उत्तराखंड देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था में डिजिटल सिस्टम लागू करने के दावों के बीच दो अलग-अलग मामले व्यवस्था की गंभीर तस्वीर सामने ला रहे हैं। एक ओर उच्च शिक्षा विभाग का समर्थ पोर्टल तीन राज्य विश्वविद्यालयों में प्रवेश से लेकर परीक्षा तक की प्रक्रिया को एक मंच पर लाने के बावजूद बुनियादी स्तर की खामियों से जूझ रहा है। दूसरी ओर उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (वीपीडीओ) परीक्षा-2016 में सामने आई कथित अनियमितताओं की जांच करीब एक दशक बाद भी नए मोड़ ले रही है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
समर्थ पोर्टल पर स्नातक के तीसरे और पांचवें सेमेस्टर में प्रवेश का विकल्प उपलब्ध नहीं होने से प्रदेशभर में 40 हजार से अधिक विद्यार्थियों के दाखिले प्रभावित होने की स्थिति बन गई है। कुमाऊं विश्वविद्यालय, एसएसजे विश्वविद्यालय और श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय ने 29 सितंबर को छात्र संघ चुनाव कराने की तिथि घोषित कर दी है। ऐसे में चुनाव से पहले प्रवेश प्रक्रिया पूरी कराने का दबाव बढ़ गया है।
दूसरी तरफ वीपीडीओ-2016 परीक्षा में कथित ओएमआर हेराफेरी और अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोपों की जांच अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) तक पहुंच चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ठिकानों पर ईडी की कार्रवाई ने इस पुराने मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
समर्थ पोर्टल पर तीसरे-पांचवें सेमेस्टर का विकल्प ही नहीं
प्रदेश में वर्ष 2025 से नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संशोधित पाठ्यक्रम को लागू किया जा चुका है। उच्च शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और डिजिटल बनाने के उद्देश्य से समर्थ पोर्टल के माध्यम से प्रवेश, परीक्षा और अन्य प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने की व्यवस्था की गई है।
लेकिन समस्या यह है कि पोर्टल में स्नातक के विषम सेमेस्टर यानी तीसरे और पांचवें सेमेस्टर में प्रवेश का विकल्प ही उपलब्ध नहीं बताया जा रहा है। इसका सीधा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ रहा है, जिन्हें अगले सेमेस्टर में पहुंचने के लिए औपचारिक प्रवेश प्रक्रिया पूरी करनी है।
स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि राज्य के तीन विश्वविद्यालयों के अधीन आने वाले महाविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव 29 सितंबर को प्रस्तावित हैं। चुनाव प्रक्रिया से पहले विद्यार्थियों का प्रवेश और उनका रिकॉर्ड दुरुस्त होना जरूरी है। ऐसे में पोर्टल की तकनीकी कमी अब केवल ऑनलाइन व्यवस्था की समस्या नहीं रह गई, बल्कि इसका असर कॉलेज प्रशासन, विद्यार्थियों और छात्र राजनीति तक दिखाई देने लगा है।
एमबीपीजी कॉलेज की स्थिति इसका बड़ा उदाहरण है। यहां पांच हजार से अधिक विद्यार्थी पोर्टल खुलने और प्रवेश विकल्प उपलब्ध होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रदेशभर में यह संख्या 40 हजार से अधिक बताई जा रही है।
दो साल बाद भी पोर्टल की मूल समस्या जस की तस
समर्थ पोर्टल को वर्ष 2024 से लागू किया गया था। प्राध्यापकों के अनुसार शुरुआत से ही यूजी के तीसरे और पांचवें सेमेस्टर में प्रवेश का विकल्प उपलब्ध नहीं रहा। नतीजा यह हुआ कि कॉलेजों को वैकल्पिक व्यवस्था के सहारे विद्यार्थियों की प्रक्रिया आगे बढ़ानी पड़ी।
कॉलेज स्तर पर फीस जमा कराने के बाद परीक्षा पोर्टल के माध्यम से विद्यार्थियों के प्रवेश को सत्यापित किया जाता रहा। परीक्षा आवेदन के समय विद्यार्थियों की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही कॉलेजों को पता चलता था कि कौन विद्यार्थी किस स्थिति में है।
सवाल यह है कि जब समर्थ पोर्टल का उद्देश्य प्रवेश से परीक्षा तक की पूरी प्रक्रिया को एकीकृत करना था, तो प्रवेश की मूल प्रक्रिया में ही विकल्प उपलब्ध क्यों नहीं कराया गया? यदि दो साल से यह समस्या बनी हुई है तो अब तक इसका स्थायी तकनीकी समाधान क्यों नहीं हो पाया?
