रुद्रपुर को देवभूमि के अनुरूप आध्यात्मिक पहचान दिलाने की दिशा में महापौर एवं बालाजी भक्त महंत विकास शर्मा की पहल को समर्थक एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखते हैं। त्रिशूल चौक और डमरू चौक जैसी योजनाओं के माध्यम से भगवान शिव के प्रतीकों को नगर की पहचान से जोड़ा गया है। प्रभु श्रीराम को समर्पित भव्य प्रतिमा स्थापित करने की परिकल्पना तथा गांधी पार्क के सांस्कृतिक स्वरूप में प्रस्तावित परिवर्तन को भी इसी सोच का विस्तार माना जा रहा है। शिव कॉरिडोर की योजना से प्राचीन मंदिरों को जोड़कर धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को सशक्त करने का लक्ष्य देखा जा रहा है। अटरिया मंदिर के समग्र विकास और सुव्यवस्थित प्रबंधन की अपेक्षा भी व्यक्त की गई है। अवतार सिंह बिष्ट हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स के अनुसार आध्यात्मिक मूल्यों, जनसेवा और सांस्कृतिक चेतना का समन्वय रुद्रपुर को औद्योगिक नगरी के साथ एक प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है तथा भविष्य में प्रभु श्रीराम को समर्पित भव्य मंदिर की परिकल्पना भी इसी दृष्टि का हिस्सा मानी गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रुद्रपुर,देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती अनादिकाल से ऋषियों, मुनियों, योगियों और तपस्वियों की साधना का केंद्र रही है। हिमालय की गोद में प्रवाहित गंगा और यमुना, केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे दिव्य धाम, जागेश्वर, बैजनाथ, पूर्णागिरि, नानकमत्ता, गोलू देवता और अनगिनत सिद्धपीठ इस भूमि की आध्यात्मिक चेतना को विश्वभर में प्रतिष्ठित करते हैं। यहाँ का प्रत्येक पर्वत, प्रत्येक नदी, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक तीर्थ सनातन संस्कृति की अमर गाथा सुनाता है।
इसी देवभूमि का प्रवेश द्वार कहलाने वाला रुद्रपुर वर्षों से औद्योगिक नगरी के रूप में अपनी अलग पहचान रखता आया है। देश के अनेक राज्यों से लोग रोजगार, व्यापार और बेहतर भविष्य की आशा लेकर इस नगर में पहुँचे। विशाल औद्योगिक इकाइयों ने आर्थिक गतिविधियों को गति दी। आधुनिक सड़कों, बाजारों और नए आवासीय क्षेत्रों ने शहर का स्वरूप बदला। समय के साथ एक विचार भी जन्म लेने लगा कि आर्थिक समृद्धि के साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान भी उतनी ही सशक्त होनी चाहिए। इसी सोच ने रुद्रपुर की नई यात्रा का मार्ग प्रशस्त किया।
महापौर विकास शर्मा का नाम इसी संदर्भ में प्रमुखता से लिया जाता है। जनप्रतिनिधि होने के साथ उनकी पहचान बालाजी महाराज के अनन्य भक्त और महंत के रूप में भी स्थापित है। नियमित पूजा-अर्चना, धार्मिक आयोजनों में सहभागिता और बालाजी महाराज के प्रति समर्पण उनकी सार्वजनिक छवि का महत्वपूर्ण पक्ष माना जाता है। अनेक श्रद्धालु उन्हें ऐसे जनप्रतिनिधि के रूप में देखते हैं जिनकी राजनीति का आधार आध्यात्मिक चेतना है।
सनातन परंपरा में राजा, शासक अथवा जनसेवक का पहला दायित्व धर्म की रक्षा और प्रजा के कल्याण से जुड़ा माना गया है। प्रभु श्रीराम के राज्य का वर्णन करते समय गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे आदर्श शासन की कल्पना प्रस्तुत की है, जहाँ न्याय, सुरक्षा, समृद्धि और नैतिकता का संगम दिखाई देता है। उसी आदर्श की झलक प्रत्येक जनप्रतिनिधि अपने कार्यों के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास करता है।
रुद्रपुर में सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में सबसे अधिक चर्चा त्रिशूल चौक की हुई। नगर के प्रमुख चौराहे को भगवान शिव के पवित्र त्रिशूल से जोड़ने का निर्णय अनेक श्रद्धालुओं के लिए भावनात्मक विषय बन गया। विशाल त्रिशूल केवल धातु की आकृति भर नहीं है। त्रिशूल सृष्टि के संतुलन का प्रतीक है। इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति का संगम है। भगवान शिव के हाथ में विराजमान त्रिशूल अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देता है। देवभूमि में प्रवेश करने वाला प्रत्येक यात्री जब इस दिव्य प्रतीक को देखता है, तब उसके मन में सहज श्रद्धा का भाव जागृत होता है।
आज त्रिशूल चौक अनेक लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है। श्रद्धालु वहाँ रुकते हैं, प्रणाम करते हैं, चित्र लेते हैं और अपने नगर की नई पहचान पर गर्व का अनुभव करते हैं। एक औद्योगिक शहर के मध्य भगवान शिव का ऐसा भव्य प्रतीक यह संदेश देता है कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता साथ-साथ चल सकती हैं।
