उत्तराखंड में इन दिनों यदि किसी सरकारी योजना पर सबसे अधिक बहस हो रही है तो वह है—स्मार्ट मीटर। बिजली के इन नए मीटरों को लेकर गांव से लेकर शहर तक चर्चा है। चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक लोग अपनी-अपनी राय दे रहे हैं। कोई इसे आधुनिक तकनीक की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है तो कोई इसे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ का कारण मान रहा है। लेकिन इन दोनों दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सच क्या है?
हाल ही में देहरादून के शिवालिक क्षेत्र में स्मार्ट मीटर लगाने का विरोध करने वाले एक व्यापारी के खिलाफ यूपीसीएल द्वारा मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद यह बहस और तेज हो गई। प्रांतीय उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के जिलाध्यक्ष संजीव नैय्यर ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए कहा कि व्यापार मंडल स्मार्ट मीटर का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि किसी भी उपभोक्ता पर उसकी सहमति के बिना स्मार्ट मीटर थोपने का विरोध कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि व्यापारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए तो संगठन मुख्यमंत्री से मिलेगा और आवश्यकता पड़ने पर हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाएगा।
यहीं से एक नई बहस शुरू होती है।
क्या किसी सरकारी योजना का विरोध करने पर मुकदमा दर्ज होना चाहिए? यदि कोई सरकारी कर्मचारी के साथ अभद्रता करता है, सरकारी कार्य में बाधा डालता है या कानून-व्यवस्था बिगाड़ता है तो निश्चित रूप से कानून अपना काम करेगा। लेकिन यदि कोई नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करता है तो लोकतंत्र में उसकी बात भी सुनी जानी चाहिए। इसलिए यह आवश्यक है कि शिवालिक क्षेत्र में दर्ज मुकदमे की पूरी सच्चाई भी सार्वजनिक हो। आखिर किन परिस्थितियों में मुकदमा दर्ज हुआ? क्या केवल विरोध के कारण कार्रवाई हुई या कोई अन्य कानूनी कारण भी था? जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा, तब तक लोगों के मन में यह आशंका बनी रहेगी कि स्मार्ट मीटर का विरोध करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती।
दूसरी ओर यूपीसीएल लगातार यह दावा कर रहा है कि स्मार्ट मीटर बिजली व्यवस्था को आधुनिक, पारदर्शी और अधिक सटीक बनाएंगे। विभाग का कहना है कि इससे वास्तविक बिजली खपत के आधार पर बिल बनेगा, रीडिंग की त्रुटियां कम होंगी और उपभोक्ता अपने बिजली उपयोग की निगरानी स्वयं कर सकेंगे। विभाग की ओर से अब तक सकारात्मक बातें ही सामने आई हैं।
लेकिन जनता की अदालत में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
सोशल मीडिया पर रोज ऐसे वीडियो और पोस्ट वायरल होते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि पहले एक हजार रुपये आने वाला बिजली बिल अब दो हजार या ढाई हजार रुपये तक पहुंच गया है। कई लोग इसे स्मार्ट मीटर का परिणाम बताते हैं। दूसरी ओर ऐसे भी उपभोक्ता हैं जो साफ कहते हैं कि उनके यहां स्मार्ट मीटर लगने के बाद भी बिल पहले जैसा ही आ रहा है। उन्हें किसी तरह की अतिरिक्त परेशानी नहीं हुई।
जब एक ही तकनीक को लेकर दो बिल्कुल अलग-अलग अनुभव सामने आ रहे हों तो किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
दुर्भाग्य यह है कि आज सोशल मीडिया पर किसी भी दावे को बिना जांचे-परखे सच मान लिया जाता है। एक वीडियो वायरल होता है और लोग उसे अंतिम सत्य मान लेते हैं। दूसरी तरफ सरकारी विभाग प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देता है और मान लेता है कि जनता आश्वस्त हो गई। जबकि सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं हो सकती है।
