कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते: उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा संकट

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कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते: उत्तराखंड की राजनीति का सबसे बड़ा संकट

राजनीति में शब्द कभी-कभी तीर की तरह काम करते हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने हाल ही में एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।” यह टिप्पणी भले ही महाराष्ट्र की राजनीति और वहां के बागी सांसदों को लेकर की गई हो, लेकिन इसका अर्थ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यदि इस कथन को उत्तराखंड की राजनीति के आईने में देखा जाए तो यह राज्य की दो दशक पुरानी राजनीतिक संस्कृति का एक सटीक चित्रण प्रतीत होता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।


उत्तराखंड राज्य का गठन वर्ष 2000 में बड़ी उम्मीदों और लंबे जनसंघर्ष के बाद हुआ था। पहाड़ के लोगों ने एक अलग राज्य इसलिए नहीं मांगा था कि यहां सत्ता की कुर्सियां बदलती रहें, बल्कि इसलिए कि यहां की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान हो सके। लेकिन पिछले 25 वर्षों का इतिहास बताता है कि राज्य निर्माण के सपनों से कहीं अधिक नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का विकास हुआ है।
आज उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसी प्रवृत्ति गहराई से जड़ें जमा चुकी है, जिसमें विचारधारा, जनादेश और जनता के विश्वास से अधिक महत्व सत्ता और पद को दिया जाता है। यही कारण है कि यहां दल-बदल कोई असामान्य घटना नहीं रह गई है। आज जो नेता भाजपा में दिखाई देता है, वह कल कांग्रेस में था और जो आज कांग्रेस का झंडा उठा रहा है, उसके भाजपा में जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दल बदलना जैसे नेताओं के लिए कपड़े बदलने जितना आसान हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वफादारी किसके प्रति होनी चाहिए? किसी व्यक्ति के प्रति, किसी दल के प्रति या जनता के प्रति? लोकतंत्र में अंतिम वफादारी जनता के प्रति होनी चाहिए। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में अक्सर देखने को मिलता है कि जनता केवल चुनाव जीतने का माध्यम बनकर रह जाती है। चुनाव जीतने के बाद नेता अपने राजनीतिक भविष्य की गणना करने लगते हैं और जहां उन्हें अधिक संभावनाएं दिखाई देती हैं, वहां चले जाते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। कई बड़े नेता कांग्रेस और भाजपा के बीच बार-बार आते-जाते रहे हैं। चुनावों के समय विचारधारा की बातें होती हैं, लेकिन सत्ता समीकरण बदलते ही वही नेता नए मंच पर खड़े होकर पुराने विचारों को गलत और नए विचारों को सही साबित करने लगते हैं। यदि विचारधारा इतनी आसानी से बदल सकती है, तो प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में कोई विचारधारा थी भी या नहीं?
राज्य निर्माण के समय जिन मुद्दों को लेकर आंदोलन हुआ था, वे आज भी काफी हद तक जस के तस बने हुए हैं। पलायन आज भी उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है। हजारों गांव खाली हो चुके हैं। खेती संकट में है। पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं। शिक्षा व्यवस्था असमान है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। आपदा प्रबंधन की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। जल, जंगल और जमीन के प्रश्न आज भी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
लेकिन इन मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक विमर्श कम दिखाई देता है। इसके विपरीत, चर्चा अधिकतर इस बात की होती है कि कौन नेता किस दल में जाएगा, किसे मंत्री पद मिलेगा और किसकी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी। ऐसा लगता है कि राज्य की समस्याओं से अधिक महत्वपूर्ण नेताओं का राजनीतिक भविष्य हो गया है।
यह विडंबना ही है कि उत्तराखंड के नेताओं का राजनीतिक विकास तेजी से हुआ, लेकिन उत्तराखंड का विकास उस गति से नहीं हो पाया। नेताओं की संपत्ति बढ़ी, उनके राजनीतिक संपर्क बढ़े, उनके पद बढ़े, लेकिन पहाड़ों के गांव खाली होते गए। युवा रोजगार के लिए दिल्ली, चंडीगढ़, देहरादून और विदेशों की ओर पलायन करते रहे। यदि राज्य निर्माण का मूल उद्देश्य पहाड़ के लोगों का जीवन बेहतर बनाना था, तो यह स्वीकार करना होगा कि उस लक्ष्य की प्राप्ति अभी अधूरी है।