विषय चयन की व्यवस्था पर भी सवाल
समर्थ पोर्टल की खामियां केवल सेमेस्टर प्रवेश तक सीमित नहीं बताई जा रही हैं। विद्यार्थियों को परीक्षा फार्म भरते समय विषय चयन का विकल्प दिया जाता है। प्राध्यापकों का कहना है कि विषय चयन की प्रक्रिया प्रवेश के समय ही पूरी होनी चाहिए।
प्रवेश के समय विषय चयन नहीं होने से परीक्षा आवेदन के दौरान विद्यार्थियों के विषयों में गड़बड़ी की आशंका बनी रहती है। बाद में परीक्षा के दौरान या उससे पहले विषय संशोधन के मामले सामने आते हैं। इससे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए अतिरिक्त प्रशासनिक काम पैदा होता है।
डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य यदि प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना है, तो ऐसी कमियां उल्टा विद्यार्थियों और संस्थानों के लिए परेशानी का कारण बन रही हैं।
चुनाव नजदीक, छात्र नेताओं का दबाव बढ़ा
29 सितंबर को होने वाले छात्र संघ चुनाव ने समर्थ पोर्टल की समस्या को और संवेदनशील बना दिया है। 114 राजकीय कॉलेजों और पांच परिसरों में चुनाव प्रस्तावित हैं। प्रवेश प्रक्रिया लंबित रहने की स्थिति में छात्र नेताओं के बीच भी असंतोष बढ़ने की संभावना है।
कॉलेज प्रशासन विश्वविद्यालयों से संपर्क कर पोर्टल में तीसरे और पांचवें सेमेस्टर के प्रवेश का विकल्प उपलब्ध कराने की मांग कर रहा है। अब मामला विश्वविद्यालय स्तर से आगे बढ़कर पोर्टल व्यवस्था में सुधार तक पहुंच गया है।
यह स्थिति उच्च शिक्षा विभाग के उस दावे पर भी सवाल खड़े करती है, जिसमें डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से उच्च शिक्षा की प्रक्रियाओं को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की बात कही जाती रही है।
वीपीडीओ-2016: एक परीक्षा, कई सवाल और एक दशक लंबी जांच
समर्थ पोर्टल की मौजूदा खामियों के बीच उत्तराखंड की भर्ती व्यवस्था से जुड़ा एक पुराना मामला भी फिर सुर्खियों में है। वर्ष 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में सामने आई कथित अनियमितताओं की जांच करीब एक दशक बाद भी जारी है।
यूकेएसएसएससी ने 6 मार्च 2016 को प्रदेशभर में 236 केंद्रों पर वीपीडीओ के 196 पदों के लिए परीक्षा कराई थी। इसमें 87,196 अभ्यर्थी शामिल हुए। 30 मार्च 2016 को परिणाम घोषित किया गया और 196 अभ्यर्थियों के चयन की घोषणा हुई।
परिणाम सामने आने के साथ ही परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे। अभ्यर्थियों की ओर से शिकायतें की गईं और चयन प्रक्रिया पर संदेह गहराता गया।
शिकायतों में चयन के पैटर्न को लेकर भी सवाल उठे। बाद की जांच में एक ही गांव से बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों के चयन और दो सगे भाइयों के चयन को लेकर भी सवाल सामने आए।
2017 में जांच समिति, फिर निरस्त हुआ परिणाम
शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए वर्ष 2017 में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई। जांच में परीक्षा में अनियमितताओं की पुष्टि होने की बात सामने आई।
जांच समिति की रिपोर्ट और बाद में न्यायालय के निर्देशों के आधार पर वर्ष 2016 की परीक्षा का परिणाम निरस्त कर दिया गया। इसके बाद दोबारा परीक्षा आयोजित की गई।
दोबारा हुई परीक्षा का परिणाम इस पूरे मामले में बेहद महत्वपूर्ण माना गया। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार पहली परीक्षा में चयनित 196 अभ्यर्थियों में से केवल आठ अभ्यर्थी ही दोबारा चयनित हो पाए। इससे पहली परीक्षा के परिणाम को लेकर उठे संदेह और गहरे हुए।
