेना, आईटीबीपी, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, पुलिस, वन विभाग और आपदा प्रबंधन की संयुक्त टीम द्वारा बड़े स्तर पर खोज अभियान चलाया जा रहा है। ड्रोन, खोजी कुत्तों और आधुनिक उपकरणों की सहायता से लगातार तलाश जारी है, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी कोई ठोस सुराग सामने नहीं आया है।
इस मामले को और गंभीर तब बना दिया जब जांच में सामने आया कि बबिता और उनके साथियों के नाम पर्यटन विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर दर्ज ही नहीं थे। आरोप है कि संबंधित ट्रेकिंग एजेंसी ने पुराने फिजिकल परमिट पर नए नाम चस्पा कर ट्रेकिंग की अनुमति दिलाई। क्यूआर कोड स्कैन करने पर पुराने ट्रेकर्स का रिकॉर्ड सामने आया। यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था के साथ गंभीर खिलवाड़ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी ट्रेकर का वैध रिकॉर्ड ही सरकारी सिस्टम में मौजूद नहीं था तो किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में उसकी पहचान और लोकेशन कैसे सुनिश्चित की जाती? खोज एवं बचाव अभियान के शुरुआती चरण में हुई देरी भी इसी अव्यवस्था की ओर संकेत करती है। यह स्थिति बताती है कि पर्यटन गतिविधियों के विस्तार के साथ-साथ निगरानी और सत्यापन तंत्र को समान गति से मजबूत नहीं किया गया।
उत्तराखंड सरकार लंबे समय से धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ एडवेंचर और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने की रणनीति पर काम कर रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य को बारह महीने सक्रिय रहने वाला पर्यटन केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है। सीमांत क्षेत्रों में एडवेंचर हब विकसित करने, नई पर्वत चोटियों को ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के लिए खोलने तथा हाई-एल्टीट्यूड मैराथन जैसी गतिविधियों की योजनाएं भी सामने आई हैं। इन पहलों का स्वागत होना चाहिए क्योंकि इससे रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग को नई ऊर्जा मिलेगी।
लेकिन विकास की इस दौड़ में सुरक्षा को पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। यदि एक ट्रेकिंग एजेंसी फर्जी परमिट के सहारे पर्यटकों को भेज सकती है तो यह केवल एक एजेंसी की गलती नहीं बल्कि निगरानी प्रणाली की कमजोरी भी है। सवाल यह भी है कि चेकपोस्ट पर क्यूआर कोड स्कैन होने के बावजूद विसंगति तत्काल क्यों नहीं पकड़ी गई? क्या निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गया है? क्या पर्वतीय क्षेत्रों में संचालित सभी ट्रेकिंग एजेंसियों का नियमित ऑडिट किया जाता है? यदि नहीं, तो अब इसकी आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
बबिता पांडे प्रकरण का एक मानवीय पक्ष भी है। एक परिवार अपनी बेटी की तलाश में दिन-रात उम्मीद लगाए बैठा है। खोज अभियान में जुटी एजेंसियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं, लेकिन समय बीतने के साथ चिंता बढ़ती जा रही है। ऐसे मामलों में केवल तकनीकी जांच ही नहीं बल्कि पारदर्शी संवाद भी जरूरी होता है ताकि परिवार और समाज दोनों को भरोसा मिल सके कि हर संभव प्रयास किया जा रहा है।
यह घटना राज्य सरकार, पर्यटन विभाग और ट्रेकिंग उद्योग के लिए चेतावनी है। एडवेंचर टूरिज्म का अर्थ केवल नए ट्रेक रूट खोलना या पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं है। इसका अर्थ है प्रशिक्षित गाइड, डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम, रियल टाइम मॉनिटरिंग, अनिवार्य पंजीकरण, सख्त सत्यापन और जवाबदेह एजेंसियां। यदि इनमें से किसी एक कड़ी में भी कमजोरी रहती है तो उसका परिणाम किसी परिवार के लिए जीवन भर का दर्द बन सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच हो। यदि फर्जी परमिट जारी करने में किसी एजेंसी या व्यक्ति की भूमिका पाई जाती है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई ट्रेकर बिना वैध डिजिटल पंजीकरण के किसी ट्रेक पर न जा सके। पर्वतीय क्षेत्रों में सुरक्षा मानकों की समीक्षा और स्वतंत्र ऑडिट भी समय की मांग है।
बबिता पांडे का अब तक न मिल पाना एक दुखद और रहस्यमय घटना है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या उत्तराखंड का एडवेंचर टूरिज्म ढांचा तेजी से बढ़ती गतिविधियों के अनुरूप पर्याप्त रूप से सुरक्षित और जवाबदेह है? जब तक इस सवाल का संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, तब तक राज्य के पर्यटन विस्तार के बड़े दावों के साथ यह घटना एक असहज प्रश्न की तरह खड़ी रहेगी। उत्तराखंड को पर्यटन की नई ऊंचाइयों तक पहुंचना है तो उसे सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही की बुनियाद को भी उतना ही मजबूत बनाना होगा।
