पीयूष धामी की अनूठी मुहिमः निःशुल्क कार्यशाला के जरिए छात्र-छात्राओं को सौंपी उत्तराखंडी लोक वाद्यों की विरासत

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पिथौरागढ़। आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के बीच जहां नई पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से दूर होती जा रही है, वहीं कुछ युवा ऐसे भी हैं जो अपनी जड़ों को बचाने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। इसी कड़ी में ‘लोक विरासत जनजातीय एवं लोक कला समिति’ द्वारा बुधवार को राजकीय बालिका उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (जीजीएचएसएस) बजेटी में एक दिवसीय निःशुल्क लोक वाद्य यंत्र कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य छात्र-छात्राओं को उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोकगीतों से परिचित कराना था।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


कार्यशाला में विद्यालय की बड़ी संख्या में छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान उन्हें उत्तराखंड के पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों जैसे हुड़का, डोर-थाली तथा अन्य सांस्कृतिक वाद्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। प्रशिक्षकों ने इन वाद्य यंत्रों को बजाने की तकनीक, उनके ऐतिहासिक महत्व और लोक जीवन में उनकी भूमिका के बारे में भी बताया। छात्राओं ने न केवल इन वाद्यों को करीब से देखा, बल्कि स्वयं उन्हें बजाने का अनुभव भी प्राप्त किया।
कार्यक्रम के दौरान लोक कलाकारों ने पारंपरिक लोकगीतों की प्रस्तुतियां भी दीं, जिनके माध्यम से छात्र-छात्राओं को उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता और लोक परंपराओं का परिचय मिला। कार्यशाला में प्रतिभागियों को यह भी बताया गया कि किस प्रकार पहाड़ की संस्कृति में लोकगीत और लोक वाद्य जीवन के हर महत्वपूर्ण अवसर से जुड़े रहे हैं। जन्म, विवाह, त्योहारों, मेलों और धार्मिक आयोजनों में इन वाद्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए समिति के संस्थापक एवं युवा संस्कृति प्रेमी पीयूष धामी ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति, परंपराओं और लोक कलाओं से भी है। उन्होंने कहा कि आज का युवा आधुनिक जीवनशैली और पाश्चात्य संस्कृति की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा है, जो समय की मांग भी है, लेकिन इसके साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भूल जाना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि युवा चाहे जितनी भी आधुनिकता को अपना लें, अंततः उन्हें अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपने गीत-संगीत और अपनी संस्कृति की ओर लौटना ही होगा। हमारी लोक संस्कृति ही हमारी असली पहचान है और यदि हम इसे संरक्षित नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से अनजान रह जाएंगी। उन्होंने छात्र-छात्राओं से आह्वान किया कि वे लोक कला, लोक संगीत और पारंपरिक वाद्य यंत्रों को सीखने में रुचि लें तथा अपने परिवार और समाज में भी इसके संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाएं।
पीयूष धामी ने बताया कि उनकी संस्था लगातार विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों और ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर युवाओं को लोक संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रही है। उनका मानना है कि यदि बच्चों और युवाओं को प्रारंभिक स्तर से ही अपनी सांस्कृतिक धरोहर के बारे में जानकारी दी जाए तो वे भविष्य में इसके संवाहक बन सकते हैं।
गौरतलब है कि पीयूष धामी ने मात्र 18 वर्ष की आयु में ‘लोक विरासत जनजातीय एवं लोक कला समिति’ की स्थापना की थी। कम उम्र में शुरू की गई यह पहल आज उत्तराखंड की लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक अभियान का रूप ले चुकी है। उनकी अगुवाई में समिति विभिन्न जनपदों में लोक वाद्य प्रशिक्षण शिविर, सांस्कृतिक कार्यशालाएं, लोकगीत प्रतियोगिताएं और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर रही है।
कार्यशाला में मौजूद शिक्षकों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि आज के समय में ऐसे कार्यक्रमों की अत्यंत आवश्यकता है। विद्यालयों में शिक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक शिक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है और उनमें अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें अपनी पहचान और विरासत से जोड़ने का कार्य करती हैं।
छात्र-छात्राओं ने भी कार्यक्रम के प्रति उत्साह व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें पहली बार इतने करीब से पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों को देखने और सीखने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि कार्यशाला के माध्यम से उन्हें अपनी संस्कृति के बारे में नई जानकारियां प्राप्त हुईं और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।
कार्यक्रम में उपस्थित संस्कृति प्रेमियों ने कहा कि उत्तराखंड की लोक परंपराएं सदियों पुरानी हैं और इन्हें बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या संस्थाओं की नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की है। यदि नई पीढ़ी इन परंपराओं को अपनाएगी और आगे बढ़ाएगी, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह सकेगी।
कार्यक्रम का समापन सांस्कृतिक संवाद और विद्यार्थियों को लोक संस्कृति संरक्षण का संकल्प दिलाकर किया गया। इस अवसर पर स्मृति भट्ट, प्रियंशु राज, कविता पंत सहित अनेक शिक्षक, संस्कृति प्रेमी, स्थानीय नागरिक और समिति के सदस्य मौजूद रहे।
यह कार्यशाला केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और उत्तराखंड की अमूल्य लोक धरोहर को संरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई। पीयूष धामी और उनकी संस्था की यह पहल न केवल युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ रही है, बल्कि पूरे समाज को यह संदेश भी दे रही है कि आधुनिकता के इस दौर में अपनी विरासत को संजोकर रखना ही हमारी वास्तविक पहचान और सबसे बड़ी ताकत है। :::


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