उत्तराखंड,विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण संदेश है। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, ग्लेशियरों का पिघलना और घटते वन क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुके हैं, तब पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध उत्तराखंड को “देवभूमि” के साथ-साथ “जल, जंगल और जमीन की भूमि” भी कहा जाता है। यहां के हिमालयी ग्लेशियर, नदियां, वन संपदा और जैव विविधता न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन अनियंत्रित विकास, बढ़ते प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से उत्तराखंड का पर्यावरण भी प्रभावित हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक, सामाजिक संगठन, जनप्रतिनिधि और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। केवल सोशल मीडिया पर संदेश साझा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धरातल पर वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त अभियान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक उद्देश्य लोगों में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करना है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में यह जिम्मेदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। इस अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पर्यावरण, सुरक्षित जल स्रोत और हरित उत्तराखंड सौंपने के लिए हम सभी सक्रिय योगदान देंगे।
“एक पेड़, एक परिवार और एक संकल्प” की भावना के साथ पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाना ही विश्व पर्यावरण दिवस की सार्थकता है।
