संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की राजनीतिक तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगी है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधी सत्ता की लड़ाई की परंपरागत तस्वीर इस बार कई नए रंगों के साथ सामने आती दिखाई दे रही है। कांग्रेस के पुराने चुनावी चेहरे भाजपा में पहुंच चुके हैं, भाजपा के पूर्व विधायक और प्रभावशाली स्थानीय नेता कांग्रेस के साथ खड़े हुए हैं और इसी बीच उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) पर्वतीय अस्मिता, क्षेत्रीय अधिकारों और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक जमीन फिर से मजबूत करने की कोशिश में जुटा है।
यही वह बिंदु है जहां 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस की कहानी से आगे बढ़ जाता है। इस बार सवाल यह भी होगा कि उत्तराखंड की जनता राष्ट्रीय दलों के बीच सत्ता का विकल्प तलाशती है या क्षेत्रीय राजनीति को निर्णायक भूमिका देती है। पहाड़ की राजनीति में यूकेडी की वापसी की चर्चा जितनी तेज हो रही है, उतना ही भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए पुराने चुनावी गणित को नए सिरे से समझना जरूरी हो गया है।
उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दल का अर्थ केवल एक और राजनीतिक विकल्प से जुड़ा विषय नहीं है। राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले इस प्रदेश में क्षेत्रीय भावनाएं, रोजगार, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, पहाड़ की अर्थव्यवस्था, वन अधिकार, परिसंपत्तियों का सवाल, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक महत्व रखते हैं। यदि यूकेडी इन मुद्दों को प्रभावी संगठन और मजबूत स्थानीय नेतृत्व के साथ मतदाता तक पहुंचाने में सफल होती है, तो 2027 में उसका प्रभाव सीटों की संख्या से कहीं बड़ा हो सकता है।
दलबदल ने भाजपा-कांग्रेस की जमीन हिला दी
2027 से पहले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में एक उसके पुराने चुनावी चेहरों का भाजपा की ओर जाना है। उत्तरकाशी जिले में पुरोला से मालचंद, यमुनोत्री से दीपक बिजल्वाण और गंगोत्री से विजयपाल सिंह सजवाण जैसे चेहरे अब भाजपा के साथ हैं। इसके अलावा टिहरी में धन सिंह नेगी, धनौल्टी में जोत सिंह बिष्ट, पौड़ी में नवल किशोर, लैंसडाउन में अनुकृति गुसाईं रावत, चौबट्टाखाल में केसर सिंह नेगी, यमकेश्वर में शैलेंद्र रावत और बदरीनाथ में राजेंद्र भंडारी जैसे नेताओं के राजनीतिक पाला बदलने से कांग्रेस को कई विधानसभा क्षेत्रों में अपनी रणनीति फिर से तैयार करनी पड़ रही है।
कांग्रेस के लिए चुनौती केवल उम्मीदवार तलाशने तक सीमित नहीं है। पहाड़ी विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार का व्यक्तिगत संपर्क, गांव-गांव की पकड़, सामाजिक समीकरण और कार्यकर्ताओं के साथ संबंध चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं। ऐसे में किसी नए चेहरे को टिकट देकर उसके पीछे संगठन खड़ा करना कांग्रेस की पहली परीक्षा होगी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है। भाजपा में पहुंचे कांग्रेस नेताओं के सामने भी अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित करने की चुनौती रहेगी। सदस्यता ग्रहण करने का मंच और चुनावी बूथ का गणित दो अलग-अलग चीजें हैं। बदरीनाथ उपचुनाव इसका महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुका है। कांग्रेस से भाजपा में गए राजेंद्र भंडारी को भाजपा ने मैदान में उतारा, मगर कांग्रेस के लखपत बुटोला ने जीत दर्ज की। इससे संकेत मिलता है कि नेता के साथ मतदाताओं का पूरा समूह स्वतः स्थानांतरित हो जाए, ऐसा राजनीतिक गणित हर जगह लागू हो, इसकी कोई गारंटी नहीं।