दल-बदल की राजनीति केवल राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न नहीं है। इसका सीधा प्रभाव शासन और विकास पर पड़ता है। जब कोई नेता दल बदलता है तो वह केवल पार्टी नहीं बदलता, बल्कि उन मतदाताओं के विश्वास को भी प्रभावित करता है जिन्होंने उसे किसी विशेष विचार और दल के आधार पर चुना था। लोकतंत्र में जनादेश का सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होता है। लेकिन जब जनादेश को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए दरकिनार कर दिया जाता है, तब जनता के मन में राजनीति के प्रति अविश्वास पैदा होता है।
उत्तराखंड में यह अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। आम नागरिक अब यह मानने लगा है कि अधिकांश नेताओं के लिए दल केवल एक राजनीतिक वाहन है, जिसे आवश्यकता के अनुसार बदला जा सकता है। यही कारण है कि युवाओं का राजनीति से मोहभंग बढ़ रहा है। जब उन्हें यह दिखाई देता है कि चुनाव के समय जो नेता एक-दूसरे को भ्रष्ट बताते हैं, वही कुछ समय बाद एक ही मंच पर खड़े होकर एक-दूसरे की प्रशंसा करने लगते हैं, तब राजनीति की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
संजय राउत का कथन भले ही कठोर हो, लेकिन यह राजनीतिक वफादारी के प्रश्न को सामने लाता है। वफादारी का अर्थ अंधभक्ति नहीं होता। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है। यदि किसी नेता को अपनी पार्टी की नीतियों से असहमति है तो वह लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख सकता है। लेकिन यदि असहमति का कारण केवल पद, टिकट या सत्ता प्राप्ति हो, तो जनता उसे आसानी से समझ लेती है।
उत्तराखंड की राजनीति को आज आत्ममंथन की आवश्यकता है। राज्य को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो पांच साल बाद चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अगले पच्चीस वर्षों के उत्तराखंड की चिंता करें। ऐसे नेताओं की जरूरत है जो गांवों को बचाने, रोजगार सृजन करने, शिक्षा और स्वास्थ्य को मजबूत बनाने तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए दीर्घकालिक नीतियां बनाएं।
राजनीतिक दलों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि दल केवल चुनाव जीतने के लिए अवसरवादी नेताओं का स्वागत करते रहेंगे, तो वैचारिक राजनीति कमजोर होती जाएगी। लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है; यह विश्वास, सिद्धांत और जवाबदेही पर भी आधारित होता है।
उत्तराखंड के मतदाताओं को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। उन्हें केवल जाति, क्षेत्र, भावनात्मक नारों या तात्कालिक वादों के आधार पर मतदान करने के बजाय नेताओं के राजनीतिक इतिहास और उनकी विश्वसनीयता का भी मूल्यांकन करना होगा। जनता जब तक अवसरवादी राजनीति को चुनावी सफलता देती रहेगी, तब तक दल-बदल की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी।
राज्य निर्माण के पच्चीस वर्ष बाद यह सवाल पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है कि आखिर उत्तराखंड किस दिशा में जा रहा है? क्या यह राज्य अपने मूल उद्देश्यों की ओर बढ़ रहा है या फिर सत्ता की राजनीति के दलदल में फंसता जा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर केवल राजनीतिक दलों को नहीं, बल्कि पूरे समाज को मिलकर खोजना होगा।
संजय राउत के शब्दों को यदि उत्तराखंड के संदर्भ में रूपक के तौर पर देखा जाए तो उनका सार यही है कि राजनीति में सबसे बड़ा गुण वफादारी है—किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और राज्य के हितों के प्रति। दुर्भाग्य से उत्तराखंड की राजनीति में यही गुण सबसे अधिक दुर्लभ होता जा रहा है।
आज जो नेता भाजपा में है, वह कल कांग्रेस में हो सकता है और जो कांग्रेस में है, वह कल भाजपा में दिखाई दे सकता है। लेकिन उत्तराखंड की जनता कहीं नहीं जाती। वह यहीं रहती है, समस्याओं से जूझती है, आपदाओं का सामना करती है, रोजगार खोजती है और बेहतर भविष्य का सपना देखती है। इसलिए राजनीति की असली परीक्षा दल बदलने में नहीं, बल्कि जनता के प्रति निभाई गई जिम्मेदारी में है।
उत्तराखंड को अब ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो यह साबित कर सके कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का संकल्प है। अन्यथा इतिहास बार-बार यही कहेगा कि नेता तो बहुत हुए, लेकिन राज्य के प्रति वफादार बहुत कम निकले।
और शायद तब जनता भी यही कहने को मजबूर होगी—कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।


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