2027 मां की सौगंध और हरीश रावत की पुकार: क्या अब बीजेपी की सत्ता परिवर्तित हुई तो हरीश रावत का श्राप माना जाएगा?

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मां की सौगंध और हरीश रावत की पुकार: क्या अब बीजेपी की सत्ता परिवर्तित हुई तो हरीश रावत का श्राप माना जाएगा?
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इस समय पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का भावुक बयान चर्चा के केंद्र में है। अपने ऊपर लग रहे आरोपों के बीच रावत ने मां, मातृभूमि और मां के दूध की सौगंध लेते हुए कहा है कि उन्होंने कभी किसी को नौकरी देने के बदले पैसा तो दूर, चाय-पानी तक नहीं लिया। उन्होंने कहा कि उम्र के इस पड़ाव पर उनके ऊपर कलंक लगाने का प्रयास किया जा रहा है और वे अपनी सफाई के लिए आखिरी दम तक संघर्ष करेंगे।

💔मोहिनी अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


रावत ने अपने बयान में कहा कि उनकी तीन माताएं हैं—जगत जननी मां भगवती, जन्म देने वाली मां और उत्तराखंड की धरती मां। उन्होंने मां जगदंबा को साक्षी मानकर कहा कि यदि उन्होंने किसी काम के बदले पैसा लिया हो तो मां उन्हें इसके लिए दंड दें। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने हजारों लोगों की मदद और सिफारिश की, लेकिन किसी से उसका सौदा नहीं किया।
यह बयान केवल एक राजनेता की सफाई के तौर पर नहीं, बल्कि पहाड़ की उस भावनात्मक परंपरा से भी जुड़ता है, जहां मां, देवभूमि और आराध्य देवता के सामने ली गई सौगंध को व्यक्ति अपने जीवन की सबसे बड़ी नैतिक गवाही मानता है।
सवाल सिर्फ हरीश रावत का नहीं, राजनीति की विश्वसनीयता का भी है
हरीश रावत के निजी सहायक एवं पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े परिसर पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद यह पूरा विवाद सामने आया। रिपोर्टों के मुताबिक 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी ने कई स्थानों पर कार्रवाई की और नकदी, सोना तथा महंगी घड़ियां बरामद किए जाने की जानकारी दी। जांच में कथित तौर पर ओएमआर शीट में हेरफेर और अवैध भुगतान के आरोपों की पड़ताल की जा रही है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—किसी सहयोगी या पूर्व सहयोगी के खिलाफ जांच होना अपने आप में हरीश रावत की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी सिद्ध नहीं करता। उपलब्ध रिपोर्टों में ईडी ने रावत को इस मामले में आरोपी नहीं बताया है। रावत ने भी आरोपों को खारिज करते हुए जांच एजेंसियों के सामने प्रमाण रखने की चुनौती दी है।
यही वह बिंदु है जहां राजनीति से ऊपर कानून और प्रमाण की कसौटी सामने आती है।
हरीश रावत का दर्द और राजनीतिक संघर्ष
हरीश रावत ने कहा है कि 2017 और 2022 में भी उनके खिलाफ आरोप लगाए गए, लेकिन उन्हें उनके अनुसार ठोस प्रमाण नहीं मिले। उनका कहना है कि आज फिर एक योजनाबद्ध तरीके से उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।
उन्होंने यहां तक कहा कि जब तक वे अपने ऊपर लगे कलंक को धो नहीं देते, तब तक मां जगदंबा से जीवन की डोर बनाए रखने की प्रार्थना करते रहेंगे।
यह भाषा राजनीतिक भाषण से आगे निकलकर एक ऐसे व्यक्ति की व्यक्तिगत वेदना का रूप ले लेती है, जिसने अपना पूरा सार्वजनिक जीवन राजनीति में बिताया है और अब अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब सार्वजनिक रूप से देना चाहता है।
रावत ने हालिया विवाद के बीच कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से हटने की घोषणा भी की थी, यह कहते हुए कि उनके कारण पार्टी की भ्रष्टाचार-विरोधी लड़ाई कमजोर नहीं होनी चाहिए। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय कांग्रेस छोड़ने से नहीं था।
कटघरे में कौन? आरोप नहीं, प्रमाण बोलना चाहिए
राजनीति में भ्रष्टाचार के आरोप कोई नई बात नहीं हैं। सत्ता चाहे किसी भी दल की रही हो, समय-समय पर नेताओं, अधिकारियों और उनके नजदीकी लोगों पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन लोकतंत्र में किसी को केवल राजनीतिक आरोप के आधार पर दोषी घोषित कर देना उतना ही खतरनाक है, जितना किसी जांच को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर उसके तथ्यों को बिना जांचे खारिज कर देना।
इसलिए आज जरूरत किसी एक दल या नेता को सामूहिक रूप से कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति से जवाब मांगने की है जिसके खिलाफ प्रमाण सामने आए हैं—चाहे वह सत्ता में हो या विपक्ष में।
अगर किसी ने नौकरी के नाम पर पैसा लिया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। अगर किसी ने पद का दुरुपयोग किया है तो कानून अपना रास्ता तय करे। और यदि किसी निर्दोष व्यक्ति पर राजनीतिक लाभ के लिए झूठा कलंक लगाया गया है तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए।
यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।
पहाड़ में मां की सौगंध का अर्थ
उत्तराखंड के गांवों में मां की सौगंध केवल शब्द नहीं होती। पहाड़ का आदमी जब अपने आराध्य, अपनी मां और अपनी मिट्टी को साक्षी मानकर बोलता है तो वह अपने चरित्र की गवाही देने की कोशिश करता है।
लेकिन आध्यात्मिक आस्था को राजनीतिक निर्णय का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। किसी व्यक्ति की निर्दोषता या दोष का अंतिम निर्धारण जांच, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया से ही होना चाहिए।
फिर भी रावत की सौगंध ने एक गहरा सामाजिक सवाल जरूर खड़ा किया है—क्या राजनीति में आरोप लगाना आसान और प्रमाणित करना कठिन होता जा रहा है?
“हरीश रावत का श्राप माना जाएगा” — एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में
यदि आने वाले समय में राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं तो समर्थक इसे हरीश रावत की उस पीड़ा और संघर्ष की प्रतिक्रिया के रूप में देख सकते हैं, जिसे वे आज सार्वजनिक कर रहे हैं। लेकिन इसे किसी निश्चित चुनावी परिणाम की भविष्यवाणी या दैवी फैसला मानना उचित नहीं होगा।
“हरीश रावत का श्राप माना जाएगा” इसलिए एक राजनीतिक और आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है—उस व्यक्ति की चेतावनी के रूप में, जो कह रहा है कि उस पर लगाया गया कलंक यदि झूठा है तो समय उसका जवाब देगा।
उत्तराखंड की राजनीति में समय कई बार सबसे बड़ा न्यायाधीश साबित हुआ है।
आज हरीश रावत मां भगवती को साक्षी बनाकर अपनी सफाई दे रहे हैं। कल इतिहास तय करेगा कि उनके आरोपों में कितनी सच्चाई थी, जांच में सामने आए तथ्यों का क्या निष्कर्ष निकला और किसके दावे प्रमाण की कसौटी पर टिके।
मां की सौगंध भावनाओं को झकझोर सकती है, लेकिन अंतिम फैसला प्रमाण ही करेगा।
और यही उत्तराखंड के पहाड़ की सबसे बड़ी सीख भी है—
सच को देर लग सकती है, लेकिन अगर वह सच है तो उसे अपनी गवाही के लिए किसी सत्ता की जरूरत नहीं होती।


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