उत्तराखंड की राजनीति में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू करके ऐसा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श खड़ा किया है, जिसकी चर्चा अब केवल सत्ता और विपक्ष के बीच सीमित नहीं है। मुस्लिम समाज में विवाह, महिलाओं के अधिकार और सामाजिक व्यवस्था को लेकर भी नई बहस शुरू हुई है। इसी क्रम में उत्तराखंड वक्फ बोर्ड का UCC के अनुरूप नया निकाहनामा तैयार करने का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धामी सरकार के समर्थक अब पुष्कर सिंह धामी को मुस्लिम समाज में सामाजिक सुधार की पहल करने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके तर्क में सबसे बड़ा आधार UCC है, जिसमें विवाह व्यवस्था को समान नागरिक कानून के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है।
निकाहनामे से शुरू हुई नई बहस
वक्फ बोर्ड द्वारा प्रस्तावित नए निकाहनामे में एक विवाह की व्यवस्था को प्रमुखता देने की बात सामने आई है। मस्जिदों में निकाह पढ़ाने वाले मौलानाओं के माध्यम से इसे लागू कराने की तैयारी की जा रही है।
इस फैसले को केवल एक प्रशासनिक बदलाव समझना इस पूरे घटनाक्रम को सीमित कर देगा। इसके पीछे विवाह व्यवस्था, महिलाओं के अधिकार और कानूनी संरक्षण से जुड़े बड़े सवाल हैं।
धामी सरकार का समर्थक वर्ग इसे मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में कदम मानता है। उसका कहना है कि कानून की स्पष्टता से विवाह संबंधी विवादों में महिलाओं और परिवारों को अधिक कानूनी सुरक्षा मिल सकती है।
क्या सामाजिक सुधार की राजनीति मुस्लिम समाज तक पहुंच रही है?
भारत में सामाजिक सुधार की राजनीति का इतिहास लंबा है। हर समाज के भीतर समय-समय पर ऐसी व्यवस्थाओं में बदलाव की मांग उठती रही है, जिनका प्रभाव महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के अधिकारों पर पड़ता है।
उत्तराखंड में UCC के बाद मुस्लिम समाज को लेकर यही प्रश्न सामने है कि क्या धार्मिक पहचान के साथ नागरिक अधिकारों और सामाजिक सुधार के प्रश्नों पर भी नई बातचीत शुरू हो सकती है?
यदि कोई सरकार कानून बनाती है और उसके बाद संबंधित समुदाय के धार्मिक एवं सामाजिक संस्थानों के साथ संवाद करके उसे लागू करने की व्यवस्था तैयार करती है तो यह प्रक्रिया केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं रहती। यह सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बन सकती है।
मुस्लिम समाज के भीतर भी एकरूपता नहीं
यह समझना भी जरूरी है कि मुस्लिम समाज एक समान राजनीतिक या सामाजिक विचार वाला समूह नहीं है। UCC को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग इसे समान नागरिक अधिकारों की दिशा में कदम मानते हैं, जबकि कुछ इसे व्यक्तिगत धार्मिक कानूनों से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में देखते हैं।
इसलिए धामी सरकार के सामने असली परीक्षा यही है कि वह आलोचना और समर्थन, दोनों को स्थान देते हुए संवाद का रास्ता कितना मजबूत करती है।
सामाजिक सुधार किसी आदेश से स्थायी नहीं होता। उसके लिए समाज का विश्वास, जागरूकता और सहभागिता जरूरी होती है।
सरकारी योजनाओं से जुड़ाव भी महत्वपूर्ण
मुस्लिम समाज का एक वर्ग यह भी मानता है कि सरकार के प्रति धारणा केवल UCC से तय नहीं होती। आवास, छात्रवृत्ति, रोजगार, स्वरोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं उसके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र मुस्लिम परिवारों तक पहुंचने को सरकार समर्थक वर्ग अपनी उपलब्धि के रूप में देखता है। इसी तरह भाजपा संगठन में मुस्लिम चेहरों को दायित्व मिलने को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यदि इन दावों को आंकड़ों और स्वतंत्र सरकारी रिकॉर्ड से लगातार पुष्ट किया जाता है तो सरकार की यह राजनीतिक कहानी और मजबूत हो सकती है।
मदरसे और मजारों की कार्रवाई पर अलग नजरिया
उत्तराखंड में अवैध मदरसों और सरकारी भूमि से जुड़े अतिक्रमण के खिलाफ हुई कार्रवाई भी मुस्लिम समाज के बीच चर्चा का विषय रही है। सरकार समर्थक वर्ग इसे धर्म के खिलाफ कार्रवाई के बजाय कानून के समान अनुपालन का विषय मानता है।
इसी वर्ग का तर्क है कि किसी भी सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का प्रश्न धार्मिक पहचान से ऊपर होना चाहिए। दूसरी ओर सरकार की आलोचना करने वाले वर्ग का मानना है कि ऐसी कार्रवाइयों में पारदर्शिता और समानता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
लोकतंत्र में दोनों पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए। सरकार की वास्तविक परीक्षा इसी कसौटी पर होती है कि कानून का इस्तेमाल समान रूप से हो।
रोटी और बेटी के रिश्ते की जमीन
उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच व्यापारिक, सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों का लंबा इतिहास रहा है। ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और कुमाऊं के कई कस्बों में दोनों समुदायों की आर्थिक सहभागिता दिखाई देती है।
इसलिए उत्तराखंड में मुस्लिम समाज को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में देखना प्रदेश की सामाजिक वास्तविकता को अधूरा समझना होगा।
यहां मुस्लिम समाज के साथ संबंध रोजगार, कारोबार, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता के स्तर पर भी बने हैं।
2027 का चुनाव देगा असली जवाब
अब सवाल 2027 की राजनीति का है।
क्या UCC, नया निकाहनामा, सरकारी योजनाओं का लाभ और भाजपा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व मुस्लिम समाज के एक हिस्से की राजनीतिक सोच बदल पाएगा?
इसका उत्तर अभी देना जल्दबाजी होगा।
भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह मुस्लिम समाज के साथ अपना संवाद केवल चुनावी समय तक सीमित न रखे। मुस्लिम समाज के लिए भी अवसर है कि वह राजनीतिक दलों का मूल्यांकन भावनात्मक नारों के बजाय शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, आवास, व्यापार और अधिकारों के आधार पर करे।
यदि धामी सरकार वास्तव में मुस्लिम समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है तो उसे सामाजिक सुधार के साथ सामाजिक संवाद को भी उतना ही महत्व देना होगा।
धामी के सामने इतिहास बनाने का अवसर
पुष्कर सिंह धामी को उनके समर्थक मुस्लिम समाज में सुधार की नई बहस के चेहरे के रूप में देख रहे हैं। UCC और निकाहनामे का मामला इस दावे को राजनीतिक आधार जरूर देता है, मगर इतिहास किसी नेता की छवि केवल घोषणाओं से तय नहीं करता।
इतिहास तब बनता है जब कानून का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, महिलाओं को वास्तविक अधिकार मिलें, युवाओं को रोजगार मिले, गरीब परिवारों को आवास मिले और प्रत्येक नागरिक को समान सम्मान मिले।
मुस्लिम समाज के समाज सुधारक के रूप में उभरे पुष्कर सिंह धामी?मुस्लिम समाज के समाज सुधारक के रूप में उभरे पुष्कर सिंह धामी?UCC से निकाहनामे तक—क्या उत्तराखंड की सियासत में मुस्लिम समाज के साथ बन रहा है नया संवाद?