यही स्थिति 2027 में दलबदल करने वाले हर नेता के सामने रहेगी।
कांग्रेस ने तराई में भाजपा को चुनौती देने की कोशिश की
राजनीतिक पलटवार करते हुए कांग्रेस ने भाजपा के पूर्व विधायकों और प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ा है। मार्च 2026 में राजकुमार ठुकराल, नारायण पाल और भीमलाल आर्य सहित भाजपा से जुड़े कई नेताओं का कांग्रेस में आना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
विशेषकर रुद्रपुर जैसी महत्वपूर्ण तराई सीट पर राजकुमार ठुकराल की मौजूदगी कांग्रेस के लिए राजनीतिक महत्व रखती है। दो बार विधायक रह चुके ठुकराल का स्थानीय राजनीतिक अनुभव कांग्रेस को भाजपा के सामने एक अनुभवी चेहरा उपलब्ध कराता है। तराई की राजनीति में व्यक्तिगत नेटवर्क, व्यापारी वर्ग, ग्रामीण मतदाता, शहरी मतदाता, उद्योग क्षेत्र और सामाजिक समीकरणों का अपना महत्व है। कांग्रेस इन्हीं समीकरणों को साधने की कोशिश कर रही है।
यानी जिस तरह कांग्रेस को पहाड़ में पुराने चेहरों के जाने से नई राजनीतिक जमीन तैयार करनी पड़ रही है, उसी समय तराई में भाजपा के पुराने राजनीतिक ढांचे को चुनौती देने के लिए वह अनुभवी चेहरों पर भरोसा कर रही है।
भाजपा के सामने भी आसान रास्ता नहीं
दलबदल का फायदा भाजपा को कई सीटों पर मिल सकता है, मगर इसके साथ संगठनात्मक चुनौती भी जुड़ी हुई है। किसी विधानसभा क्षेत्र में वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हों और बाहर से आया मजबूत चेहरा टिकट का दावेदार बन जाए, तो असंतोष की संभावना बढ़ती है।
भाजपा के सामने 2027 में सबसे कठिन सवाल यही हो सकता है कि वह पुराने कार्यकर्ता और नए प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन कैसे बनाएगी।
यदि कांग्रेस से आए किसी नेता को टिकट मिलता है तो स्थानीय दावेदारों की प्रतिक्रिया क्या होगी? यदि पुराने कार्यकर्ता को टिकट दिया जाता है तो बाहर से आए नेता की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा? यही सवाल भाजपा की कई सीटों पर चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए दलबदल का असली प्रभाव सदस्यता ग्रहण समारोह में कम और टिकट वितरण के बाद ज्यादा दिखाई देगा।
और यहीं से यूकेडी का रास्ता खुलता है
भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान का सबसे बड़ा लाभ यदि किसी क्षेत्रीय दल को मिल सकता है तो वह उत्तराखंड क्रांति दल है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन की राजनीतिक चेतना से जन्मे यूकेडी के पास वह मुद्दा मौजूद है जो राष्ट्रीय दलों के लिए अक्सर चुनावी घोषणापत्र का विषय बन जाता है—उत्तराखंड की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं।
पहाड़ के मतदाता के सामने सवाल आज भी वही हैं—गांव खाली क्यों हो रहे हैं? युवाओं को रोजगार के लिए बाहर क्यों जाना पड़ता है? पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था मजबूत क्यों नहीं हो पा रही? जमीन और संसाधनों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित हो? पर्यटन से पहाड़ के गांवों की अर्थव्यवस्था कैसे मजबूत हो? आपदा के बाद पुनर्वास की व्यवस्था कैसी हो? स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर कैसे बढ़ें?
इन सवालों पर यूकेडी यदि लगातार और आक्रामक राजनीतिक अभियान चलाती है, तो वह भाजपा और कांग्रेस के बीच असंतुष्ट मतदाताओं के लिए विकल्प बन सकती है।
राष्ट्रीय दलों की भाषा बनाम स्थानीय संवेदना
