‘भारत माता की जय’ का इतिहास: एक नारा, जिसने धर्म से ऊपर उठकर भारत को जोड़ा अजीमुल्ला खान से लेकर ‘जय हिंद’ तक, आजादी की लड़ाई में साझा राष्ट्रवाद की लंबी परंपरा

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‘भारत माता की जय’ केवल तीन शब्दों का उद्घोष भर नहीं है। यह भारत की राष्ट्रीय चेतना, मातृभूमि के प्रति सम्मान और देश की एकता की भावना से जुड़ा हुआ नारा है। इस उद्घोष का इतिहास भारत की उस साझा विरासत की याद दिलाता है, जिसमें अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और समुदायों के लोगों ने देश की आजादी के लिए योगदान दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


‘भारत माता की जय’ के उद्भव को लेकर इतिहास में अलग-अलग मत मिलते हैं। एक प्रचलित मत इसके शुरुआती प्रयोग को 1873 में किरण चंद्र बंद्योपाध्याय के बंगाली नाटक भारत माता के मंचन से जोड़ता है। दूसरी ओर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में अजीमुल्ला खान का नाम भी सामने आता है। कुछ स्रोत उनके साथ ‘मादरे-वतन हिंदुस्तान जिंदाबाद’ जैसे राष्ट्रवादी उद्घोषों को जोड़ते हैं। इतिहास में इस बात पर सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि ‘भारत माता की जय’ शब्दों का पहला प्रयोग अजीमुल्ला खान ने ही किया था। फिर भी उनका नाम भारतीय राष्ट्रवादी चेतना में मुस्लिम योगदान की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आता है।
अजीमुल्ला खान और 1857 की साझा लड़ाई
1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास में हिंदू-मुस्लिम एकता का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। नाना साहेब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर, मौलवी अहमदुल्लाह शाह और अजीमुल्ला खान सहित अनेक लोगों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया।
अजीमुल्ला खान नाना साहेब के निकट सहयोगियों में रहे और 1857 के विद्रोह की राजनीतिक पृष्ठभूमि में उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। उनके साथ मातृभूमि और हिंदुस्तान से जुड़े राष्ट्रवादी उद्घोषों को जोड़ा जाता है।
यह तथ्य भारतीय इतिहास के उस पक्ष को सामने लाता है जहां देश के लिए संघर्ष करने वालों की पहचान उनके धर्म से आगे बढ़कर देखी गई।
1857 के विद्रोह में बहादुर शाह जफर को प्रतीकात्मक नेतृत्व मिला। हिंदू और मुस्लिम सैनिकों तथा नागरिकों ने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ अनेक स्थानों पर संयुक्त प्रतिरोध किया। यह साझा संघर्ष आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवाद की नींव मजबूत करने वाली घटनाओं में शामिल हुआ।
‘वंदे मातरम्’ ने जगाई मातृभूमि की भावना
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के वंदे मातरम् ने भारत को मातृभूमि के रूप में देखने की भावना को व्यापक राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा। आनंदमठ से जुड़े इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरित किया।
1905 में अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाई गई प्रसिद्ध भारत माता चित्रकृति ने भारत माता की कल्पना को दृश्य रूप दिया। राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान साहित्य, कला, गीत और नारों ने मिलकर राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया।
इसी दौर में ‘वंदे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’, ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’, ‘जय हिंद’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे उद्घोष अलग-अलग आंदोलनों और धाराओं में लोकप्रिय हुए।
इन नारों की पृष्ठभूमि अलग थी, मगर इन सभी में देश के प्रति समर्पण और स्वतंत्रता की भावना दिखाई देती है।
‘जय हिंद’ और आजाद हिंद फौज
‘जय हिंद’ को आजाद हिंद आंदोलन और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के संदर्भ में विशेष लोकप्रियता मिली। इस उद्घोष ने भारतीय सैनिकों और नागरिकों के बीच राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत किया।
