रुद्रपुर। उत्तराखंड के तराई क्षेत्र का प्रमुख शहर रुद्रपुर हर वर्ष बाबा अमरनाथ यात्रा के दौरान शिवभक्ति में पूरी तरह रंग जाता है। शहर और आसपास के किच्छा, गदरपुर, बाजपुर, दिनेशपुर, सितारगंज, खटीमा और ऊधम सिंह नगर जिले के अन्य क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए जम्मू-कश्मीर स्थित पवित्र अमरनाथ गुफा की कठिन यात्रा पर निकलते हैं। कई श्रद्धालु वर्षों से लगातार यात्रा कर रहे हैं और उनके लिए यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुभव होता है।
लेकिन इस वर्ष अमरनाथ यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद प्राकृतिक हिमलिंग के तेजी से पिघल जाने की खबर ने रुद्रपुर सहित पूरे उत्तराखंड के श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया। जो श्रद्धालु यात्रा के शुरुआती दिनों में गुफा तक पहुंचे, उन्हें बाबा बर्फानी के अपेक्षाकृत बड़े स्वरूप के दर्शन हुए, जबकि बाद में पहुंचे अधिकांश श्रद्धालुओं को हिमलिंग का बहुत छोटा स्वरूप ही देखने को मिला। कई श्रद्धालुओं ने इसे भगवान शिव की इच्छा मानकर स्वीकार किया, लेकिन उनके मन में यह सवाल भी उठा कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि जो हिमलिंग पहले सावन भर श्रद्धालुओं को दर्शन देता था, वह अब यात्रा शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर ही लगभग अंतर्ध्यान हो जाता है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रुद्रपुर से इस वर्ष भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के जत्थे अमरनाथ यात्रा पर रवाना हुए। कई श्रद्धालु बालटाल मार्ग से तो कई पहलगाम मार्ग से पवित्र गुफा तक पहुंचे। यात्रा पूरी करने के बाद लौटे श्रद्धालुओं ने बताया कि गुफा तक पहुंचने का रोमांच, “हर-हर महादेव” के जयघोष और बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच भगवान शिव की नगरी का अनुभव आज भी उतना ही अलौकिक है, लेकिन हिमलिंग का तेजी से पिघल जाना मन में एक कसक छोड़ गया।
श्रद्धालुओं का कहना है कि वर्षों पहले जब वे अमरनाथ यात्रा पर गए थे, तब विशाल हिमलिंग के दर्शन होते थे और उसका आकार यात्रा के अधिकांश समय तक बना रहता था। इस बार गुफा में पहुंचने पर हिमलिंग का अधिकांश हिस्सा पिघल चुका था। कई श्रद्धालुओं ने कहा कि दर्शन तो हुए, लेकिन बाबा बर्फानी के पूर्ण स्वरूप का दर्शन नहीं मिल पाने से थोड़ी निराशा अवश्य हुई।
हालांकि श्रद्धालुओं ने स्पष्ट कहा कि उनकी आस्था हिमलिंग के आकार पर निर्भर नहीं है। उनके लिए अमरनाथ गुफा स्वयं भगवान शिव का धाम है। चाहे हिमलिंग छोटा हो या बड़ा, दर्शन का महत्व कम नहीं होता। फिर भी वर्षों से विशाल हिमलिंग देखने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस बार का दृश्य भावुक कर देने वाला रहा।
वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अमरनाथ गुफा में बनने वाला हिमलिंग किसी व्यक्ति द्वारा तैयार नहीं किया जाता। यह पूरी तरह प्राकृतिक प्रक्रिया का परिणाम है। गुफा की छत से लगातार टपकने वाली पानी की बूंदें अत्यधिक कम तापमान में जमकर बर्फ का स्तंभ बनाती हैं, जिसे स्टैलेग्माइट कहा जाता है। यही प्राकृतिक बर्फ का स्तंभ श्रद्धालुओं के लिए बाबा बर्फानी का स्वरूप होता है। इसका आकार हर वर्ष मौसम, तापमान, बर्फबारी और गुफा के भीतर की प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है।