इस पूरे विवाद में राजनीति भी खुलकर दिखाई देती है। उत्तराखंड में स्मार्ट मीटर के खिलाफ सबसे मुखर विरोध कांग्रेस पार्टी ने किया है। कांग्रेस लगातार प्रदर्शन कर रही है और सरकार पर जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने का आरोप लगा रही है।
दूसरी ओर भाजपा सरकार इसे बिजली व्यवस्था में सुधार की दिशा में आवश्यक कदम बता रही है।
दिलचस्प बात यह भी है कि उत्तराखंड की अन्य विपक्षी पार्टियां—उत्तराखंड क्रांति दल, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दल—इस मुद्दे पर कांग्रेस जितनी सक्रिय नहीं दिखीं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक संघर्ष का विषय बन गया है या वास्तव में यह आम जनता का मुद्दा है? इसका उत्तर भी आने वाला समय ही देगा।
लेकिन राजनीति से अलग एक और सवाल है, जो सबसे महत्वपूर्ण है।
यदि वास्तव में स्मार्ट मीटर से बिल बढ़ रहे हैं तो सरकार को स्वतंत्र तकनीकी जांच करानी चाहिए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि बिल नहीं बढ़ रहे तो भी विस्तृत आंकड़े जनता के सामने रखने चाहिए। कितने उपभोक्ताओं के बिल पहले और बाद में समान रहे? कितनों के बढ़े? कितनों के घटे? पारदर्शिता ही विश्वास की पहली शर्त है।
केवल यह कह देना कि “सब ठीक है” या केवल यह कह देना कि “सब गलत है”—दोनों ही लोकतांत्रिक दृष्टि से पर्याप्त नहीं हैं।
आज जरूरत है तथ्यों की।
एक पत्रकार के रूप में मेरा मानना है कि पत्रकारिता का काम किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता बनना नहीं, बल्कि समाज के सामने सत्य रखना है। इसलिए बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
सच यह है कि अभी उत्तराखंड में लाखों उपभोक्ताओं के यहां स्मार्ट मीटर लगने बाकी हैं। जिन घरों में लगे हैं, वहां भी अनुभव अलग-अलग हैं। ऐसे में पूरे राज्य के लिए एक ही निष्कर्ष निकाल देना न्यायसंगत नहीं होगा।
कुछ समय बाद मेरे घर पर भी स्मार्ट मीटर लगाया जाएगा। उस दिन से मैं केवल उपभोक्ता नहीं रहूंगा, बल्कि इस पूरी व्यवस्था का प्रत्यक्ष गवाह भी बनूंगा। तब मैं अपने पुराने और नए बिजली बिलों की तुलना करूंगा। बिजली की यूनिट, खपत, बिलिंग पैटर्न और हर छोटे-बड़े बदलाव का रिकॉर्ड रखूंगा। यदि वास्तव में बिल बढ़ता है तो उसके कारणों की पड़ताल करूंगा। यदि कोई अंतर नहीं होगा तो वह भी पूरी ईमानदारी से लिखूंगा।
क्योंकि पत्रकारिता का पहला धर्म है—जो देखा, वही लिखा; जो साबित हुआ, वही कहा।
न सरकार को खुश करने के लिए सच्चाई बदली जा सकती है और न विपक्ष को खुश करने के लिए डर फैलाया जा सकता है।
स्मार्ट मीटर का अंतिम फैसला न राजनीतिक मंच करेगा, न सोशल मीडिया और न ही अफवाहें। इसका फैसला लाखों उपभोक्ताओं का वास्तविक अनुभव करेगा।
सरकार की जिम्मेदारी है कि लोगों के मन से डर दूर करे। यूपीसीएल की जिम्मेदारी है कि शिकायतों का समयबद्ध समाधान करे और पूरी पारदर्शिता बरते। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यात्मक सवाल उठाए। और मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह बिना पूर्वाग्रह दोनों पक्षों की जांच करे।
आखिर में केवल एक बात—
तकनीक कभी अच्छी या बुरी नहीं होती, उसका उपयोग और उसका परिणाम उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं।
इसलिए आज आवश्यकता न अंध-समर्थन की है और न अंध-विरोध की। आवश्यकता है धैर्य, पारदर्शिता, तथ्यों और ईमानदार समीक्षा की।
हम भी वही करेंगे। पहले स्मार्ट मीटर लगेगा, फिर उसका अनुभव होगा, उसके बाद तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकलेगा। क्योंकि पत्रकारिता में सबसे बड़ा न्यायाधीश न सत्ता होती है, न विपक्ष—सबसे बड़ा न्यायाधीश सत्य होता है। और सत्य तक पहुंचने का रास्ता केवल अनुभव, प्रमाण और निष्पक्ष पड़ताल से होकर गुजरता है।
मेरी कलम से…स्मार्ट मीटर: फैसला अफवाहों से नहीं, अनुभव और तथ्यों से होगा? स्मार्ट मीटर: तकनीक का सवाल या भरोसे की परीक्षा
