उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन कोई साधारण राजनीतिक अभियान नहीं था। यह संघर्ष था पहाड़ की अस्मिता, पहचान, सम्मान और भविष्य का। इस आंदोलन में हजारों लोगों ने सड़कों पर लाठियां खाईं, जेल यात्राएं कीं, रोजगार गंवाए और अनेक परिवारों ने अपने प्रियजनों को शहादत के रूप में खोया। मसूरी गोलीकांड और रामपुर तिराहा जैसी घटनाएं आज भी आंदोलन के दर्दनाक अध्याय के रूप में याद की जाती हैं।
लेकिन विडंबना देखिए कि राज्य बनने के 25 वर्ष बाद भी अनेक आंदोलनकारी स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। उनकी स्थिति उस व्यक्ति जैसी हो गई है जो “भंडारा खाने गया तो भंडारा खत्म मिला और बाहर आया तो चप्पल भी गायब मिली।”
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
अर्थात संघर्ष उन्होंने किया, बलिदान उन्होंने दिया, लेकिन लाभ किसी और ने उठा लिया। जिन्होंने आंदोलन के दिनों में घर-परिवार छोड़कर सड़कों पर संघर्ष किया, वे आज भी पहचान, सम्मान और अधिकारों के लिए भटक रहे हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी व्यवस्था का लाभ ले गए जिनका आंदोलन से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। आंदोलनकारियों द्वारा पेंशन, सम्मान और चिन्हीकरण संबंधी शिकायतें समय-समय पर उठती रही हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में यह चर्चा अक्सर सुनाई देती है कि “राज्य आंदोलनकारियों ने खेत जोता, फसल किसी और ने काट ली।” यह जुमला केवल व्यंग्य नहीं बल्कि एक बड़ी पीड़ा का प्रतीक है।
राज्य आंदोलनकारियों की स्थिति पर कुछ और लोकप्रिय तंज भी सटीक बैठते हैं—
“बारात हमने निकाली, दूल्हा कोई और बन गया।”
“नाव हमने खेयी, किनारे कोई और लग गया।”
“बीज हमने बोया, फल किसी और ने खा लिया।”
“लड़ाई हमने लड़ी, मेडल कोई और ले गया।”
“घाव हमारे हिस्से आए, वाहवाही किसी और के खाते में चली गई।”
“मशाल हमने जलाई, रोशनी में चेहरे किसी और के चमक गए।”
“राज्य बनाने वाले लाइन में खड़े हैं, राज्य चलाने वाले मंच पर बैठे हैं।”
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राज्य आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए था या व्यवस्था परिवर्तन के लिए? यदि आज भी वास्तविक आंदोलनकारी सम्मान, रोजगार, पेंशन, चिकित्सा सुविधाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो यह आत्ममंथन का विषय है। उत्तराखंड आंदोलन केवल इतिहास की घटना नहीं बल्कि जनभावनाओं और बलिदानों की विरासत है।
राज्य निर्माण के नायकों को केवल स्मारकों, भाषणों और स्थापना दिवस की औपचारिकताओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनके सम्मान का सबसे बड़ा तरीका यही होगा कि उन्हें न्याय मिले, पहचान मिले और उनकी अगली पीढ़ी यह महसूस करे कि उनके पूर्वजों का संघर्ष व्यर्थ नहीं गया।
वरना इतिहास यही लिखेगा कि उत्तराखंड बनाने वाले आंदोलनकारी उस भंडारे के अतिथि बनकर रह गए, जहां खाना भी खत्म था और लौटते समय चप्पल भी गायब हो गई।
