देवभूमि परिवार कानून पर उठे सवाल: क्या उत्तराखंड की मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने की कोशिश?

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देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा लागू किए गए देवभूमि परिवार अधिनियम-2026 को सरकार जहां पारदर्शिता और सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं इस कानून को लेकर राज्य में बहस भी तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों, राज्य आंदोलनकारियों और विभिन्न जनप्रतिनिधियों का एक वर्ग सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।


सरकार के अनुसार, इस कानून के तहत राज्य में लंबे समय से निवास कर रहे परिवारों को एक यूनिक देवभूमि परिवार आईडी जारी की जाएगी। इससे सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान आसान होगी और फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी। लेकिन विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्याएं पहचान पत्र नहीं, बल्कि पलायन, बेरोजगारी, भू-कानून, जल-जंगल-जमीन और गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने जैसे मुद्दे हैं।
भू-कानून पर फिर छिड़ी बहस
देवभूमि परिवार कानून लागू होने के बाद एक बार फिर हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सख्त भू-कानून की मांग जोर पकड़ने लगी है। राज्य आंदोलन से जुड़े कई लोगों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में उत्तराखंड की मूल पहचान और संसाधनों की रक्षा करना चाहती है तो उसे भूमि संरक्षण को प्राथमिकता देनी चाहिए।
आंदोलनकारियों का तर्क है कि वर्षों से उत्तराखंड में बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीद, अनियोजित विकास और संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्यों की तर्ज पर व्यापक और प्रभावी भू-कानून उत्तराखंड में पूरी मजबूती से क्यों नहीं लागू किया जा रहा।
गैरसैंण और पलायन के मुद्दे फिर चर्चा में
राज्य गठन के बाद से गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग लगातार उठती रही है। आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि गैरसैंण और पर्वतीय क्षेत्रों के विकास को लेकर अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है।
वहीं, पहाड़ों से लगातार हो रहे पलायन को लेकर भी सरकार की नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि गांव खाली होते रहे और युवा रोजगार के लिए राज्य छोड़ते रहे, तो केवल डिजिटल पहचान व्यवस्था से उत्तराखंड की मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा।
सरकार की मंशा पर विपक्ष और सामाजिक संगठनों के सवाल
राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या देवभूमि परिवार आईडी वास्तव में प्रशासनिक सुधार का कदम है या फिर जनता के लंबे समय से लंबित मुद्दों से ध्यान हटाने का प्रयास।
हालांकि सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी शासन और डिजिटल प्रशासन को मजबूत करने के उद्देश्य से लाई गई है। सरकार का दावा है कि इससे योजनाओं का लाभ सही पात्र लोगों तक पहुंचेगा और सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा।
डेटा सुरक्षा के सख्त प्रावधान
कानून में नागरिकों के डेटा की सुरक्षा के लिए कठोर प्रावधान किए गए हैं। डेटाबेस से छेड़छाड़, अनधिकृत पहुंच या डेटा नष्ट करने जैसे मामलों में 10 वर्ष तक की सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। वहीं झूठी जानकारी देकर पहचान बदलने या फर्जी तरीके से डेटा संग्रह करने पर भी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
बड़ा सवाल
देवभूमि परिवार कानून लागू होने के बाद अब उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श में एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है—क्या यह कानून वास्तव में सुशासन और पारदर्शिता की दिशा में ऐतिहासिक कदम साबित होगा, या फिर जनता की नजर में भू-कानून, गैरसैंण, पलायन और जल-जंगल-जमीन जैसे मूल मुद्दे ही सबसे महत्वपूर्ण बने रहेंगे?


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