जंतर-मंतर का आंदोलन: छात्रों की लड़ाई या राजनीतिक अखाड़ा? मूल मुद्दों से भटकने की आशंका

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उत्तराखंड!नई दिल्ली। नीट परीक्षा में पारदर्शिता, पेपर लीक की निष्पक्ष जांच और भर्ती-शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर शुरू हुआ जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन अब नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। शुरुआत में यह आंदोलन पूरी तरह छात्रों और अभिभावकों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन समय के साथ इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों की बढ़ती सक्रियता ने इसकी दिशा को लेकर बहस छेड़ दी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
जानकारी के अनुसार, वामपंथी छात्र संगठनों जैसे एसएफआई (SFI) और आइसा (AISA) सहित कई विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी लगातार बढ़ी है। इसके बाद आंदोलन के मंच से शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पेपर लीक की जांच की मांग के साथ-साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तथा सरकार विरोधी राजनीतिक नारे भी प्रमुखता से सुनाई देने लगे हैं। इससे कई लोगों का मानना है कि आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपने एक प्रवक्ता को संसद मार्च के दौरान अनुशासनहीनता के आरोप में पद से हटा दिया। बताया गया कि गंभीर प्रदर्शन के दौरान उनके बर्गर खाते हुए दिखाई देने पर संगठन ने इसे आंदोलन की गरिमा के विपरीत मानते हुए कार्रवाई की। इस घटना ने आंदोलन के भीतर अनुशासन और गंभीरता को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
20 जुलाई 2026 को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हालात हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच पथराव, बैरिकेड्स तोड़ने, लाठीचार्ज और झड़प की घटनाएं सामने आईं। इस दौरान 90 से अधिक छात्र और 118 पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है। हिंसा की इन घटनाओं ने शांतिपूर्ण आंदोलन की भावना को भी प्रभावित किया और कई सामाजिक संगठनों ने संयम बनाए रखने की अपील की।
हालांकि, आंदोलन का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जंतर-मंतर पर अब भी बड़ी संख्या में ऐसे छात्र, अभिभावक और युवा मौजूद हैं जिनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
प्रसिद्ध शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का आंदोलन में शामिल होना और भूख हड़ताल पर बैठना भी इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आंदोलन की मूल भावना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उनका जोर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही तय करने पर है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन व्यवस्था की कमियों, बेरोजगारी और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग से शुरू हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे इसका दायरा बढ़ा, विभिन्न राजनीतिक शक्तियों ने भी इसमें अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वास्तविक छात्रों की आवाज और उनके मूल मुद्दे राजनीतिक संघर्ष के शोर में कहीं दब न जाएं।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि आंदोलन अपनी मूल मांगों पर केंद्रित रहता है या फिर पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लेता है। फिलहाल जंतर-मंतर का यह आंदोलन वास्तविक छात्रों की उम्मीदों और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है।


जानकारी के अनुसार, वामपंथी छात्र संगठनों जैसे एसएफआई (SFI) और आइसा (AISA) सहित कई विपक्षी दलों के नेताओं की मौजूदगी लगातार बढ़ी है। इसके बाद आंदोलन के मंच से शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पेपर लीक की जांच की मांग के साथ-साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तथा सरकार विरोधी राजनीतिक नारे भी प्रमुखता से सुनाई देने लगे हैं। इससे कई लोगों का मानना है कि आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है।
इसी बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपने एक प्रवक्ता को संसद मार्च के दौरान अनुशासनहीनता के आरोप में पद से हटा दिया। बताया गया कि गंभीर प्रदर्शन के दौरान उनके बर्गर खाते हुए दिखाई देने पर संगठन ने इसे आंदोलन की गरिमा के विपरीत मानते हुए कार्रवाई की। इस घटना ने आंदोलन के भीतर अनुशासन और गंभीरता को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।
20 जुलाई 2026 को आयोजित ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हालात हिंसक हो गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच पथराव, बैरिकेड्स तोड़ने, लाठीचार्ज और झड़प की घटनाएं सामने आईं। इस दौरान 90 से अधिक छात्र और 118 पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है। हिंसा की इन घटनाओं ने शांतिपूर्ण आंदोलन की भावना को भी प्रभावित किया और कई सामाजिक संगठनों ने संयम बनाए रखने की अपील की।
हालांकि, आंदोलन का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जंतर-मंतर पर अब भी बड़ी संख्या में ऐसे छात्र, अभिभावक और युवा मौजूद हैं जिनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई और युवाओं के भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
प्रसिद्ध शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का आंदोलन में शामिल होना और भूख हड़ताल पर बैठना भी इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आंदोलन की मूल भावना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। उनका जोर शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही तय करने पर है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन व्यवस्था की कमियों, बेरोजगारी और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग से शुरू हुआ था, लेकिन जैसे-जैसे इसका दायरा बढ़ा, विभिन्न राजनीतिक शक्तियों ने भी इसमें अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वास्तविक छात्रों की आवाज और उनके मूल मुद्दे राजनीतिक संघर्ष के शोर में कहीं दब न जाएं।
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि आंदोलन अपनी मूल मांगों पर केंद्रित रहता है या फिर पूरी तरह राजनीतिक रंग ले लेता है। फिलहाल जंतर-मंतर का यह आंदोलन वास्तविक छात्रों की उम्मीदों और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है।


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