‘इंकलाब जिंदाबाद’ ने भगत सिंह और उनके साथियों के क्रांतिकारी आंदोलन को आवाज दी। ‘वंदे मातरम्’ ने मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया। ‘भारत माता की जय’ ने मातृभूमि के सम्मान और विजय की भावना को जनसामान्य के बीच लोकप्रिय बनाया।
इस तरह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक नारे या किसी एक विचारधारा से निर्मित आंदोलन नहीं था। यह अनेक विचारों, प्रतीकों, गीतों और नारों से बनी व्यापक राष्ट्रीय धारा थी।
आजादी के बाद कांग्रेस और राष्ट्र निर्माण
1947 में भारत आजाद हुआ तो देश विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था। लाखों लोग विस्थापित हुए। सांप्रदायिक तनाव, गरीबी, अशिक्षा और प्रशासनिक चुनौतियां सामने थीं। ऐसे समय में भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करना एक बड़ी ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी।
तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने संविधान, संसद, लोकतांत्रिक संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय पर्वों को सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस राष्ट्रीय जीवन के प्रमुख पर्व बने। विद्यालयों और सरकारी संस्थानों में तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने, देशभक्ति गीत प्रस्तुत करने और राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित करने की परंपरा मजबूत हुई।
राष्ट्रगान जन गण मन को राष्ट्रीय जीवन में विशेष स्थान मिला। वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त हुआ।
विद्यालयों में राष्ट्रगान के सामूहिक गायन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकारी दिशा-निर्देश भी जारी किए गए। राष्ट्रीय पर्वों के माध्यम से बच्चों में देश, संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का प्रयास हुआ।
यहां एक तथ्य स्पष्ट रखना आवश्यक है—‘भारत माता की जय’ संवैधानिक रूप से राष्ट्रगान की श्रेणी में नहीं आता। इसे राष्ट्रगान की तरह संवैधानिक अनिवार्यता प्राप्त नहीं है। यह भारत की लोकप्रिय राष्ट्रवादी परंपरा का प्रमुख उद्घोष है।
स्कूलों से लेकर राष्ट्रीय पर्वों तक
आजादी के बाद कई पीढ़ियों ने विद्यालयों में 15 अगस्त और 26 जनवरी के कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का अनुभव किया।
सुबह तिरंगा फहराया जाता था। राष्ट्रगान गूंजता था। बच्चे देशभक्ति गीत प्रस्तुत करते थे। ‘वंदे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ के उद्घोष वातावरण में राष्ट्रीय भावना पैदा करते थे।
एक ही पंक्ति में अलग-अलग धर्मों के बच्चे खड़े होते थे। सबके हाथ में तिरंगा होता था। राष्ट्रगान के समय पूरा विद्यालय एक साथ खड़ा होता था।
यही भारत की एकता का व्यावहारिक पाठ था।
राष्ट्र की पहचान नागरिकों की साझी पहचान से बनती है। विद्यालय इस भावना को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की महत्वपूर्ण संस्था रहे हैं।
आज राष्ट्रवाद पर हिंदू-मुस्लिम राजनीति
आज के राजनीतिक दौर में ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रवाद जैसे विषय कई बार हिंदू-मुस्लिम राजनीति के बीच चर्चा में आ जाते हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद को अपनी राजनीतिक पहचान के महत्वपूर्ण विषयों में रखा है। ‘भारत माता की जय’, तिरंगा और राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर भाजपा का राजनीतिक अभियान लगातार मुखर रहा है।
दूसरी ओर भाजपा की राजनीति पर विपक्षी दल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आरोप लगाते रहे हैं। भाजपा की ओर से विपक्ष पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगाए जाते हैं।
इस राजनीतिक बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या राष्ट्रभक्ति किसी एक राजनीतिक दल की पहचान हो सकती है?
