।मुस्लिम समाज और धामी सरकार के बीच बदलते रिश्तेUCC से निकाहनामे तक, क्या उत्तराखंड में बदल रही है सियासत की पुरानी तस्वीर?

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उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। पहाड़ और मैदान, कुमाऊं और गढ़वाल, स्थानीय और बाहरी जैसे मुद्दों के बीच मुस्लिम मतदाता भी चुनावी गणित का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। अब समान नागरिक संहिता यानी UCC के लागू होने के बाद प्रदेश की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ता दिखाई दे रहा है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने उत्तराखंड को UCC लागू करने वाला पहला राज्य बनाकर देश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संबंधित नागरिक प्रक्रियाओं में समान कानूनी व्यवस्था की बात ने पूरे देश में बहस को जन्म दिया। अब उत्तराखंड वक्फ बोर्ड द्वारा UCC के अनुरूप नया निकाहनामा तैयार किए जाने की खबर ने इस बहस को मुस्लिम समाज के भीतर भी पहुंचा दिया है।
नए निकाहनामे में एक विवाह की व्यवस्था को प्रमुखता देने की बात सामने आई है। मस्जिदों में निकाह पढ़ाने वाले मौलानाओं को इसी प्रारूप का पालन कराने की तैयारी की जा रही है। यह कदम केवल एक दस्तावेज में बदलाव के रूप में देखने की बजाय उत्तराखंड में बदलती सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
मुस्लिम समाज के भीतर भी बदल रही प्राथमिकताएं
आज का मुस्लिम समाज केवल धार्मिक पहचान के सवाल तक सीमित नहीं है। शिक्षा, रोजगार, मकान, व्यापार, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सरकारी योजनाओं में भागीदारी उसके प्रमुख सवाल हैं। नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक व्यावहारिक सोच रखती है।
प्रधानमंत्री आवास योजना, छात्रवृत्ति, स्वरोजगार, कौशल विकास और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मुस्लिम परिवारों तक पहुंचना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है। सरकार समर्थक मुस्लिम वर्ग का कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ धर्म के आधार पर तय करने की बजाय पात्रता के आधार पर मिलना चाहिए।
इसी वर्ग में यह धारणा भी दिखाई दे रही है कि धामी सरकार को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के स्थान पर उसके प्रशासनिक फैसलों और कल्याणकारी योजनाओं को भी देखा जाना चाहिए।
मस्जिद, मदरसा और मजार की कार्रवाई का अलग-अलग अर्थ
उत्तराखंड में अवैध मदरसों, सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और कुछ मजारों से जुड़े मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई हुई है। इन कार्रवाइयों को लेकर राजनीतिक बहस भी हुई। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का सवाल किसी धर्म से जोड़कर देखने की बजाय कानून के समान अनुपालन से जुड़ा विषय है।
मुस्लिम समाज के एक वर्ग की ओर से यह तर्क भी दिया जा रहा है कि यदि सरकार का उद्देश्य किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ कार्रवाई करना होता तो कार्रवाई का दायरा व्यापक धार्मिक स्थलों तक जाता। इस वर्ग का मानना है कि कानून का पालन और धार्मिक आस्था दोनों अपने-अपने स्थान पर रह सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां धामी सरकार और मुस्लिम समाज के बीच संवाद की संभावनाएं दिखाई देती हैं।
रोटी-बेटी के पुराने रिश्ते की राजनीति
उत्तराखंड का मैदान क्षेत्र सदियों से विभिन्न समुदायों की सामाजिक और आर्थिक सहभागिता का केंद्र रहा है। ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार, नैनीताल के मैदानी हिस्से, देहरादून और अन्य क्षेत्रों में मुस्लिम समाज व्यापार, कृषि, परिवहन, निर्माण, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार से जुड़ा रहा है।
स्थानीय स्तर पर हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच व्यापारिक संबंधों के साथ सामाजिक रिश्ते भी रहे हैं। उत्तराखंड के अनेक कस्बों में बाजार की अर्थव्यवस्था दोनों समुदायों की सहभागिता से चलती है।
इसीलिए उत्तराखंड में मुस्लिम समाज को केवल चुनावी आंकड़े के रूप में देखना प्रदेश की सामाजिक वास्तविकता को छोटा कर देना होगा।
भाजपा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व का सवाल
भाजपा लंबे समय से मुस्लिम समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। उत्तराखंड में पार्टी संगठन और विभिन्न दायित्वों में मुस्लिम चेहरों को स्थान दिए जाने को इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। ऐसे में भाजपा के लिए मुस्लिम समाज के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाना स्वाभाविक रणनीतिक आवश्यकता भी है। यदि मुस्लिम समाज के कुछ वर्ग भाजपा की योजनाओं और नीतियों से स्वयं को जोड़ते हैं तो यह प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत होगा।
हालांकि इसे तत्काल व्यापक मुस्लिम जनसमर्थन में बदल देना जल्दबाजी होगी। चुनावी राजनीति में धारणा और वास्तविक मतदान के बीच लंबी दूरी होती है।
क्या UCC मुस्लिम विरोधी है?