इस वर्ष यात्रा 3 जुलाई से शुरू हुई और शुरुआती चार दिनों में ही 85 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा अमरनाथ के दर्शन कर चुके थे। 23 मई को जारी तस्वीरों में हिमलिंग लगभग सात फीट ऊंचा दिखाई दे रहा था। 29 जून को प्रथम पूजा के समय भी इसका आकार पांच फीट से अधिक था, लेकिन 6 जुलाई तक सामने आई तस्वीरों में इसका अधिकांश भाग पिघल चुका था। यही कारण है कि बाद में पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं को पहले जैसा विशाल हिमलिंग देखने का अवसर नहीं मिला।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तेजी से दिखाई दे रहा है। सर्दियों में पहले की तुलना में कम बर्फबारी हो रही है और गर्मियों में तापमान लगातार बढ़ रहा है। यही कारण है कि प्राकृतिक बर्फ लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह पा रही। यह बदलाव केवल अमरनाथ तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय के ग्लेशियरों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अमरनाथ यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी, हेलीकॉप्टर सेवाएं, सड़क निर्माण, बिजली की व्यवस्था और अन्य मानवीय गतिविधियां भी स्थानीय वातावरण पर कुछ प्रभाव डालती हैं। हालांकि उनका कहना है कि इन सभी कारणों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग कहीं अधिक बड़ा कारण है। बढ़ते तापमान और बदलते मौसम ने हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
रुद्रपुर के पर्यावरण प्रेमियों का भी मानना है कि हिमालय केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की जल सुरक्षा का आधार है। यदि ग्लेशियर लगातार पिघलते रहे तो भविष्य में इसका असर नदियों, कृषि, पेयजल और पूरे पर्यावरण पर दिखाई देगा। इसलिए अमरनाथ का हिमलिंग केवल धार्मिक विषय नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलते स्वरूप का भी संकेत है।
रुद्रपुर के कई श्रद्धालुओं ने कहा कि यात्रा के दौरान उन्हें प्रशासन की व्यवस्थाएं संतोषजनक मिलीं। सुरक्षा, चिकित्सा और आवागमन की व्यवस्था बेहतर रही, लेकिन प्रकृति के सामने किसी की नहीं चलती। उन्होंने कहा कि यदि मौसम तेजी से बदल रहा है तो आने वाले समय में यात्रा प्रबंधन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि अमरनाथ यात्रा को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए यात्रियों की संख्या का वैज्ञानिक प्रबंधन, प्लास्टिक पर सख्ती, कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयास, स्वच्छता और संवेदनशील क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित करना आवश्यक होगा। इससे गुफा और आसपास के प्राकृतिक वातावरण पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि भगवान शिव का स्वरूप अनंत और निराकार है। हिमलिंग प्रकृति द्वारा निर्मित दिव्य प्रतीक है, लेकिन श्रद्धा किसी आकार की मोहताज नहीं होती। इसलिए हिमलिंग छोटा हो या बड़ा, श्रद्धालुओं की भक्ति और विश्वास में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
फिर भी रुद्रपुर से लौटे कई श्रद्धालुओं की आंखों में एक सवाल जरूर दिखाई देता है—क्या आने वाली पीढ़ियां भी उसी भव्य बाबा बर्फानी के दर्शन कर पाएंगी, जिसकी तस्वीरें और अनुभव वर्षों से लोग सुनते और देखते आए हैं? यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं रुकी, तो यह चिंता केवल अमरनाथ तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे हिमालय के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
आस्था आज भी अडिग है। “हर-हर महादेव” के जयघोष आज भी अमरनाथ की वादियों में उसी श्रद्धा से गूंज रहे हैं। रुद्रपुर से हर वर्ष की तरह इस बार भी हजारों श्रद्धालु बाबा के दरबार पहुंचे और अगले वर्ष फिर आने का संकल्प लेकर लौटे। लेकिन इस बार उनके साथ एक संदेश भी लौटा—यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी तभी बाबा बर्फानी का दिव्य स्वरूप आने वाली पीढ़ियों को भी उसी भव्यता के साथ दर्शन देगा।
