सनातन संस्कृति में भगवा वस्त्र किसी संस्था, पद या पहचान का प्रतीक भर नहीं है। यह त्याग, वैराग्य, तप, सेवा और आत्मसमर्पण का जीवंत स्वरूप है। जिस क्षण कोई साधक अपने जीवन को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर भगवा धारण करता है, उसी क्षण वह संसार के मोह, मान, प्रतिष्ठा और अहंकार से दूरी बनाने का संकल्प लेता है। यही कारण है कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा में भगवा वस्त्र को अत्यंत आदर प्राप्त है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
आज सोशल मीडिया का दौर है। कुछ लोग कैमरा लेकर किसी साधु के सामने पहुँच जाते हैं और पूछते हैं—”संस्कृत का श्लोक सुनाइए।” “गीता का कौन-सा अध्याय आता है?” “वेद का मंत्र सुनाइए।”
भगवा वस्त्र धारण कर भिक्षा से जीवनयापन करने वाला साधक अपने अहंकार, मान-सम्मान और सांसारिक अभिमान को ईश्वर के चरणों में समर्पित करने का संकल्प ले चुका होता है। भिक्षा उसके लिए केवल भोजन का साधन नहीं, आत्मसमर्पण और वैराग्य की साधना है। ऐसा मार्ग ईश्वर की अनुभूति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में अग्रसर माना जाता है।
प्रश्न उठता है कि क्या साधु होने का प्रमाण केवल संस्कृत बोलना है? क्या तपस्या का मूल्य कैमरे के सामने होने वाली परीक्षा से तय होगा?
भारत की संत परंपरा में अनेक ऐसे महात्मा हुए जिन्होंने विद्यालय का मुख भी नहीं देखा, फिर भी उनके चरणों में बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हुए। किसी ने हिमालय की गुफाओं में साधना की, किसी ने गंगा तट पर जीवन बिताया, किसी ने जंगलों में रहकर ईश्वर का स्मरण किया। उनकी साधना पुस्तकों की सीमा से बहुत आगे थी।
संस्कृत देववाणी है, उसका सम्मान प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है। शास्त्रों का अध्ययन महान साधना है। साथ ही यह भी सत्य है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग केवल भाषा से तय नहीं होता। भक्ति, करुणा, सेवा, संयम और समर्पण भी परमात्मा तक पहुँचाने वाले मार्ग हैं।
भगवद्गीता का संदेश है—
“श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।”
अर्थात श्रद्धा, साधना और इन्द्रिय-निग्रह से ज्ञान की प्राप्ति होती है।
ज्ञान केवल शब्दों का संग्रह नहीं, जीवन की साधना भी है।
टीआरपी और सोशल मीडिया की लोकप्रियता के लिए भगवा वस्त्रधारी साधुओं का उपहास करना, संस्कृत के श्लोक सुनाने की चुनौती देना और उनकी साधना पर प्रश्न उठाना सनातन परंपरा की गरिमा के अनुरूप नहीं। प्रश्न यह है कि क्या आध्यात्मिकता का प्रमाण केवल संस्कृत के श्लोक हैं, या त्याग, तप, सेवा और समर्पण भी उसकी पहचान हैं?
रामायण का प्रसंग भी गहरा संदेश देता है। जब रावण माता सीता के समक्ष पहुँचा, तब उसने साधु का वेश धारण किया। प्रश्न यह है कि रावण ने राजा का रूप क्यों धारण नहीं किया? उसने साधु का वेश ही क्यों चुना?
उत्तर स्पष्ट है। समाज में साधु वेश का सम्मान इतना महान था कि छल करने वाला भी उसी रूप का सहारा लेकर पहुँचा। इसका अर्थ यह नहीं कि साधु वेश दोषी है। दोष तो उस व्यक्ति के कर्मों में था। उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति भगवा पहनकर अधर्म करता है, उसके कर्मों की जिम्मेदारी उसी की है। भगवा वस्त्र की पवित्रता पर उससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
भगवान शिव स्वयं भस्म धारण करते हैं। भस्म यह स्मरण कराती है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। भगवा वस्त्र उसी वैराग्य की अग्नि का प्रतीक है। जिसने इस मार्ग को अपनाया, उसने अपने जीवन का केंद्र ईश्वर को बनाया।
कई साधु भिक्षा लेकर जीवनयापन करते हैं। भिक्षा उनके लिए विवशता नहीं, साधना का मार्ग है। हाथ फैलाना उस व्यक्ति के लिए सहज कार्य नहीं जिसने अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित कर दिया हो। संसार सम्मान जुटाने में लगा है, साधु सम्मान छोड़ने का अभ्यास करता है। यही अंतर आध्यात्मिक यात्रा का आधार है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि साधुओं का सम्मान अंधश्रद्धा से नहीं, विवेकपूर्ण श्रद्धा से किया जाए। जो संत समाज सेवा, साधना और धर्म का मार्ग दिखा रहे हैं, उनके प्रति आदर का भाव होना चाहिए। जो धर्म के नाम पर छल करते हैं, उनके कर्मों का निर्णय समाज और कानून करें।
किसी भूखे साधु का उपहास करना, वीडियो बनाकर मनोरंजन करना या संस्कृत के दो-चार श्लोक पूछकर उसकी साधना पर प्रश्न उठाना सनातन संस्कृति की परंपरा का हिस्सा कभी नहीं रहा। भारत ने सदैव संतों का सम्मान किया है, परीक्षा लेने की परंपरा का समर्थन नहीं किया।
हर साधु शंकराचार्य हो, हर संन्यासी महापंडित हो, हर तपस्वी संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान हो—ऐसी अपेक्षा भी उचित नहीं। अनेक संत मौन साधना करते हैं, अनेक नामजप में जीवन बिताते हैं, अनेक सेवा को ही पूजा मानते हैं। ईश्वर उनके हृदय की भाषा सुनते हैं।
भगवा वस्त्र की शक्ति उसके रंग में नहीं, उस संकल्प में है जो उसे धारण करने वाला अपने भीतर जगाता है। त्याग का तेज किसी विश्वविद्यालय की डिग्री से नहीं मापा जाता। आध्यात्मिक ऊँचाई किसी कैमरे की रिकॉर्डिंग से सिद्ध नहीं होती। जिस दिन समाज इस सत्य को समझ लेगा, उसी दिन संत परंपरा के प्रति सम्मान और भी प्रगाढ़ होगा।
सनातन का संदेश सरल है—
साधु का सम्मान करें, विवेक बनाए रखें, धर्म का आदर करें और अपने भीतर के अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित करें।
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥ हर हर महादेव ॥