इसी श्रृंखला का अगला अध्याय डमरू चौक के रूप में सामने आया। भगवान शिव का डमरू भारतीय दर्शन में नाद ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। मान्यता है कि डमरू की दिव्य ध्वनि से महेश्वर सूत्र प्रकट हुए, जिनसे संस्कृत व्याकरण की आधारशिला रखी गई। डमरू सृजन का प्रतीक है, ज्ञान का प्रतीक है, जीवन की गति का प्रतीक है। रुद्रपुर के मध्य इस दिव्य प्रतीक की स्थापना नगर को नई सांस्कृतिक पहचान प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।
जब कोई श्रद्धालु देवभूमि में प्रवेश करता है, तब उसके मन में सबसे पहला भाव भगवान शिव का स्मरण होता है। केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, कल्पेश्वर और जागेश्वर जैसे अनगिनत शिवधाम उत्तराखंड की आत्मा हैं। ऐसे प्रदेश के प्रवेश द्वार पर त्रिशूल और डमरू जैसे प्रतीकों की उपस्थिति इस आध्यात्मिक परंपरा का स्वाभाविक विस्तार प्रतीत होती है।
महापौर विकास शर्मा का एक और विचार प्रभु श्रीराम को समर्पित भव्य सांस्कृतिक केंद्र के रूप में सामने आया। गांधी पार्क को श्रीराम की प्रेरणा से जोड़ने की घोषणा अनेक लोगों के लिए उत्साह का विषय बनी। प्रस्तावित भव्य प्रतिमा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों का स्मरण कराएगी। श्रीराम भारतीय संस्कृति के शाश्वत आदर्श हैं। उनका जीवन त्याग, सत्य, करुणा, मर्यादा और न्याय का अनुपम उदाहरण है।
आज समाज अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है। युवा वर्ग तेज़ी से बदलते परिवेश का सामना कर रहा है। जीवन में दिशा, अनुशासन और चरित्र की आवश्यकता पहले से अधिक अनुभव की जा रही है। ऐसे समय सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित महापुरुषों और आराध्य देवों की प्रतिमाएँ समाज को प्रेरणा प्रदान करती हैं। प्रत्येक बालक जब श्रीराम की प्रतिमा को देखेगा, तब उसके मन में प्रश्न उठेगा—मर्यादा क्या होती है, त्याग क्या होता है, आदर्श जीवन किसे कहते हैं। यही प्रश्न आगे चलकर संस्कारों का आधार बनते हैं।
विकास शर्मा की आध्यात्मिक यात्रा का उल्लेख करते समय बालाजी महाराज का स्मरण स्वाभाविक है। बालाजी महाराज संकटमोचन हैं, श्रद्धा और विश्वास के केंद्र हैं। करोड़ों भक्त जीवन की कठिनाइयों में उनका स्मरण करते हैं। महापौर के रूप में विकास शर्मा का सार्वजनिक जीवन और महंत के रूप में उनकी धार्मिक साधना एक साथ चलती दिखाई देती है। अनेक लोग इसे जनसेवा और ईश्वरसेवा का सुंदर संगम मानते हैं।
सनातन संस्कृति में सेवा को सर्वोच्च साधना माना गया है। भूखे को अन्न, प्यासे को जल, असहाय को सहारा और समाज को दिशा देना ही वास्तविक धर्म है। यदि जनप्रतिनिधि अपने पद को सेवा का माध्यम मानकर कार्य करे, तब शासन व्यवस्था में संवेदनशीलता का विस्तार होता है। यही भाव भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
रुद्रपुर की नई पहचान केवल चौकों के नाम परिवर्तन तक सीमित दिखाई नहीं देती। नगर के विभिन्न मंदिरों को एक आध्यात्मिक श्रृंखला में जोड़ने की परिकल्पना भी आकार ले रही है। शिव कॉरिडोर का विचार श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक व्यवस्थित मार्ग, स्वच्छ वातावरण, प्रकाश व्यवस्था, विश्राम स्थल, धार्मिक सूचना केंद्र और सांस्कृतिक गतिविधियाँ रुद्रपुर को आध्यात्मिक पर्यटन का नया केंद्र बना सकती हैं।
धार्मिक पर्यटन किसी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति देता है। श्रद्धालुओं के आगमन से स्थानीय व्यापार, छोटे उद्योग, हस्तशिल्प, परिवहन और रोजगार के नए अवसर विकसित होते हैं। साथ ही सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण भी सुनिश्चित होता है। यही कारण है कि देश के अनेक नगर अपनी आध्यात्मिक पहचान को सुदृढ़ करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं।
रुद्रपुर की धरती पर स्थित अटरिया मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। माता के दर्शन के लिए प्रत्येक वर्ष विशाल संख्या में भक्त पहुँचते हैं। मेले के समय पूरे क्षेत्र में भक्ति का अद्भुत वातावरण दिखाई देता है। ढोल-नगाड़ों की ध्वनि, जयकारों की गूंज और दीपों की पंक्तियाँ वातावरण को अलौकिक बना देती हैं। यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, पीढ़ियों की आस्था का जीवंत प्रतीक है।
अनेक नागरिकों का विचार है कि अटरिया मंदिर के समग्र विकास के लिए दीर्घकालिक योजना तैयार हो। श्रद्धालुओं की सुविधा, स्वच्छता, पार्किंग, सुरक्षा, धर्मशालाएँ, चिकित्सा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए। ऐसा प्रयास मंदिर की गरिमा को और अधिक प्रतिष्ठित कर सकता है। किसी भी ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।
रुद्रपुर का भविष्य आर्थिक विकास से निर्धारित होने वाला अध्याय है। इस नगर की पहचान तब और सशक्त होगी जब उद्योगों की समृद्धि के साथ मंदिरों की घंटियाँ, सांस्कृतिक आयोजन, धार्मिक यात्राएँ और आध्यात्मिक चेतना भी समान ऊर्जा के साथ आगे बढ़ेगी। यही संतुलन किसी नगर को विशिष्ट बनाता है।
