पिथौरागढ़। युवाओं और युवतियों को तकनीकी शिक्षा एवं रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लगभग एक दशक पूर्व गुरना क्षेत्र में स्थापित आईटीआई संस्थान आज अपनी बदहाली और सरकारी उदासीनता की कहानी स्वयं बयां कर रहा है। भवन निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, फर्नीचर और मशीनरी की व्यवस्था भी की गई, लेकिन कुछ समय बाद संस्थान को बंद कर दिए जाने से जनता के धन के उपयोग और सरकारी योजनाओं की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
स्थानीय लोगों के अनुसार संस्थान की स्थापना पर लगभग चार करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, जबकि फर्नीचर एवं तकनीकी उपकरणों पर भी बड़ी धनराशि व्यय की गई। प्रारंभिक वर्षों में शिक्षकों की नियुक्ति कर प्रशिक्षण कार्य शुरू किया गया, किंतु बाद में एक प्रशासनिक निर्णय के तहत संस्थान का संचालन बंद कर दिया गया। परिणामस्वरूप क्षेत्र के युवाओं को तकनीकी शिक्षा से वंचित होना पड़ा।
जानकारों का कहना है कि केवल गुरना ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों में स्थापित कई आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। कहीं शिक्षकों का अभाव है तो कहीं भवन और संसाधन अनुपयोगी पड़े हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि यदि संस्थानों का संचालन ही नहीं होना था तो करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का निवेश किस उद्देश्य से किया गया।
बताया जाता है कि संबंधित संस्थान को अब तक पूर्ण रूप से विभागीय अधीनता में नहीं लिया गया है। दूसरी ओर, वहां स्थापित फर्नीचर और मशीनरी को अन्यत्र स्थानांतरित किए जाने की बातें भी सामने आ रही हैं। वर्तमान में भवन की स्थिति लगातार खराब हो रही है तथा रखरखाव के अभाव में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ गई है।
क्षेत्रीय जनता का कहना है कि सरकारें चुनाव के समय युवाओं को रोजगार, कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा के बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन धरातल पर कई परियोजनाएं अधूरी या बंद पड़ी दिखाई देती हैं। ऐसे में तकनीकी शिक्षा के नाम पर किए गए भारी निवेश का लाभ युवाओं तक नहीं पहुंच पा रहा है।
स्थानीय नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही संस्थान को पुनः संचालित करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो जनआंदोलन तेज हो सकता है। लोगों का कहना है कि विकास का वास्तविक अर्थ भवन खड़े करना नहीं, बल्कि उनमें शिक्षा और रोजगार के अवसरों को जीवित रखना है।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन के बीच तकनीकी शिक्षा संस्थानों का निष्क्रिय होना राज्य के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सरकार और प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि करोड़ों रुपये की लागत से बने ऐसे संस्थानों का भविष्य क्या होगा और युवाओं को उनका वास्तविक लाभ कब मिलेगा।
