गदरपुर। समाज में नेत्रदान को महादान कहा जाता है, क्योंकि यह ऐसा दान है जो किसी व्यक्ति के निधन के बाद भी दो लोगों के जीवन में प्रकाश भर सकता है। गदरपुर में इसी मानवीय संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रेरणादायी उदाहरण उस समय देखने को मिला, जब नगर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. गोपाल श्रीवास्तव ने अपनी धर्मपत्नी श्रीमती शैलवाला श्रीवास्तव के निधन के उपरांत उनके नेत्रदान के लिए सहमति प्रदान की। इस निर्णय ने न केवल दो जरूरतमंद लोगों के जीवन में रोशनी की नई उम्मीद जगाई, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा संभव है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
श्रीमती शैलवाला श्रीवास्तव के निधन के पश्चात परिवार ने दुःख की इस घड़ी में भी साहस और संवेदनशीलता का परिचय देते हुए नेत्रदान का निर्णय लिया। परिवार के इस प्रेरणादायी कदम की नगरभर में सराहना की जा रही है। नेत्रदान की प्रक्रिया भारत विकास परिषद एवं भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी, गदरपुर के संयुक्त सहयोग से सफलतापूर्वक संपन्न कराई गई।
नेत्रदान की संपूर्ण प्रक्रिया महाराजा अग्रसेन ग्लोबल चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन एस. के. मित्तल की उपस्थिति में संपन्न हुई। सी.आर. मित्तल नेत्रदान केंद्र के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. एल. एम. उप्रेती के निर्देशन में आई टेक्नीशियन मनीष रावत ने आवश्यक चिकित्सकीय एवं कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करते हुए अत्यंत सावधानीपूर्वक नेत्र प्राप्त किए। समयबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से पूरी प्रक्रिया संपन्न होने के बाद नेत्रों को सुरक्षित रूप से संरक्षित किया गया, ताकि उन्हें जल्द ही दो दृष्टिबाधित व्यक्तियों के प्रत्यारोपण के लिए उपयोग में लाया जा सके।
इस अवसर पर भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी, गदरपुर के चेयरमैन डॉ. विप्रजीत विश्वास ‘सोनू’ ने कहा कि नेत्रदान वास्तव में सबसे महान दानों में से एक है। उन्होंने बताया कि देश में लाखों लोग कॉर्निया संबंधी समस्याओं के कारण दृष्टिहीनता का जीवन जी रहे हैं। यदि अधिक से अधिक लोग मृत्यु के बाद नेत्रदान का संकल्प लें तो हजारों लोगों को नया जीवन मिल सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीमती शैलवाला श्रीवास्तव का नेत्रदान समाज के लिए प्रेरणा बनेगा और लोगों में जागरूकता बढ़ाएगा।
भारत विकास परिषद के अध्यक्ष राजीव ग्रोवर ने कहा कि किसी भी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोना अत्यंत पीड़ादायक होता है, लेकिन ऐसे कठिन समय में भी समाजहित को सर्वोपरि रखते हुए नेत्रदान का निर्णय लेना वास्तव में अनुकरणीय है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्य मानवता की सर्वोच्च सेवा हैं और समाज को ऐसे उदाहरणों से सीख लेकर आगे आना चाहिए।
महाराजा अग्रसेन ग्लोबल चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन एस. के. मित्तल ने श्रीमती शैलवाला श्रीवास्तव के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनके इस निर्णय की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का जीवन समाप्त होने के बाद भी उसके नेत्र किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में उजाला भर सकते हैं। यही नेत्रदान की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट लगातार नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहा है और समाज से अधिक से अधिक लोगों को इस पुनीत कार्य से जुड़ने का आह्वान किया।
इस दौरान उपस्थित सभी लोगों ने डॉ. गोपाल श्रीवास्तव और उनके परिवार के साहस एवं सामाजिक सोच की सराहना की। सभी ने कहा कि ऐसे प्रेरक उदाहरण समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते हैं। यदि प्रत्येक परिवार इस प्रकार की सोच अपनाए तो देश में कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा कर रहे हजारों मरीजों को नई दृष्टि मिल सकती है।
इस अवसर पर डॉ. अजय श्रीवास्तव, डॉ. गोपाल श्रीवास्तव, राकेश भूडी, बंटी सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
महाराजा अग्रसेन ग्लोबल चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टियों ने परिवार के सभी सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने समाज के सामने सेवा और मानवता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। ट्रस्ट की ओर से भारत विकास परिषद, भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी, सोचो डिफरेंट संस्था तथा इस अभियान से जुड़े सभी स्वयंसेवकों एवं सामाजिक संगठनों के योगदान की भी सराहना की गई। ट्रस्ट ने कहा कि इन संस्थाओं के निरंतर प्रयासों के कारण क्षेत्र में नेत्रदान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और अधिक लोग इस पुनीत कार्य के लिए आगे आ रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार किसी व्यक्ति के निधन के कुछ घंटों के भीतर नेत्रदान किया जा सकता है। इससे प्राप्त कॉर्निया को सुरक्षित रखकर उन मरीजों में प्रत्यारोपित किया जाता है जिनकी दृष्टि कॉर्निया की बीमारी के कारण चली गई होती है। एक व्यक्ति के दोनों नेत्र दो अलग-अलग व्यक्तियों को नई रोशनी दे सकते हैं। यही कारण है कि नेत्रदान को “महादान” की संज्ञा दी गई है।
गदरपुर में संपन्न यह नेत्रदान केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया है। श्रीमती शैलवाला श्रीवास्तव भले ही इस दुनिया में नहीं रहीं, लेकिन उनके नेत्र अब दो अन्य लोगों की आंखों के माध्यम से संसार की सुंदरता देखेंगे। यह प्रेरणादायी कार्य समाज को यह संदेश देता है कि जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल स्वयं के लिए जीना नहीं, बल्कि अपने जाने के बाद भी दूसरों के जीवन में प्रकाश और आशा का संचार करना है।
निस्संदेह, डॉ. गोपाल श्रीवास्तव एवं उनके परिवार द्वारा लिया गया यह निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा तथा अधिक से अधिक लोगों को नेत्रदान के लिए संकल्पित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। नेत्रदान वास्तव में महादान है, क्योंकि इससे किसी के जीवन का अंधकार दूर होकर नई रोशनी, नया आत्मविश्वास और नई उम्मीद जन्म लेती है।
