संपादकीय: महाराष्ट्र से सबक ले उत्तराखंड, होटलों और रोडवेज में बोतलबंद पानी की लूट पर लगे लगाम

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महाराष्ट्र के चर्चित आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे ने होटलों और रेस्टोरेंटों में ग्राहकों को मुफ्त एवं सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का जो आदेश जारी किया है, वह केवल महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल है। उत्तराखंड सरकार को भी इस दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


देवभूमि उत्तराखंड गंगा, यमुना, सरस्वती समेत अनगिनत नदियों और प्राकृतिक जलस्रोतों की भूमि है। विडंबना यह है कि जिस प्रदेश का पानी पूरी दुनिया में शुद्धता और प्राकृतिक गुणों के लिए जाना जाता है, वहीं आज लोगों को महंगे दामों पर बोतलबंद पानी खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
राज्य के रोडवेज बस अड्डों, लंबी दूरी की बसों और अनेक होटलों में यह आम शिकायत है कि नल या टंकी के पानी को बोतलों में भरकर ब्रांडेड पानी के नाम पर 20 से 30 रुपये या उससे अधिक कीमत पर बेचा जाता है। कई जगह ग्राहक के बैठते ही बिना पूछे पानी की बोतल टेबल पर रख दी जाती है, जिसका भुगतान बाद में बिल में जोड़ दिया जाता है। इससे उपभोक्ताओं पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उत्तराखंड के पास अपने प्राकृतिक जलस्रोतों की अपार संपदा है, तो फिर पहाड़ के लोगों और यहां आने वाले पर्यटकों को बाहर से आने वाले तथाकथित “ब्रांडेड पानी” पर क्यों निर्भर होना पड़े? यह स्थिति उस कहावत को चरितार्थ करती है कि “पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम नहीं आती।”
आज जरूरत है कि उत्तराखंड सरकार महाराष्ट्र की तर्ज पर स्पष्ट आदेश जारी करे—
सभी होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट ग्राहकों को मुफ्त एवं सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराएं।
बिना मांग के ग्राहकों की टेबल पर बोतलबंद पानी रखना बंद किया जाए।
होटलों में स्पष्ट बोर्ड लगाया जाए कि मुफ्त पेयजल उपलब्ध है।
रोडवेज बसों और बस अड्डों पर पेयजल की गुणवत्ता की नियमित जांच हो।
टंकी या नल का पानी ब्रांडेड बोतलों में भरकर बेचने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
स्थानीय प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
उत्तराखंड की पहचान उसकी नदियां, झरने और प्राकृतिक जलधाराएं हैं। यदि हम अपने ही जलस्रोतों पर भरोसा नहीं करेंगे तो फिर उनकी उपयोगिता क्या रह जाएगी? पहाड़ का पानी पहाड़ के लोगों और यहां आने वाले पर्यटकों तक सम्मानपूर्वक पहुंचे, यही समय की मांग है।
सरकार, खाद्य सुरक्षा विभाग और पर्यटन विभाग को इस विषय का तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। पेयजल कोई विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि नागरिक का मूल अधिकार है। होटल व्यवसायियों को भी यह समझना होगा कि सेवा और जनहित व्यापार से ऊपर हैं।
महाराष्ट्र ने पहल कर दी है, अब उत्तराखंड को निर्णय लेना है कि वह जनता के हित में कब कदम उठाता है।


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