UCC को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर एकराय का दावा करना उचित नहीं होगा। एक वर्ग इसे अपनी धार्मिक-सामाजिक परंपराओं में हस्तक्षेप के रूप में देखता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे नागरिक अधिकारों और समान कानून की व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है।
नए निकाहनामे का मुद्दा इसी बहस को आगे बढ़ाता है।
यदि सरकार और वक्फ बोर्ड यह सुनिश्चित कर सकें कि नए कानून के साथ मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, संपत्ति के अधिकार, विवाह की कानूनी सुरक्षा और परिवार के भविष्य से जुड़े प्रावधान स्पष्ट रूप से समझाए जाएं तो UCC की स्वीकार्यता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
कानून लागू करना एक चरण है। समाज को कानून समझाना और उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करना उससे भी बड़ा चरण है।
2027 में मुस्लिम वोट की नई कहानी?
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होगा। यह कई छोटे-बड़े सामाजिक समूहों के नए राजनीतिक समीकरणों का चुनाव भी हो सकता है।
भाजपा यदि मुस्लिम समाज के बीच यह संदेश पहुंचाने में सफल होती है कि सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र नागरिकों को मिल रहा है, संगठन में प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है और कानून सभी के लिए समान है, तो उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं के बीच भाजपा को लेकर वर्षों से बनी राजनीतिक धारणा इतनी जल्दी समाप्त हो जाएगी, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा। इसके लिए लगातार संवाद, प्रतिनिधित्व और स्थानीय स्तर पर विश्वास निर्माण की आवश्यकता होगी।
धामी सरकार के सामने अवसर भी, चुनौती भी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि UCC को केवल राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने की बजाय उसे आम नागरिक के अधिकार और सुविधा से जोड़कर दिखाया जाए।
मुस्लिम समाज के लिए भी यह अवसर है कि वह अपनी मांगों को शिक्षा, रोजगार, व्यापार, आवास, स्वास्थ्य और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों के साथ सामने रखे।
धामी सरकार के लिए मुस्लिम समाज से संवाद का अर्थ केवल चुनावी गणित नहीं होना चाहिए। यदि सरकार इस समुदाय के बीच भरोसा कायम करती है तो इसका असर चुनाव से आगे भी दिखाई देगा।
उत्तराखंड की राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन तब होगा जब किसी मुस्लिम नागरिक को अपनी नागरिक सुविधाओं के लिए अपनी धार्मिक पहचान का सहारा लेने की जरूरत न पड़े और किसी हिंदू नागरिक को भी अपनी धार्मिक पहचान के कारण किसी सरकारी योजना में अतिरिक्त या कम अधिकार की चिंता न हो।
यही समान नागरिक व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा होगी।
सवाल अब केवल नए निकाहनामे का नहीं है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की राजनीति में मुस्लिम समाज को लेकर पुरानी धारणाएं बदल रही हैं? क्या भाजपा और मुस्लिम समाज के बीच संवाद का नया रास्ता खुल रहा है? और क्या 2027 का चुनाव इस बदलते रिश्ते का परिणाम दिखाएगा?
इन सवालों का उत्तर आने वाले महीनों की राजनीति देगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि उत्तराखंड में UCC के बाद मुस्लिम समाज और सरकार के रिश्तों पर एक नई राजनीतिक बहस शुरू हो चुकी है।


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