जिहादी :सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो: क्या महिलाओं पर जूता उठाने वाला समाज ही ‘आधुनिक जिहादी’ मानसिकता का शिकार है?

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हाल ही में सोशल मीडिया पर एक झकझोर देने वाला वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो किसी मंदिर परिसर का बताया जा रहा है, जहां एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति दो महिलाओं पर चोरी का आरोप लगाकर उन्हें बेरहमी से जूते से पीट रहा है। विडंबना और क्रूरता की हद यह है कि वहां मौजूद भीड़ उस व्यक्ति को रोकने के बजाय उसे और उकसा रही है। यह घटना केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के दोहरे चरित्र, धार्मिक पाखंड और उस खोखली मानसिकता पर एक बहुत बड़ा तमाचा है, जो खुद को सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ मानती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

आस्था का पाखंड और वास्तविकता का टकराव

हिंदू सनातन संस्कृति में महिलाओं को ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ (जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं) के श्लोक से परिभाषित किया जाता है। नवदुर्गा के दिनों में बेटियों के पैर धोकर उन्हें लक्ष्मी, दुर्गा और काली का रूप मानकर पूजा जाता है।

लेकिन इस वायरल वीडियो ने इस आस्था के पीछे छिपे भयानक पाखंड को उजागर कर दिया है।

  • जिस मंदिर परिसर को पवित्रता, न्याय और करुणा का केंद्र होना चाहिए था, उसे हिंसा का अखाड़ा बना दिया गया।
  • पीटने वाला व्यक्ति हिंदू है।
  • पीड़ित दोनों महिलाएं भी हिंदू हैं।
  • और तमाशबीन बनकर हिंसा को बढ़ावा देने वाली, उकसाने वाली भीड़ भी हिंदू ही है।

यह दृश्य देखने के बाद यह सवाल उठना लाजमी है कि मंदिर की चौखट पर देवियों के भजन गाने वाले हाथ, एक पल में किसी असहाय महिला पर जूता उठाने के लिए कैसे तैयार हो जाते हैं?

जिहाद’ के मायने और असली ‘जिहादी’ कौन?

आमतौर पर ‘जिहादी’ शब्द का इस्तेमाल धार्मिक कट्टरता, उग्रवाद और दूसरों को नुकसान पहुंचाने वाली बाहरी ताकतों या किसी विशेष समुदाय (मुसलमानों) के संदर्भ में किया जाता रहा है। लेकिन इस घटना ने इस शब्द की परिभाषा को एक नए और डरावने सामाजिक संदर्भ में ला खड़ा किया है।

यदि ‘जिहाद’ या ‘कट्टरता’ का मतलब अपनी ही व्यवस्था, मर्यादा और मानवीय मूल्यों को नष्ट करना है, तो इस घटना के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा होता है: असली उग्रवादी या जिहादी मानसिकता किसकी है?

  • क्या वह व्यक्ति जिहादी नहीं है, जो कानून को हाथ में लेकर मर्यादा की सभी सीमाओं को लांघ चुका है?
  • क्या वह भीड़ जिहादी मानसिकता की शिकार नहीं है, जो न्याय करने के नाम पर एक अधेड़ पुरुष को दो महिलाओं पर अत्याचार करने के लिए उकसा रही है?

जब कोई समाज कानून, इंसानियत और अपनी ही संस्कृति के मूल सिद्धांतों (महिला सम्मान) का कत्ल करने लगे, तो उस समाज के भीतर पनप रही यह हिंसक प्रवृत्ति किसी भी बाहरी उग्रवाद से ज्यादा खतरनाक हो जाती है। यह अपने ही धर्म और समाज के खिलाफ एक ‘आंतरिक वैचारिक उग्रवाद’ है।

कानून और व्यवस्था को चुनौती

चोरी का आरोप सही है या गलत, यह तय करने का अधिकार देश की न्यायपालिका और पुलिस को है। किसी भी सभ्य समाज में भीड़ को ऑन-द-स्पॉट (मौके पर ही) सजा देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।
जब भीड़ खुद जज, जूरी और जल्लाद बन जाती है, तो वह लोकतंत्र और कानून व्यवस्था का गला घोंट देती है। मंदिर जैसे पवित्र स्थान पर कानून की ऐसी धज्जियां उड़ना यह दर्शाता है कि लोगों के भीतर से कानून का खौफ खत्म हो चुका है।

आत्ममंथन का समय

यह वायरल वीडियो किसी एक व्यक्ति की सनक का नतीजा नहीं है, बल्कि यह हमारे सामाजिक पतन का प्रमाण है। जब तक हम धर्म को केवल कर्मकांड और दिखावे तक सीमित रखेंगे और उसके नैतिक मूल्यों (जैसे करुणा, क्षमा और महिला सम्मान) को जीवन में नहीं उतारेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं समाज को शर्मसार करती रहेंगी।

यह समय उंगलियां उठाने का नहीं, बल्कि खुद के भीतर झांकने का है। यदि हम अपने ही घर की लक्ष्मी और दुर्गा को कानून के नाम पर सड़क या मंदिर में पिटते हुए देखकर मूकदर्शक बने हुए हैं, तो हमें खुद से पूछना होगा कि हमारी इस हिंसक और संवेदनहीन मानसिकता का जिम्मेदार कौन है?


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