उत्तराखंड की राजनीति में एक बात लगातार महसूस की जाती रही है कि पहाड़ का मतदाता राष्ट्रीय राजनीति को समझता भी है और स्थानीय सवालों को उससे अलग करके देखता भी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रधानमंत्री की लोकप्रियता, केंद्र की योजनाएं, राष्ट्रीय नेतृत्व और बड़े राजनीतिक मुद्दे अपना प्रभाव रखते हैं। साथ ही गांव की सड़क, बंद पड़ा स्कूल, अस्पताल में डॉक्टर, खेत की सिंचाई, जंगल और जमीन, पलायन और रोजगार जैसे सवाल मतदान के समय बेहद व्यक्तिगत अनुभव बन जाते हैं।
यहीं यूकेडी की संभावित ताकत छिपी है।
यदि यूकेडी राष्ट्रीय मुद्दों की प्रतिस्पर्धा में उतरने के बजाय उत्तराखंड के विशिष्ट सवालों को अपना मुख्य राजनीतिक हथियार बनाती है, तो वह अपनी अलग पहचान मजबूत कर सकती है। पहाड़ के मतदाता को यह संदेश दिया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव का सवाल दिल्ली की राजनीति से आगे बढ़कर देहरादून और गांव की सत्ता से जुड़ा है।
यूकेडी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा संगठन
हालांकि जनाधार की चर्चा और चुनावी सफलता के बीच संगठन का मजबूत पुल जरूरी है। यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्षेत्रीय भावनाओं को वोट में कैसे बदला जाए।
केवल नारों से चुनाव नहीं जीते जाते। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता, विधानसभा क्षेत्र में मजबूत प्रत्याशी, पंचायत स्तर तक संपर्क, युवाओं की भागीदारी, महिलाओं के मुद्दों पर स्पष्ट नीति और लगातार जनसंपर्क यूकेडी की सफलता का आधार बन सकते हैं।
यदि पार्टी कुछ चुनिंदा पर्वतीय सीटों पर मजबूत उम्मीदवारों के साथ गंभीर तैयारी करती है तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। क्षेत्रीय दल के लिए पूरे प्रदेश में समान ताकत दिखाने के बजाय रणनीतिक सीटों पर प्रभाव स्थापित करना ज्यादा प्रभावी रास्ता हो सकता है।
यूकेडी के गढ़ में भाजपा-कांग्रेस दोनों की चुनौती
पर्वतीय क्षेत्रों की कई सीटों पर यूकेडी का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है। यदि पार्टी इन क्षेत्रों में अपने पुराने समर्थक वर्ग को दोबारा सक्रिय करने में सफल रहती है और नए युवाओं को संगठन से जोड़ती है, तो भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनावी समीकरण कठिन हो सकते हैं।
विशेषकर ऐसी सीटें जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहता है, वहां यूकेडी का कुछ हजार वोटों का प्रभाव भी परिणाम बदल सकता है।
यही कारण है कि 2027 में यूकेडी की सफलता का मूल्यांकन केवल जीती गई सीटों से करना उचित नहीं होगा। कई सीटों पर वह निर्णायक तीसरी ताकत बन सकती है। त्रिकोणीय मुकाबले में 10 से 15 प्रतिशत मत भी सत्ता के बड़े समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
पहाड़ में यूकेडी, तराई में नए समीकरण
2027 का सबसे दिलचस्प राजनीतिक विभाजन संभवतः यही हो सकता है।
पहाड़ में यूकेडी बनाम भाजपा-कांग्रेस का त्रिकोणीय संघर्ष और तराई में भाजपा बनाम कांग्रेस की सीधी टक्कर।
हालांकि राजनीति इतनी सरल रेखाओं में चलती नहीं है। यूकेडी का प्रभाव यदि पहाड़ की सीटों से निकलकर कुमाऊं की कुछ मैदानी विधानसभा सीटों तक पहुंचता है तो पूरा चुनावी गणित बदल सकता है।
तराई में कांग्रेस भाजपा से मुकाबले के लिए पुराने भाजपा चेहरों पर भरोसा कर रही है। भाजपा कांग्रेस से आए नेताओं को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहती है। इसी समय यूकेडी पहाड़ में अपनी राजनीतिक पहचान पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही है।
तीनों राजनीतिक धाराएं अलग-अलग रणनीति लेकर मैदान में उतरती दिखाई दे रही हैं।
गठबंधन की राजनीति में यूकेडी किंगमेकर बन सकती है?
