हरिद्वार पुलिस के नाम खुला पत्र: देवभूमि की सड़कों पर कानून चलेगा या भीड़ का डंडा?

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हरिद्वार केवल एक शहर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। कांवड़ मेले के दौरान यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे समय में सुरक्षा व्यवस्था, कानून-व्यवस्था और पुलिस की सतर्कता सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। यदि इसी दौरान कोई व्यक्ति बैरिकेड तोड़कर जीरो जोन में वाहन लेकर प्रवेश कर जाता है, तो यह सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि उस पर नशे में वाहन चलाने या लोगों को टक्कर मारने जैसे आरोप हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


लेकिन इससे भी बड़ा सवाल तब खड़ा होता है, जब कानून अपने हाथ में लेकर भीड़ किसी व्यक्ति को घेर लेती है और लाठी-डंडों से उसकी बेरहमी से पिटाई करती है। किसी भी आरोप का फैसला सड़क पर खड़ी भीड़ नहीं कर सकती। यह अधिकार केवल न्यायालय और कानून को है।
यदि वायरल वीडियो में दिखाई गई घटना के अनुसार एक युवक को लंबे समय तक लोगों ने पीटा, उसके बाल पकड़कर घसीटा, लाठियों और डंडों से हमला किया और यह सब काफी देर तक चलता रहा, तो यह भी उतना ही गंभीर अपराध है जितना किसी वाहन चालक द्वारा कथित लापरवाही करना।
हरिद्वार पुलिस से पहला प्रश्न यही है कि यदि घटनास्थल से पुलिस चंद मीटर की दूरी पर मौजूद थी, तो भीड़ को रोकने में इतनी देर क्यों लगी? क्या किसी ने तत्काल हस्तक्षेप नहीं किया? क्या पुलिस बल पर्याप्त नहीं था? यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? इस पूरे घटनाक्रम की विभागीय जांच होनी चाहिए और यदि कहीं लापरवाही हुई है तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
इस घटना को किसी धार्मिक या सांप्रदायिक चश्मे से देखने की आवश्यकता नहीं है। यह हिंदू-मुस्लिम या किसी अन्य सामाजिक विवाद का विषय नहीं है। मूल प्रश्न यह है कि क्या किसी व्यक्ति की कथित गलती का फैसला सड़क पर मौजूद भीड़ करेगी? यदि आज किसी युवक को इस तरह पीटा जा सकता है, तो कल किसी भी निर्दोष व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है।
यदि युवक ने नशे में वाहन चलाया, किसी को चोट पहुंचाई या बैरिकेड तोड़े, तो भारतीय कानून में उसके लिए स्पष्ट दंड का प्रावधान है। पुलिस उसे गिरफ्तार करे, मेडिकल कराए, मुकदमा दर्ज करे और अदालत में पेश करे। लेकिन भीड़ द्वारा घंटों तक मारपीट करना किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
वीडियो में यदि स्पष्ट रूप से ऐसे लोग दिखाई दे रहे हैं जिन्होंने युवक पर हमला किया, लाठी-डंडे चलाए, बाल पकड़कर पीटा या हिंसा को बढ़ावा दिया, तो उन सभी की पहचान कर उनके विरुद्ध भी मुकदमा दर्ज होना चाहिए। कानून केवल एक पक्ष पर नहीं, बल्कि सभी दोषियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
हरिद्वार की पहचान संतों, साधुओं, गंगा और आस्था से है। यदि यहां आने वाले लोगों के मन में यह भय बैठ जाए कि किसी विवाद की स्थिति में भीड़ कानून अपने हाथ में ले लेगी, तो यह देवभूमि की छवि के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। उत्तराखंड की प्रतिष्ठा कानून के शासन से बनती है, भीड़ के शासन से नहीं।
हरिद्वार पुलिस से अपेक्षा है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाए कि वाहन जीरो जोन तक कैसे पहुंचा। यदि सुरक्षा में चूक हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाए। यदि चालक दोषी है, तो उसके खिलाफ वैधानिक कार्रवाई हो। साथ ही वीडियो में दिखाई देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान कर, जिन्होंने हिंसा की, उनके खिलाफ भी कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
कानून का सम्मान तभी स्थापित होगा जब अपराधी चाहे वाहन चालक हो या भीड़ का हिस्सा—दोनों के साथ समान व्यवहार किया जाए। न्याय का अर्थ किसी एक पक्ष को बचाना नहीं, बल्कि हर दोषी को कानून के दायरे में लाना है।
हरिद्वार पुलिस और उत्तराखंड पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से यही अपेक्षा है कि इस घटना को केवल एक सामान्य मारपीट का मामला मानकर न छोड़ा जाए। यदि भीड़तंत्र को समय रहते नहीं रोका गया, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं। देवभूमि की गरिमा बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि कानून का राज दिखाई भी दे और महसूस भी हो।
संपादक हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी का स्पष्ट मत है कि किसी भी व्यक्ति को न्यायालय से पहले भीड़ द्वारा सजा देना अस्वीकार्य है। यदि कोई दोषी है तो उसे कानून सजा देगा, भीड़ नहीं। और यदि भीड़ हिंसा करती है, तो वह भी उतनी ही दोषी है जितना कोई अन्य अपराधी। यही संवैधानिक व्यवस्था है और यही लोकतंत्र की पहचान भी।


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