उनके इन शब्दों में जहां एक ओर मां का वात्सल्य छलका, वहीं सक्रिय राजनीति से दूर रहने की टीस और कसक भी साफ नजर आई।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
अपनी पोस्ट में हरीश रावत ने बताया कि कैसे ब्लॉक प्रमुख के चुनाव से उनकी राजनीतिक यात्रा की अप्रत्याशित शुरुआत हुई थी। दोस्तों और चाचा के कहने पर अनजाने में भरा गया पर्चा उनकी जिंदगी का मोड़ बन गया। उस वक्त आर्थिक तंगी के बीच जब पैसों की बात उठी, तो उनकी मां ने अपनी धोती की गांठ से 27 रुपये निकालकर दिए थे और कहा था- पैसों की बात आए तो पीछे मत हटना, जमीन बेच देंगे, पर लड़ना… डटकर लड़ना।
मां को याद किया
मां की उस सीख को याद करते हुए रावत ने लिखा कि उस दौरान मात्र दो रुपये खर्च हुए थे और वे चुनाव जीत गए। उसके बाद से उन्होंने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार संघर्ष करते रहे।
भावुक पोस्ट में क्या लिखा
जुझारू नेता के रूप में जाने जाने वाले हरीश के शब्दों में आज अपनी बीमारी को लेकर गहरी टीस दिखाई दी। उन्होंने भावुक होते हुए लिखा, ‘आगे भी खूब लड़ा, अब भी लड़ ही रहा हूं… हां, अब मैं जिंदा रहने की जंग लड़ रहा हूं।’ अस्वस्थता के कारण जनसेवा और जनसमस्याओं के लिए सड़कों पर न उतर पाने का दर्द उनके इस संदेश में स्पष्ट दिखाई देता है। हालांकि, वे इस कठिन दौर में भी अपनी मां के उन्हीं शब्दों से ऊर्जा पा रहे हैं, जो आज भी उनके कानों में गूंज रहे हैं ‘लड़ना, डटकर लड़ना।’
78 वर्ष के हो चुके वरिष्ठ कांग्रेसी हरीश रावत का कहना है कि स्वास्थ्य कुछ ज्यादा ही खराब हो गया था। शारिरिक दिक्कतें हैं। मित्र-परिजनों की शुभकामनाओं की बदौलत स्वास्थ्य में अब सुधार हो रहा है। जल्द ही मैं लौटकर आ रहा हूं।
