संसद के मानसून सत्र के पहले बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार काफी सहज और रिलैक्स स्थिति में नजर आ रही थी। दूसरी ओर टीएमसी और शिवसेना यूबीटी में आंतरिक फूट के चलते विपक्षी दलों का इंडिया गठबंधन लगातार बैकफुट पर नजर आ रहा था लेकिन संसद सत्र शुरू हुआ तो बीजेपी की परेशानियां बढ़तीं चली गईं।

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20 जुलाई को संसद सत्र शुरू हुआ और पहले ही दिन पुलिस द्वारा हजारों युवाओं पर की गई कार्रवाई के बाद परिदृश्य बदल गया। ये युवा परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विरोध में संसद तक मार्च कर रहे थे और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को जीत मिली और प्रधान ने 25 जुलाई को इस्तीफा दे दिया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

मंत्री का इस्तीफा और उपचुनावों में हार

एक तरफ जहां मोदी सरकार के कद्दावर कैबिनेट मंत्री का इस्तीफा हु तो दूसरी ओर कुछ हफ्तों बाद बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले दो विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा, जिनमें से एक सीट भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की थी। यह सीट बिहार की बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र थी।

गुरुवार को मानसून सत्र समाप्त होने के साथ ही बीजेपी डिफेंसिव मोड में नजर आई। विपक्ष के विरोध के बीच लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कोई बयान नहीं दिया। गतिरोध के बीच पर्याप्त बहस के बिना ही विधेयक पारित कर दिए गए। हालांकि, सरकार साधारण बहुमत की आवश्यकता वाले विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित नहीं करा सकी और इसे संसद की संयुक्त समिति को भेज दिया।

नहीं पारित हो पाए दो अहम बिल

मानसून सत्र से पहले उम्मीद की जा रही थी, कि सरकार महिला आरक्षण कानून में संशोधन के साथ ही परिसीमन वाले बिलों को पारित करा लेगी लेकिन ये दोनों ही बिल संसद में पेश नहीं हुए। बीजेपी को अपने बहुमत को लेकर अनिश्चितता बनी रही। इसी बीच आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जेन जी के प्रदर्शनों पर लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया तो विरोध प्रदर्शनों में बाहरी ताकतों की कथित भूमिका पर एक नैरेटिव बनाने के बीजेपी के प्रयासों को झटका लगा।

बीजेपी के ही एक राष्ट्रीय पदाधिकारी ने कहा, “सरसंघचालक की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब पार्टी अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रही थी। यह बीजेपी और सरकार के लिए एक बड़ा झटका है। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में चुनाव की तैयारी कर रही पार्टी के लिए आरएसएस का अलग रुख अपनाना बुरी खबर है। बीजेपी नेतृत्व को अब सही दिशा में काम करने की जरूरत है।”

बीजेपी के अंदर भी नाराजगी

ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं कि जब सत्ताधारी दल के कुछ वर्गों में नितिन नवीन की टीम की घोषणा में देरी को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। एक वरिष्ठ सांसद ने कहा, “नए अध्यक्ष को तीन साल के लिए नियुक्त किया गया है। आठ महीने बीत चुके हैं और उनके लिए कोई नई टीम नहीं बनी है। हम मंत्रिमंडल में फेरबदल की खबरें सुनते आ रहे हैं, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है। मोदी सरकार और बीजेपी की खासियत निर्णय लेने की क्षमता थी। हमने यूपीए सरकार की नीतिगत गतिरोध की आलोचना की थी और अब हमारी पार्टी भी फैसले लेने में आनाकानी कर रही है।”

विपक्ष को भी घाटा होने का दावा

बीजेपी को इसमें सकारात्मक पहलू नजर आ रहा है। बीजेपी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने स्वीकार किया कि मानसून सत्र विफल रहा, लेकिन दावा किया कि विपक्ष को अधिक नुकसान हुआ क्योंकि वह संसद में बार-बार लक्ष्य बदलकर अपनी बात स्थापित नहीं कर सका।

बीजेपी के मुख्य चीफ व्हिप संजय जायसवाल ने कहा, “संसद इस तरह काम नहीं कर सकती। वे न सिर्फ लक्ष्य बदलते रहे, बल्कि मैदान ही बदल देते रहे। जब भी हम बहस के मुद्दों पर सहमत होते, विपक्ष अपना रुख बदल लेता। आप गृह मंत्री से बयान मांगते हैं और जब वे तैयार होते हैं, तो आप यह नहीं कह सकते कि ‘हम उनके उपदेश नहीं सुनना चाहते।” एक अन्य बीजेपी नेता ने कहा कि इतने हंगामेदार माहौल के बीच सरकार द्वारा 12 विधेयकों को पारित कराना एक कानूनी और संवैधानिक सफलता है।

बीजेपी के सहयोगियों ने भी उठाए सवाल

हालांकि, भाजपा सूत्रों ने स्वीकार किया कि जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन पुलिस की ज्यादतियों के आरोप, प्रधान का इस्तीफा, अमित शाह का सदन को संबोधित न करना, बांकीपुर और दतिया में चुनावी हार और एफसीआरए संशोधन विधेयक को संयुक्त समिति को भेजने के फैसले से ऐसा प्रतीत हुआ कि सरकार बैकफुट पर है। सूत्रों ने बताया कि भाजपा के सहयोगी दलों ने भी छात्र विरोध प्रदर्शन से निपटने के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

संसद में भी बीजेपी इस बात से हैरान थी कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उन सांसदों को निलंबित क्यों नहीं किया जो सदन को सुचारू रूप से चलने नहीं दे रहे थे, पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया। राज्यसभा अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन द्वारा सत्ता पक्ष से विपक्ष की भावनाओं को व्यक्त करने और सदन में शाह की उपस्थिति की मांग रखने का आग्रह करने से भी पार्टी के कई लोग स्तब्ध रह गए थे।

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को जनगणना के दौरान लोगों की गिनती के चरण में पूछे जाने वाले 40 सवालों को नोटफाई किया है। जनगणना के दौरान लोगों से पूछा जाएगा कि क्या वे एससी/एसटी या किसी अन्य दूसरी जाति से संबंध रखते हैं।


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