इस समय देश के करोड़ों होम लोन और कार लोन ग्राहकों की नजरें आरबीआई के फैसले पर टिकी हुई हैं। हर कोई यह उम्मीद लगा रहा है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रेपो रेट में कटौती करके आम जनता को सस्ती ईएमआई (EMI) का तोहफा देंगे, या फिर कर्जदारों को ब्याज दरों में राहत पाने के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
क्या EMI होगी सस्ती?
हालांकि, एसबीआई रिसर्च (SBI Research) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल आम लोगों को लोन की किस्तों में राहत मिलने की संभावना काफी कम नजर आ रही है। एसबीआई की रिपोर्ट में यह साफ कहा गया है कि केंद्रीय बैंक इस बार रेपो रेट को मौजूदा स्तर पर ही स्थिर रख सकता है। इसके पीछे की सबसे मुख्य वजह खुदरा महंगाई (CPI Inflation) है। जानकारों का अनुमान है कि आने वाले अगले दो तिमाहियों तक खुदरा महंगाई दर 5 फीसदी से ऊपर बनी रह सकती है। ऐसे में बाजार में महंगाई को और ज्यादा बढ़ने से रोकने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में किसी भी तरह की जल्दबाजी या कटौती करने से परहेज करेगा और नीतिगत दरों को यथावत रखेगा।
अगर देश के आर्थिक आंकड़ों की बात करें तो चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि (GDP Growth Rate) 7 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान जताया गया है। इसके साथ ही जुलाई महीने के दौरान भारतीय बाजार में लगभग 35 अरब डॉलर का भारी कैपिटल इनफ्लो (पूंजी प्रवाह) देखा गया है। इस विदेशी निवेश की बदौलत 24 जुलाई तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) भी 12.5 अरब डॉलर बढ़कर एक मजबूत स्थिति में पहुंच गया है। इसके अतिरिक्त, जून के अंत तक तीन महीने की अवधि वाले फॉरवर्ड पोजीशन में 13 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई है, जिसने विदेशी मुद्रा बाजार में चल रहे अल्पकालिक तनाव को कम करने में काफी हद तक मदद की है।
RBI के लिए क्यों है चिंता का विषय?
इन तमाम सकारात्मक आर्थिक पहलुओं के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही भारतीय रुपये पर बढ़ता दबाव और वैश्विक पूंजी प्रवाह को लेकर बनी अनिश्चितता ऐसे कारक हैं जो रिजर्व बैंक के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। वैश्विक मुद्रा बाजार में अब भी असंतुलन की स्थिति बनी हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय रुपये पर देखने को मिला था। हालांकि, आरबीआई ने फॉरवर्ड मार्केट में अपनी सटीक वित्तीय रणनीति के जरिए निर्यातकों और आयातकों की हेजिंग गतिविधियों को नियंत्रित किया है, जिससे रुपये पर पड़ने वाला दबाव काफी हद तक संभल पाया है।