तिरंगा किसी पार्टी का प्रतीक नहीं है।
राष्ट्रगान किसी धर्म की संपत्ति नहीं है।
‘जय हिंद’ किसी संगठन की निजी धरोहर नहीं है।
‘वंदे मातरम्’ किसी समुदाय की जागीर नहीं है।
इसी प्रकार ‘भारत माता की जय’ भी भारत के प्रत्येक नागरिक की राष्ट्रीय भावना का हिस्सा हो सकता है।
भाजपा से सवाल, कांग्रेस से भी सवाल
भाजपा से सवाल यह है कि राष्ट्रवाद को चुनावी राजनीति से आगे ले जाकर संवैधानिक नागरिकता और सामाजिक एकता से जोड़ने का प्रयास कितना मजबूत किया जा रहा है।
किसी व्यक्ति की देशभक्ति उसके नाम, धर्म, पहनावे या खान-पान से तय करना उचित आधार नहीं हो सकता। देशभक्ति का वास्तविक मूल्यांकन देश के प्रति जिम्मेदारी, संविधान के प्रति सम्मान और समाज के प्रति नागरिक कर्तव्य से होना चाहिए।
कांग्रेस से भी सवाल है कि स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण की अपनी ऐतिहासिक विरासत को वह नई पीढ़ी के बीच किस तरह प्रस्तुत कर रही है।
कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को विकसित किया। राष्ट्रीय पर्वों, राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक व्यवस्था को सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाने में कांग्रेस सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
इस ऐतिहासिक योगदान को राजनीतिक दावे के साथ-साथ तथ्य और दस्तावेजों के आधार पर नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी आवश्यक है।
भारत माता किसी एक धर्म या दल की नहीं
भारत माता की कल्पना को केवल धार्मिक पहचान से जोड़ना भारतीय राष्ट्रवाद के व्यापक इतिहास को सीमित कर देता है।
भारत माता में हिमालय है। गंगा है। ब्रह्मपुत्र है। समुद्र है। उत्तराखंड के पहाड़ हैं। पंजाब के खेत हैं। राजस्थान का मरुस्थल है। दक्षिण भारत के समुद्री तट हैं। पूर्वोत्तर की पहाड़ियां हैं।
भारत माता की तस्वीर में मंदिर की घंटी भी सुनाई देती है, मस्जिद की अजान भी, गुरुद्वारे की अरदास भी और चर्च की प्रार्थना भी।
यही भारत की वास्तविक पहचान है।
1857 के संघर्ष में मुस्लिम और हिंदू साथ खड़े हुए। स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग समुदायों के लोगों ने जेल यात्राएं कीं। किसी ने ‘वंदे मातरम्’ कहा, किसी ने ‘जय हिंद’, किसी ने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और किसी ने ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’।
इन सभी स्वरों ने मिलकर स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय चेतना तैयार की।
आज जरूरत जोड़ने वाले राष्ट्रवाद की
आज भारत को ऐसे राष्ट्रवाद की आवश्यकता है जो नागरिकों को एक-दूसरे के करीब लाए। राष्ट्रवाद का अर्थ देश के प्रति जिम्मेदारी, संविधान के प्रति सम्मान और नागरिकों के बीच समानता की भावना से होना चाहिए।
‘भारत माता की जय’ कहने वाले हिंदू की देशभक्ति सम्मान की पात्र है। यही सम्मान उस मुस्लिम भारतीय की देशभक्ति को भी मिलना चाहिए जो अपने देश के लिए समर्पित है।
किसी भारतीय को अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए धार्मिक पहचान की परीक्षा से गुजरना पड़े, ऐसी स्थिति भारत की साझा विरासत के अनुरूप नहीं है।
भारत की ताकत उसकी विविधता में है।
‘भारत माता की जय’ का सबसे व्यापक अर्थ यही होना चाहिए कि भारत एक है, भारत सबका है और भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक धर्म, जाति या राजनीतिक दल से बड़ी है।
जिस भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अजीमुल्ला खान जैसे मुस्लिम व्यक्तित्वों का योगदान रहा, जिस भारत के राष्ट्र निर्माण में अलग-अलग समुदायों ने अपना श्रम और बलिदान दिया, उस भारत की सबसे बड़ी पहचान उसकी साझी राष्ट्रीय चेतना है।
भारत माता किसी एक दल की संपत्ति नहीं। भारत माता हर भारतीय की साझा मातृभूमि हैं।
यही भावना ‘वंदे मातरम्’ से ‘जय हिंद’ तक और ‘भारत माता की जय’ से लेकर संविधान की प्रस्तावना तक दिखाई देती है।
देश एक है, तिरंगा एक है, संविधान एक है और भारत की आत्मा भी एक है।


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