उत्तराखंड वर्तमान में देश की चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) में भारी अंकों के अंतर को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों ने सीधे तौर पर आरक्षण के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई है。विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे रणनीतिक और राजनीतिक रूप से तीन मुख्य कारण हैं:
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
1. ‘अस्तित्व का संकट’ बनाम ‘सिस्टम की खराबी’
छात्रों के अनुसार, आज सबसे बड़ा खतरा आरक्षण नहीं बल्कि “पेपर लीक और भ्रष्टाचार” है。अगर परीक्षा की मूल शुचिता (purity) ही खत्म हो जाएगी, तो आरक्षित और सामान्य दोनों ही सीटें भ्रष्टाचारियों और माफिया के कब्जे में चली जाएंगी。यही कारण है कि छात्रों ने अपनी आंतरिक वैचारिक मतभेदों को भुलाकर ‘पेपर लीक’ जैसे साझा दुश्मन के खिलाफ एकजुट होना सही समझा。
2. आंदोलन के राजनीतिकरण और बिखराव का डर
भारत में आरक्षण का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील और सामाजिक रूप से विभाजित करने वाला है。यदि मंच से आरक्षण-विरोधी कोई भी नारा लगता, तो यह आंदोलन तुरंत ‘जातिवादी’ रंग ले लेता。सरकार और विपक्ष दोनों ही इस स्थिति का फायदा उठाकर छात्रों को आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधी गुटों में बांट सकते थे, जिससे पूरी छात्र एकता बिखर जाती。
3. वामपंथी और सामाजिक न्याय संगठनों का दबाव
आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कई प्रमुख छात्र संगठन (जैसे- SFI, AISA और CJP) सामाजिक न्याय और आरक्षण की नीतियों का पुरजोर समर्थन करते हैं。चूंकि जंतर-मंतर पर मुख्य नेतृत्व इन्हीं संगठनों के हाथों में है, इसलिए सामान्य वर्ग के छात्रों की मांगों को ‘Re-NEET और पारदर्शिता’ तक ही सीमित रखा गया, ताकि उन्हें आंदोलन की मुख्यधारा से अलग-थलग न होना पड़े।
जंतर-मंतर की जमीन से उठ रही आवाजें यह साफ कर रही हैं कि आज का युवा अपनी श्रेणी-गत समस्याओं और आरक्षण की विसंगतियों से आगे निकल चुका है。वह फिलहाल परीक्षा प्रणाली की बुनियादी ईमानदारी को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है。
