देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं चिन्हित राज्य आंदोलनकारी संयुक्त समिति के केंद्रीय मुख्य संरक्षक धीरेंद्र प्रताप ने उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद में लगातार बढ़ाए जा रहे दायित्वधारियों की नियुक्तियों पर तीखा हमला बोलते हुए राज्य सरकार पर आंदोलनकारियों के साथ छल और झूठी घोषणाएं करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सम्मान परिषद में नए-नए पद और दायित्व सृजित कर सरकार आंदोलनकारियों को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर आंदोलनकारियों की किसी भी प्रमुख मांग पर ठोस प्रगति नहीं हुई है।
धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि पिछले कुछ महीनों में परिषद में जिन लोगों को विभिन्न दायित्व दिए गए थे, वे आंदोलनकारियों के हित में कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर पाए। अब एक नए अध्यक्ष की नियुक्ति भी आंदोलनकारियों को बहलाने और राजनीतिक संदेश देने का प्रयास भर प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि यदि पहले से नियुक्त दायित्वधारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन प्रभावी ढंग से करते तो आज आंदोलनकारियों को अपनी मांगों के लिए बार-बार सरकार का दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ता।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने राज्य निर्माण के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया था। अनेक लोगों ने जेल यात्राएं कीं, लाठियां खाईं, अपने रोजगार और पारिवारिक जीवन तक को प्रभावित होने दिया। लेकिन आज वही आंदोलनकारी अपने अधिकारों के लिए भटकने को मजबूर हैं। सरकार बार-बार वादे करती है, लेकिन उन वादों को पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई नहीं देती।
धीरेंद्र प्रताप ने राज्य आंदोलनकारियों को मिलने वाले 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि वर्षों से यह विषय आंदोलनकारियों की सबसे बड़ी मांगों में शामिल है। सरकार ने कई बार सकारात्मक संकेत दिए, लेकिन आज तक इस संबंध में कोई ठोस और प्रभावी नीति सामने नहीं आ सकी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल घोषणाएं करती है, लेकिन फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। इससे आंदोलनकारियों और उनके परिवारों में गहरी निराशा है।
उन्होंने कहा कि राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को रोजगार, शिक्षा और अन्य सरकारी योजनाओं में विशेष अवसर देने के वादे भी अधूरे पड़े हैं। सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि आंदोलनकारियों के परिवारों के कल्याण के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। आज भी अनेक परिवार अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
धीरेंद्र प्रताप ने सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण की प्रक्रिया के लिए केवल दो महीने का समय बढ़ाए जाने को भी अपर्याप्त और भ्रामक कदम बताया। उन्होंने कहा कि हजारों ऐसे लोग हैं जिनके दस्तावेज विभिन्न कारणों से लंबित हैं और जिनका चिन्हीकरण अब तक नहीं हो पाया है। ऐसे में मात्र दो महीने की अवधि बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं बल्कि औपचारिकता निभाने जैसा है।
उन्होंने कहा कि सरकार यदि वास्तव में आंदोलनकारियों के प्रति संवेदनशील होती तो चिन्हीकरण प्रक्रिया को सरल बनाया जाता, पर्याप्त समय दिया जाता और जिलों में विशेष शिविर आयोजित कर लंबित मामलों का निस्तारण किया जाता। लेकिन ऐसा कोई गंभीर प्रयास दिखाई नहीं देता। इसके विपरीत सरकार समय-समय पर ऐसी घोषणाएं कर देती है जिससे लगे कि काम हो रहा है, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
धीरेंद्र प्रताप ने उन राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों की समस्याओं का भी उल्लेख किया जिन्हें विभिन्न विभागों में नियुक्ति के अवसर मिले हैं, लेकिन वे लंबे समय से नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की प्रशासनिक उदासीनता के कारण चयनित अभ्यर्थियों को समय पर नियुक्ति नहीं मिल पा रही है। इससे उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि जब सरकार स्वयं अवसर प्रदान करने का दावा करती है तो फिर नियुक्ति प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब क्यों हो रहा है। यदि सरकार वास्तव में आंदोलनकारियों का सम्मान करती है तो ऐसे मामलों का प्राथमिकता के आधार पर समाधान होना चाहिए।
