राज्य आंदोलनकारियों का धैर्य जवाब दे रहा है: 10% आरक्षण, पेंशन और सम्मान के वादों पर कब होगा अमल?

Spread the love


रुद्रपुर देहरादून। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन देश के सबसे लंबे और जनभागीदारी वाले आंदोलनों में से एक रहा है। इस आंदोलन में हजारों लोगों ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय, रोजगार, शिक्षा और पारिवारिक सुख-शांति तक दांव पर लगा दी। अनेक आंदोलनकारियों ने लाठीचार्ज झेले, जेल यात्राएं कीं और कई ने अपने प्राणों का बलिदान तक दिया। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यह अपेक्षा थी कि राज्य आंदोलनकारियों को सम्मान, सुरक्षा और उनके योगदान के अनुरूप अधिकार प्राप्त होंगे। लेकिन राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी बड़ी संख्या में आंदोलनकारी स्वयं को उपेक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि वे राज्य बनने से पहले भी सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे और राज्य बनने के बाद भी प्रदेश हित तथा अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्षरत हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके अनेक आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकारें बदलती रहीं, घोषणाएं होती रहीं, प्रस्ताव पारित होते रहे, लेकिन धरातल पर अपेक्षित अमल नहीं हुआ।
10 प्रतिशत आरक्षण का अनुपालन सबसे बड़ा मुद्दा
राज्य आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी और ज्वलंत मांग उनके आश्रितों के लिए घोषित 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के प्रभावी अनुपालन की है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि उत्तराखंड सरकार की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनेक अभ्यर्थियों ने सफलतापूर्वक परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन आरक्षण संबंधी प्रावधानों के क्रियान्वयन में अस्पष्टता और प्रशासनिक विलंब के कारण उनकी नियुक्तियां अटक गईं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि यदि विधानसभा द्वारा पारित प्रावधान और सरकार द्वारा जारी शासनादेश लागू नहीं हो पा रहे हैं, तो यह केवल आंदोलनकारी परिवारों के साथ अन्याय नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।
उनका कहना है कि सरकार को तत्काल एक उच्चस्तरीय समिति गठित कर सभी लंबित मामलों की समीक्षा करनी चाहिए तथा जिन अभ्यर्थियों की नियुक्तियां आरक्षण संबंधी विवादों के कारण रुकी हुई हैं, उन्हें शीघ्र न्याय दिलाना चाहिए।
सम्मान केवल कागजों में नहीं, व्यवहार में भी दिखना चाहिए
राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार ने कई बार उन्हें सम्मान देने की बातें कही हैं, लेकिन अधिकांश निर्णय सीमित दायरे में ही लागू किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर राज्य संपत्ति विभाग के अतिथि गृहों में कुछ रियायतों का प्रावधान किया गया, लेकिन यह सुविधा उत्तराखंड सरकार के अन्य विभागों के गेस्ट हाउसों में लागू नहीं है।
कुमाऊं मंडल विकास निगम, गढ़वाल मंडल विकास निगम, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, मंडी परिषद और अन्य सरकारी संस्थानों के विश्राम गृहों में राज्य आंदोलनकारियों को समान सुविधा नहीं मिलती।
आंदोलनकारियों की मांग है कि जिस प्रकार मान्यता प्राप्त पत्रकारों अथवा अन्य विशेष श्रेणियों को रियायती दरों पर आवास सुविधा उपलब्ध कराई जाती है, उसी प्रकार राज्य आंदोलनकारियों को भी प्रदेश के सभी सरकारी विश्राम गृहों में न्यायोचित एवं एक समान रियायती दरों पर आवास उपलब्ध कराया जाए।
उनका तर्क है कि राज्य निर्माण में योगदान देने वालों को सम्मान केवल समारोहों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सरकारी व्यवस्थाओं में भी दिखाई देना चाहिए।
बढ़ती महंगाई के बीच पेंशन में वृद्धि की मांग
राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि वर्तमान समय में वृद्धावस्था, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और बढ़ती महंगाई उनकी सबसे बड़ी चुनौतियां बन चुकी हैं। कई आंदोलनकारी आर्थिक रूप से कमजोर स्थिति में जीवन यापन कर रहे हैं।
इसलिए उनकी प्रमुख मांग है कि सभी पात्र राज्य आंदोलनकारियों को बिना किसी भेदभाव के कम से कम 11,000 रुपये प्रतिमाह की समान पेंशन दी जाए। उनका कहना है कि वर्तमान पेंशन राशि चिकित्सा, दवा, देखभाल और पारिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
