रुद्रपुर,उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के बड़े मामले: भर्ती से लेकर भूमि घोटालों तक, कई मामलों ने हिलाई शासन व्यवस्था
देहरादून। उत्तराखंड राज्य गठन (9 नवंबर 2000) के बाद से विकास के साथ-साथ कई बड़े भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मामले भी सामने आए हैं। सरकारी भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, भूमि खरीद, छात्रवृत्ति, मुआवजा वितरण, आपदा राहत और वन विभाग से जुड़े मामलों ने समय-समय पर सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। कई मामलों में जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की है, जबकि कुछ प्रकरण अब भी जांच या न्यायिक प्रक्रिया में हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हाल के वर्षों में सबसे अधिक चर्चा हरिद्वार नगर निगम भूमि खरीद मामले की रही। आरोप है कि हरिद्वार के सराय गांव में स्थित कृषि भूमि का भूमि उपयोग परिवर्तन कर उसे व्यावसायिक श्रेणी में लाया गया और बाद में नगर निगम ने उसे कथित तौर पर बाजार मूल्य से कहीं अधिक कीमत पर खरीद लिया। मामले के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई और प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की गई।
राज्य का सबसे चर्चित मामला यूकेएसएसएससी भर्ती एवं पेपर लीक घोटाला माना जाता है। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों ने हजारों युवाओं के भविष्य पर असर डाला। विशेष कार्यबल (एसटीएफ) की जांच में कथित पेपर लीक नेटवर्क का खुलासा हुआ और कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ाने और नकल रोकने के लिए सख्त कानून लागू किया।
एनएच-74 भूमि मुआवजा घोटाला भी उत्तराखंड के बड़े मामलों में शामिल है। ऊधमसिंह नगर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ीकरण के दौरान भूमि अधिग्रहण में कथित अनियमितताओं के आरोप लगे। जांच में आरोप सामने आए कि कृषि भूमि को गैर-कृषि श्रेणी में दिखाकर करोड़ों रुपये का अतिरिक्त मुआवजा लिया गया। इस मामले में कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और जांच एजेंसियों ने विस्तृत पड़ताल की।
समाज कल्याण छात्रवृत्ति घोटाले में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों के नाम पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए सरकारी छात्रवृत्ति लेने के आरोप लगे। जांच में कई निजी शिक्षण संस्थानों की भूमिका सामने आई। विजिलेंस और अन्य एजेंसियों ने विभिन्न मामलों में एफआईआर दर्ज की और सरकारी धन की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू की गई।
वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों में भी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए। राहत सामग्री की खरीद, फर्जी बिल और भुगतान संबंधी शिकायतों ने उस समय व्यापक चर्चा बटोरी। इन मामलों की विभिन्न स्तरों पर जांच हुई और आपदा प्रबंधन में पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
वन विभाग से जुड़े ईको-टूरिज्म और कॉर्बेट क्षेत्र के मामलों ने भी राज्य में सुर्खियां बटोरीं। आरोप लगे कि कुछ विकास कार्यों में वित्तीय नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। इन मामलों में विभागीय और जांच एजेंसियों द्वारा कार्रवाई की गई तथा संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच हुई।
वर्ष 2022 में उत्तराखंड विधानसभा बैकडोर भर्ती मामला भी बड़े विवाद के रूप में सामने आया। जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर 2016 से 2021 के बीच हुई 228 से अधिक नियुक्तियां निरस्त कर दी गईं। इस मामले ने सरकारी नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी।
इसके अलावा, राज्य में समय-समय पर अवैध खनन, भूमि आवंटन, टेंडर प्रक्रिया और निवेश के नाम पर ठगी जैसे मामलों में भी जांच और कार्रवाई होती रही है। उत्तराखंड पुलिस ने वर्ष 2021 में एक बड़े पोंजी निवेश नेटवर्क का भी खुलासा किया था, जिसमें निवेशकों से करोड़ों रुपये की कथित ठगी के आरोप सामने आए।
राज्य सरकार का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई गई है। इसी के तहत विजिलेंस जांच को मजबूत किया गया है, भर्ती परीक्षाओं में सुधार किए गए हैं और ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड–1064’ हेल्पलाइन के माध्यम से शिकायतों पर कार्रवाई की जा रही है। सरकार का दावा है कि दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई देर से हुई और कुछ मामलों में जांच की गति अपेक्षित नहीं रही। विपक्ष लगातार निष्पक्ष और समयबद्ध जांच की मांग करता रहा है।
उत्तराखंड के इन चर्चित मामलों ने यह स्पष्ट किया है कि सुशासन के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पारदर्शी प्रशासन, मजबूत निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। जिन मामलों की जांच जारी है, उनमें अंतिम दोष तय होना संबंधित जांच एजेंसियों तथा न्यायालयों की प्रक्रिया के बाद ही संभव होगा।