राज्य आंदोलनकारियों की पेंशन के मुद्दे पर भी धीरेंद्र प्रताप ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई के बीच वर्तमान पेंशन व्यवस्था आंदोलनकारियों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है। उन्होंने राज्य आंदोलनकारियों की सम्मान पेंशन को बढ़ाकर कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह किए जाने की मांग दोहराई।
उनका कहना था कि जिन लोगों ने राज्य निर्माण के लिए अपना जीवन संघर्ष में लगाया, उन्हें वृद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा का सामना नहीं करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारियों के सम्मान और गरिमा के अनुरूप पेंशन व्यवस्था सुनिश्चित करे। केवल सम्मान समारोह आयोजित कर देने से आंदोलनकारियों की समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला।
धीरेंद्र प्रताप ने यह भी कहा कि राज्य अतिथि गृहों और अन्य सरकारी सुविधाओं से संबंधित कई मांगें लंबे समय से लंबित हैं। आंदोलनकारी लगातार इन मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई स्पष्ट नीति नहीं बनाई गई है। उन्होंने कहा कि सम्मान परिषद का मुख्य उद्देश्य आंदोलनकारियों के हितों की रक्षा करना और उनकी समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए, लेकिन परिषद अब केवल नियुक्तियों और दायित्वों का केंद्र बनकर रह गई है।
नवनियुक्त अध्यक्ष हुकुम सिंह कुँवर को शुभकामनाएं देते हुए धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से उनके प्रति सम्मान रखते हैं और आशा करते हैं कि वे आंदोलनकारियों की समस्याओं को गंभीरता से उठाएंगे। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में उनके सामने चुनौती बेहद कठिन है।
धीरेंद्र प्रताप ने क्रिकेट की भाषा में कहा कि “उन्हें रन भी बनाने हैं और ओवर भी बहुत कम बचे हैं।” उनका आशय था कि चुनावी माहौल बनने से पहले सरकार के पास समय बहुत सीमित है और आंदोलनकारियों की अपेक्षाएं बहुत बड़ी हैं। ऐसे में यदि सरकार शीघ्र निर्णय नहीं लेती तो आंदोलनकारियों में असंतोष और बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि आगामी चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है और जल्द ही आचार संहिता लागू होने की संभावना है। ऐसे समय में यदि सरकार आंदोलनकारियों के हितों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेती तो यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकार ने केवल वादे किए, लेकिन उन्हें पूरा करने की इच्छा नहीं दिखाई।
धीरेंद्र प्रताप ने आरोप लगाया कि सरकार आंदोलनकारियों के नाम पर राजनीति कर रही है। चुनाव नजदीक आते ही समितियों और परिषदों में नियुक्तियां कर दी जाती हैं, लेकिन वास्तविक मुद्दों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी समाज अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगा, बल्कि उसे परिणाम चाहिए।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि जनता की आकांक्षाओं और आत्मसम्मान का संघर्ष था। इसलिए आंदोलनकारियों के सम्मान और अधिकारों को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह राज्य निर्माण में योगदान देने वाले प्रत्येक आंदोलनकारी के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए।
अंत में धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार आंदोलनकारियों के साथ किए गए अपने वादों को पूरा करने के बजाय समय बिताने की नीति पर काम कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलनकारियों को बार-बार आश्वासन देकर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि “सरकार ने आंदोलनकारियों को भिखारी बना दिया है। जिन्हें सम्मान और अधिकार मिलने चाहिए थे, वे आज अपनी ही मांगों के लिए दर-दर भटक रहे हैं।”
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने शीघ्र ही 10 प्रतिशत आरक्षण, आश्रितों के अधिकार, पेंशन वृद्धि, चिन्हीकरण प्रक्रिया और लंबित नियुक्तियों जैसे मुद्दों पर ठोस निर्णय नहीं लिया तो आंदोलनकारी समाज व्यापक आंदोलन करने को बाध्य होगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के आंदोलनकारियों का धैर्य अब जवाब देने लगा है और वे अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी
