उत्तराखंड की हसीन वादियों में बीते कुछ सालों से एक ऐसा तूफान सुलग रहा है, जिसने सूबे के युवाओं के भविष्य को झकझोर कर रख दिया है। यह तूफान है—सरकारी नौकरियों में भ्रष्टाचार, पेपर लीक और नकल माफिया का मकड़जाल। राज्य के राजनीतिक गलियारों से लेकर चाय की टपरियों तक आज एक ही बहस छिड़ी है: क्या भ्रष्टाचार को दबा देना राजनीतिक दलों के लिए फायदेमंद है, या उसे उजागर करके व्यवस्था की सर्जरी करना आत्मघाती कदम है? इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस सियासी शह-मात के खेल में आखिरकार बलि किसकी चढ़ रही है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
दो सरकारों की कार्यशैली: ‘दबाने की राहत’ बनाम ‘उजागर करने की आफत’
उत्तराखंड का चुनावी इतिहास गवाह रहा है कि भर्ती परीक्षाओं में धांधली कोई नई बीमारी नहीं है। लेकिन दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों—कांग्रेस और भाजपा—का इस बीमारी से निपटने का तरीका बिल्कुल जुदा रहा है।
- कांग्रेस काल: ‘सेटिंग-गेटिंग’ की खामोशी और राजनीतिक ढाल
एक दौर वह था जब राज्य में ‘सेटिंग-गेटिंग’ के जरिए बैकडोर से नियुक्तियों की खबरें आम थीं। पेपर लीक होते थे, परीक्षाएं विवादों में घिरती थीं, लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग उसे ‘सिस्टम की छोटी-मोटी त्रुटि’ कहकर दबा देते थे।
फायदा: मामलों को दबाने से सरकार की छवि बेदाग दिखती थी। कोई बड़ी हेडलाइन नहीं बनती थी, विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा नहीं मिलता था और प्रशासनिक स्थिरता बनी रहती थी।
नुकसान: यह खामोशी कैंसर को अंदर ही अंदर बढ़ाने जैसी थी, जिसने अंततः पूरे सिस्टम को सड़ा दिया। - भाजपा काल: घोटालों का विस्फोट और कड़े फैसले की चुनौती
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने एक अलग रास्ता चुना। जब UKSSSC और अन्य भर्ती घोटालों के जिन्न बाहर आए, तो सरकार ने उन्हें दबाने के बजाय एसटीएफ (STF) और विजिलेंस की खुली छूट दे दी।
मुसीबत का सबब: इतिहास के मुर्दों को उखाड़ना और वर्तमान की चोरियों को पकड़ना भाजपा के लिए ही गले की हड्डी बन गया। जब हाकम सिंह जैसे सफेदपोश और आयोग के भीतर बैठे अधिकारी जेल जाने लगे, तो जनता में यह संदेश गया कि ‘हर तरफ भ्रष्टाचार है’। विपक्ष को हर रोज एक नया मुद्दा मिलने लगा और सरकार लगातार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। यानी, सच को उजागर करना ही सरकार के लिए सबसे बड़ी सियासी आफत बन गया।
भ्रष्टाचार को दबाना: यह किस श्रेणी का अपराध है?
जब कोई चुनी हुई सरकार या सिस्टम भ्रष्टाचार को देखकर भी आंखें मूंद लेता है, तो कानून और नैतिकता की भाषा में इसे ‘अपराधिक संलिप्तता’ (Criminal Connivance) और ‘कर्तव्य का परित्याग’ (Dereliction of Duty) कहा जाता है।
यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संस्थागत डकैती है। भ्रष्टाचार को दबाना सीधे तौर पर योग्य युवाओं के अधिकारों की हत्या है। यह समाज में इस धारणा को जन्म देता है कि ‘ईमानदारी बेवकूफी है और चापलूसी ही सफलता की कुंजी है।’ किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे आत्मघाती स्थिति दूसरी नहीं हो सकती।
सबसे बड़ी हानि किसकी? त्रिकोणीय त्रासदी
इस पूरे सियासी दंगल में सबसे ज्यादा नुकसान किसी नेता या दल का नहीं, बल्कि राज्य के मूल स्तंभों का हुआ है:
प्रभावित पक्ष नुकसान का स्वरूप
१. बच्चे (युवा) उनकी उम्र के सबसे सुनहरे साल पुस्तकालयों और धरने-प्रदर्शनों में बीत गए। कई युवा ओवरएज हो गए। उनका पढ़ाई और योग्यता से भरोसा उठ गया, जो कि एक मानसिक अवसाद की तरह है।
२. अभिभावक माता-पिता ने पेट काटकर, जमीन गिरवी रखकर या कर्ज लेकर बच्चों को देहरादून और हल्द्वानी जैसे शहरों में कोचिंग के लिए भेजा। उनका न केवल पैसा डूबा, बल्कि अपने बच्चों को सफल देखने का सपना भी टूट गया।
३. सिस्टम (व्यवस्था) जब अयोग्य और भ्रष्ट लोग पैसों के दम पर कुर्सियों पर बैठते हैं, तो पूरी नौकरशाही पंगु हो जाती है। उत्तराखंड का यह इतिहास रहा है कि भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने राज्य की साख को देश के नक्शे पर धूमिल किया है।
कड़ा नकल कानून और जेल की सलाखें: सुनहरे भविष्य की उम्मीद?
कहा जाता है कि कड़वी दवा बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी होती है। भाजपा सरकार द्वारा लाया गया देश का सबसे सख्त नकल विरोधी कानून (जिसमें आजीवन कारावास और ₹10 करोड़ तक के जुर्माने का प्रावधान है) और 100 से अधिक नकल माफियाओं का जेल जाना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक कदम है।
क्या यह सुनहरे भविष्य का सपना है?
हां, क्योंकि: इस कड़े कानून और ताबड़तोड़ जेल की कार्रवाइयों ने नकल माफियाओं की रीढ़ तोड़ दी है। अब किसी भी अधिकारी या दलाल के मन में पेपर लीक करने से पहले अपनी संपत्ति जब्त होने और पूरी जिंदगी जेल में सड़ने का खौफ पैदा हुआ है। यह पारदर्शी भविष्य की पहली मजबूत सीढ़ी है।
चुनौती अभी बाकी है: कानून कागजों पर कितना भी मजबूत क्यों न हो, जब तक भ्रष्ट अधिकारियों और सफेदपोश राजनेताओं के गठजोड़ को पूरी तरह नेस्तनाबूद नहीं किया जाता, तब तक व्यवस्था पूरी तरह स्वच्छ नहीं होगी।
निष्कर्ष: इतिहास लिखेगा न्याय
उत्तराखंड के इस दौर को इतिहास किस रूप में याद रखेगा? क्या उसे उस दौर के रूप में याद किया जाएगा जब ‘राहत’ के नाम पर भ्रष्टाचार को दबाकर राज्य को खोखला किया गया? या फिर उस दौर के रूप में जब ‘मुसीबतें’ झेलकर भी सरकार ने सिस्टम की गंदगी को साफ करने का साहस दिखाया?
सियासी नफा-नुकसान अपनी जगह है, लेकिन उत्तराखंड के युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए इस नासूर का फटना बेहद जरूरी था। यदि अब भी पुरानी और नई सभी फर्जी भर्तियों की निष्पक्ष जांच होकर दोषियों को सजा मिलती रही, तो निश्चित ही यह उत्तराखंड के एक ‘स्वच्छ और स्वर्णिम भविष्य’ की शुरुआत होगी।
