देहरादून से रुद्रपुर तक जमीन के खेल पर सवाल: भू-माफिया को संरक्षण दे रही सरकार?

Spread the love


देहरादून डिफेंस कालोनी में 250 करोड़ से अधिक के कथित भूमि घोटाले की जांच की मांग, रुद्रपुर में तालाब, नजूल और सीलिंग भूमि पर प्लाटिंग के आरोप; गरीबों पर बुलडोजर और प्रभावशाली लोगों पर मेहरबानी के सवाल

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


देहरादून/रुद्रपुर। उत्तराखंड में सरकारी और सार्वजनिक भूमि के संरक्षण को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। देहरादून की प्रतिष्ठित डिफेंस कालोनी में 250 करोड़ रुपये से अधिक के कथित भूमि घोटाले और सार्वजनिक हरित क्षेत्र को निजी उपयोग में लाने के आरोपों के बाद अब रुद्रपुर में भी तालाब, नजूल और सीलिंग भूमि पर कथित प्लाटिंग तथा निर्माण के मामलों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
देहरादून मामले में उपसचिव उत्तराखंड शासन की ओर से निबंधक सहकारी समितियां को पत्र भेजकर निष्पक्ष जांच कर आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया गया है। इस प्रकरण में 11 फरवरी 2025 को 16 पूर्व सैन्य अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई है।
डिफेंस कालोनी के हरित क्षेत्र पर गंभीर आरोप
सेवानिवृत्त कर्नल रमेश प्रसाद सिंह की शिकायत के अनुसार डिफेंस कालोनी की स्थापना वर्ष 1968 में कैंटोनमेंट शैली के आवासीय क्षेत्र के रूप में की गई थी। शिकायत में दावा किया गया है कि मूल लेआउट में करीब 45 प्रतिशत क्षेत्र खुले स्थान, पार्क, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित था।
आरोप है कि सोसायटी के पूर्व प्रबंधन और विभिन्न पदाधिकारियों के कार्यकाल में इन सार्वजनिक उपयोग की जमीनों को कथित रूप से निजी भूखंडों में परिवर्तित कर बिक्री की गई। शिकायतकर्ता के अनुसार इससे वर्तमान सर्किल रेट और निर्मित संपत्तियों के मूल्य को मिलाकर 250 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।
एक लाख वर्गमीटर से अधिक हरित क्षेत्र प्रभावित होने का दावा भी शिकायत में किया गया है। यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल जमीन की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण से भी जुड़ जाएगा।
शासन ने जांच के लिए लिखा पत्र
मामले में उपसचिव शासन की ओर से निबंधक सहकारी समितियां को निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया गया है। शिकायत में शहरी विकास एवं पर्यावरण विभाग के स्तर पर संयुक्त वैधानिक जांच समिति और बोर्ड गठित करने की मांग भी की गई है।
शिकायतकर्ता ने कथित अवैध संपत्ति निस्तारण से जुड़े प्रस्तावों को निरस्त करने तथा पर्यावरणीय क्षति और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई की कार्रवाई की मांग की है।
अब रुद्रपुर के मामलों पर भी उठ रहे सवाल
देहरादून प्रकरण के बीच रुद्रपुर में जमीन से जुड़े पुराने और नए विवादों ने भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पंतनगर क्षेत्र की भूमि पर प्लाटिंग से लेकर रुद्रपुर के शिवनगर मोड़ पर तालाब के रूप में दर्ज भूमि की कथित रजिस्ट्री और बाद में उसके स्वरूप परिवर्तन के आरोप लगाए जाते रहे हैं। इस मामले में जनहित याचिका दाखिल किए जाने की बात भी सामने आई है।
इसी तरह प्रीत विहार से सोनिया होटल होते हुए डिग्री कॉलेज तक नजूल भूमि पर कथित निर्माण और रिजॉर्ट विकसित किए जाने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। सीलिंग भूमि पर आधुनिक कालोनी विकसित कर कथित रूप से रजिस्ट्री और प्लाटिंग किए जाने के आरोप भी चर्चा में हैं।
इन मामलों की वास्तविक स्थिति दस्तावेजी जांच और सक्षम जांच एजेंसी की रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकती है। सवाल यह है कि यदि भूमि सरकारी, नजूल, तालाब अथवा सीलिंग श्रेणी में दर्ज थी तो उसके स्वरूप में बदलाव और रजिस्ट्री किस स्तर की अनुमति से हुई?
रोडवेज के पीछे जमीन का मामला भी चर्चा में
रुद्रपुर रोडवेज के पीछे प्रस्तावित आईएसबीटी से जुड़ी जमीन को लेकर भी स्थानीय स्तर पर गंभीर आरोप लगाए जाते रहे हैं। आरोप है कि सरकारी भूमि के उपयोग और आवंटन की प्रक्रिया में प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाया गया।
कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि भूमि से जुड़े इन मामलों में बड़े स्तर पर आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित विभागों तथा आरोपित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है।
गरीबों पर बुलडोजर, प्रभावशाली लोगों की जमीन पर चुप्पी क्यों?
सबसे बड़ा सवाल सरकार की कार्रवाई की समानता को लेकर है।
एक तरफ सड़क चौड़ीकरण, अतिक्रमण और सरकारी जमीन खाली कराने के नाम पर गरीब दुकानदारों और छोटे कारोबारियों के प्रतिष्ठानों पर बुलडोजर चलाए जाते हैं, दूसरी तरफ यदि प्रभावशाली लोगों के कब्जे, अवैध निर्माण अथवा सरकारी भूमि के कथित हस्तांतरण के आरोप सामने आते हैं तो कार्रवाई की गति पर सवाल क्यों उठते हैं?
क्या सरकारी जमीन का कानून गरीब और प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अलग-अलग है?
क्या किसी भी सरकारी अधिकारी, राजनेता या प्रभावशाली व्यक्ति से जुड़े होने के कारण भूमि संबंधी शिकायतों की जांच प्रभावित हो सकती है?
सरकार पर भू-माफिया को संरक्षण देने के आरोप
देहरादून के डिफेंस कालोनी प्रकरण से लेकर रुद्रपुर के कथित तालाब, नजूल और सीलिंग भूमि विवादों तक यदि एक पैटर्न दिखाई देता है तो सरकार को इसकी उच्चस्तरीय जांच करानी चाहिए।
विपक्ष और जनसंगठनों की ओर से अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उत्तराखंड में भू-माफिया और प्रभावशाली लोगों का गठजोड़ सरकारी जमीनों पर भारी पड़ रहा है। यदि प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत या राजनीतिक संरक्षण के आरोप सामने आते हैं तो उनकी भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सरकारी जमीन आखिर किसकी है—जनता की या प्रभावशाली लोगों की?
सरकार यदि पारदर्शिता को लेकर गंभीर है तो देहरादून से रुद्रपुर तक विवादित भूमि की श्रेणी, खसरा नंबर, रजिस्ट्री, भूमि उपयोग परिवर्तन, निर्माण अनुमति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच सार्वजनिक कर सकती है।
आरोप सही हैं तो दोषियों से सरकारी भूमि वापस ली जाए और नुकसान की भरपाई कराई जाए। आरोप गलत हैं तो दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट की जाए।
जनता को अब आश्वासन नहीं, जमीन के दस्तावेज और कार्रवाई का परिणाम चाहिए।


Spread the love