आंदोलनकारियों का मानना है कि जब सरकारें विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की राशि समय-समय पर बढ़ाती हैं, तो राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वालों की पेंशन का भी पुनरीक्षण किया जाना चाहिए।
शासनादेशों पर अमल नहीं होने से बढ़ रहा असंतोष
राज्य आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि वर्षों के दौरान उनके पक्ष में कई शासनादेश जारी हुए, अनेक घोषणाएं की गईं और विधानसभा में भी विभिन्न प्रस्ताव पारित किए गए, लेकिन उनमें से कई आज तक पूर्ण रूप से लागू नहीं हो पाए हैं।
आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार को एक श्वेत पत्र जारी कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि राज्य आंदोलनकारियों के संबंध में अब तक कितने निर्णय लिए गए, उनमें से कितनों पर अमल हुआ और कितने अभी लंबित हैं।
उनका कहना है कि जब तक निर्णयों का क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक सम्मान और संवेदनशीलता की बातें केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगी।
रोडवेज बसों में परिवार को भी मिले सुविधा
आंदोलनकारियों का कहना है कि अधिकांश आंदोलनकारी अब वृद्ध हो चुके हैं और कई बार उन्हें चिकित्सा या अन्य आवश्यक कार्यों के लिए परिवार के किसी सदस्य के साथ यात्रा करनी पड़ती है।
इसलिए उनकी मांग है कि राज्य आंदोलनकारी के साथ उसकी पत्नी, पुत्री अथवा पुत्रवधू को भी उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों में निःशुल्क अथवा रियायती यात्रा सुविधा प्रदान की जाए।
उनका कहना है कि यह सुविधा किसी विशेष लाभ के रूप में नहीं बल्कि वृद्धावस्था में आवश्यक सहारे के रूप में देखी जानी चाहिए।
चिन्हीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग
राज्य आंदोलनकारियों का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा चिन्हीकरण प्रक्रिया से जुड़ा है। उनका कहना है कि वास्तविक आंदोलनकारियों की पहचान और सूची का समय-समय पर पारदर्शी सत्यापन होना चाहिए।
उनका आरोप है कि वर्षों से चिन्हीकरण प्रक्रिया को लेकर विवाद उठते रहे हैं। ऐसे में सरकार को निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कर वास्तविक आंदोलनकारियों को उनका अधिकार देना चाहिए तथा यदि कहीं त्रुटियां हैं तो उनका शुद्धिकरण किया जाना चाहिए।
इससे वास्तविक आंदोलनकारियों का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा और व्यवस्थाओं पर जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
राज्य बनने के बाद भी जारी है संघर्ष
राज्य आंदोलनकारियों का कहना है कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी उनके संघर्ष समाप्त नहीं हुए। वे आज भी प्रदेश के विकास, पर्वतीय क्षेत्रों की समस्याओं, पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों को उठाते रहे हैं।
उनका कहना है कि उत्तराखंड राज्य केवल प्रशासनिक इकाई नहीं बल्कि एक जनआंदोलन का परिणाम है। इसलिए राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों और आंदोलन की भावना को जीवित रखना सरकारों की जिम्मेदारी है।
आंदोलनकारी नेताओं का कहना है कि लगातार उपेक्षा और लंबित मांगों के कारण आंदोलनकारी समाज में असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि यदि सरकार ने शीघ्र सकारात्मक पहल नहीं की तो प्रदेशव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।
2027 के चुनावों को लेकर चेतावनी
राज्य आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि वे किसी राजनीतिक दल के विरोधी नहीं हैं, लेकिन अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे। उनका कहना है कि यदि वर्षों से लंबित मांगों का समाधान नहीं हुआ तो 2027 के विधानसभा चुनावों में इसका राजनीतिक प्रभाव भी दिखाई दे सकता है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार को उनकी चेतावनी को राजनीतिक धमकी के रूप में नहीं बल्कि वर्षों से संचित पीड़ा और उपेक्षा की अभिव्यक्ति के रूप में देखना चाहिए।
उनका कहना है कि राज्य निर्माण के लिए संघर्ष करने वाले लोगों की अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सरकार को 10 प्रतिशत आरक्षण के प्रभावी अनुपालन, पेंशन वृद्धि, सभी सरकारी गेस्ट हाउसों में रियायती सुविधा, रोडवेज यात्रा में सहचर को छूट तथा लंबित शासनादेशों के क्रियान्वयन पर तत्काल निर्णय लेना चाहिए।
राज्य आंदोलनकारियों का स्पष्ट संदेश है कि सम्मान केवल शब्दों से नहीं बल्कि ठोस निर्णयों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन से मिलता है। उत्तराखंड की जनता और राज्य आंदोलनकारी अब घोषणाओं से अधिक परिणाम देखना चाहते हैं।


Spread the love