यह सवाल 2027 की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल बन सकता है।
यदि भाजपा या कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से दूर रहती हैं और यूकेडी पर्याप्त संख्या में सीटें जीतती है, तो क्षेत्रीय दल की भूमिका अचानक बहुत बड़ी हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में यूकेडी किसके साथ जाएगी, इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगा।
यूकेडी के लिए किसी भी संभावित गठबंधन का आधार सत्ता में हिस्सेदारी से अधिक उत्तराखंड के क्षेत्रीय मुद्दे हो सकते हैं। यदि पार्टी अपने मूल राजनीतिक एजेंडे—स्थानीय अधिकार, रोजगार, पलायन रोकना, भू-कानून, मूल निवास, पहाड़ी क्षेत्रों का संतुलित विकास और राज्य के संसाधनों पर स्थानीय हित—को केंद्र में रखती है, तो गठबंधन की शर्तें भी उसी आधार पर तय करने की कोशिश कर सकती है।
यही यूकेडी को दूसरी पार्टियों से अलग पहचान दे सकता है।
2027 में असली लड़ाई वोट ट्रांसफर की होगी
भाजपा और कांग्रेस के बीच दलबदल का खेल जितना दिखाई दे रहा है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि नया नेता अपने साथ कितना वोट लेकर जाता है।
राजेंद्र भंडारी का बदरीनाथ उदाहरण बताता है कि व्यक्तिगत प्रभाव और पार्टी संगठन के बीच अंतर होता है। इसी तरह राजकुमार ठुकराल का कांग्रेस में जाना रुद्रपुर के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है, मगर अंतिम फैसला मतदाता करेगा।
यूकेडी के सामने भी यही परीक्षा है। उसके समर्थक क्षेत्रीय राजनीति के नाम पर मतदान करने के लिए कितनी मजबूती से तैयार हैं? क्या पुराने समर्थकों के साथ नई पीढ़ी जुड़ रही है? क्या पार्टी स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रत्याशी खड़े कर पा रही है? इन सवालों के उत्तर ही यूकेडी के पुनरुत्थान की वास्तविक तस्वीर बनाएंगे।
कांग्रेस के सामने पहाड़, भाजपा के सामने तराई
आज के राजनीतिक परिदृश्य को एक वाक्य में समझें तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती है—कांग्रेस को पहाड़ में नई जमीन तैयार करनी है, भाजपा को तराई में अपने पुराने समीकरण बचाने हैं और यूकेडी को पहाड़ की राजनीतिक चेतना को वोट में बदलना है।
कांग्रेस के पुराने चेहरे भाजपा में जाने से पहाड़ में उसका संगठनात्मक परीक्षण होगा। भाजपा में आए कांग्रेस नेताओं के कारण भाजपा को टिकट और कार्यकर्ता संतुलन की परीक्षा देनी होगी। तराई में कांग्रेस राजकुमार ठुकराल जैसे नेताओं के जरिए मुकाबला कड़ा करने की कोशिश करेगी।
इन दोनों के बीच यूकेडी यदि मजबूती से खड़ी होती है तो मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है।
2027: सत्ता की लड़ाई से ज्यादा पहचान की लड़ाई
उत्तराखंड बनने के 26 वर्ष बाद 2027 का विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। एक तरफ राष्ट्रीय दलों का संगठन, संसाधन और व्यापक चुनावी नेटवर्क है। दूसरी तरफ क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दों की राजनीति है।
यूकेडी की वापसी का अर्थ केवल किसी एक पार्टी की सीटों में वृद्धि से जुड़ा विषय नहीं होगा। इसका अर्थ यह भी होगा कि उत्तराखंड का मतदाता अपनी क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान को कितनी प्राथमिकता देता है।
यदि यूकेडी पहाड़ के मुद्दों को प्रभावी ढंग से जनता के सामने रखती है, मजबूत स्थानीय उम्मीदवार देती है और संगठन को बूथ तक सक्रिय करती है, तो 2027 में वह चुनाव की दिशा प्रभावित करने वाली ताकत बन सकती है।
और यदि चुनाव के बाद विधानसभा का गणित किसी भी बड़े दल को स्पष्ट बहुमत से दूर रखता है, तो यही यूकेडी सत्ता की चाबी रखने वाली पार्टी भी बन सकती है।
आज यह कहना कठिन है कि यूकेडी किसके साथ जाएगी। मगर यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि वह केवल तीसरे मोर्चे की भूमिका तक सीमित रहेगी।
2027 में संभव है कि भाजपा सत्ता बचाने के लिए तराई और पहाड़ दोनों में अपना आधार मजबूत करे, कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए नए और पुराने चेहरों का संतुलन बनाए और यूकेडी पहाड़ की अस्मिता को राजनीतिक शक्ति में बदलने का प्रयास करे।
तब चुनाव का सवाल केवल यह नहीं होगा कि भाजपा आएगी या कांग्रेस। असली सवाल यह होगा कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय आवाज कितनी मजबूत होकर विधानसभा पहुंचेगी।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यही 2027 की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी हो सकती है।
उत्तराखंड की राजनीति में इस बार दलबदल चेहरे बदल रहा है, मगर यूकेडी यदि मतदाता का मूड बदलने में सफल हो गई तो पूरा चुनावी गणित बदल सकता है।
और यही वह संभावना है जिसे भाजपा और कांग्रेस दोनों को गंभीरता से पढ़ना होगा—क्योंकि पहाड़ की राजनीति में यूकेडी की वापसी उत्तराखंड के क्षेत्रीय सवालों की राजनीतिक वापसी भी हो सकती है।