2019 में विजिलेंस को जांच, 2020 में एफआइआर
सरकार ने वर्ष 2019 में इस प्रकरण की जांच सतर्कता अधिष्ठान को सौंप दी। विजिलेंस ने खुली जांच के बाद जनवरी 2020 में मुकदमा दर्ज किया।
हालांकि शुरुआती दौर में जांच की गति धीमी रही। लंबे समय तक मामले में कोई बड़ी गिरफ्तारी सामने नहीं आई। वर्ष 2022 में जब उत्तराखंड में अन्य भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के मामले सामने आए तो पुराने वीपीडीओ प्रकरण की जांच भी फिर तेज हुई।
अगस्त-सितंबर 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर मामला विजिलेंस से विशेष कार्यबल (एसटीएफ) को सौंपा गया।
ओएमआर जांच से सामने आया हेराफेरी का आरोप
एसटीएफ ने जांच आगे बढ़ाते हुए परीक्षा की ओएमआर शीटों की फॉरेंसिक जांच कराई। चंडीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट में 54 ओएमआर शीटों में परीक्षा के बाद कथित तौर पर छेड़छाड़ कर दोबारा उत्तरों के गोले भरे जाने की पुष्टि होने की बात सामने आई।
यहीं से जांच ने नया मोड़ लिया। मामला केवल परीक्षा संचालन में अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ओएमआर शीट में कथित सुनियोजित हेराफेरी और पैसे लेकर अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के आरोपों तक पहुंच गया।
जांच में यह भी सामने आया कि ओएमआर की स्कैनिंग और अंतिम परिणाम तैयार करने का काम आयोग के तत्कालीन सचिव मनोहर सिंह कन्याल के घर पर हुआ था। एसटीएफ ने दो दर्जन से अधिक अभ्यर्थियों की पहचान कर उनके बयान दर्ज किए। कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान न्यायालय में भी दर्ज कराए गए।
आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष-सचिव समेत अधिकारी गिरफ्तार
जांच के शुरुआती चरण में एसटीएफ ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया। इनमें आरएमएस टेक्नो साल्यूशंस से जुड़े राजेश पाल, पौड़ी में तैनात शिक्षक मुकेश कुमार शर्मा और काशीपुर निवासी मुकेश चौहान शामिल थे।
इसके बाद 8 अक्टूबर 2022 को एसटीएफ ने आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डा. आरबीएस रावत, तत्कालीन सचिव मनोहर सिंह कन्याल और तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक राजेंद्र सिंह पोखरिया को गिरफ्तार किया।
इन गिरफ्तारियों ने भर्ती परीक्षा की जांच को एक बड़े स्तर पर पहुंचा दिया। जांच एजेंसी के अनुसार ओएमआर शीट में कथित बदलाव कर अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने का आरोप सामने आया था।
4500 पन्नों की चार्जशीट और आगे बढ़ी जांच
जनवरी 2023 में एसटीएफ ने आरबीएस रावत, मनोहर कन्याल, राजेंद्र पोखरिया तथा आरएमएस कंपनी से जुड़े राजेश चौहान, संजीव चौहान और विपिन बिहारी के खिलाफ करीब 4,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की।
इससे पहले तीन आरोपितों के खिलाफ अलग से चार्जशीट दाखिल की जा चुकी थी। एसटीएफ ने कुल 12 लोगों को आरोपित बनाए जाने की जानकारी दी थी। मामले में आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत धाराएं लगाई गईं।
54 ओएमआर शीटों की फॉरेंसिक जांच इस पूरे प्रकरण की अहम कड़ी बनकर सामने आई।
पुलिस जांच से ईडी तक पहुंची कहानी
वीपीडीओ-2016 मामले समेत भर्ती परीक्षाओं में सामने आए कथित पेपर लीक और अनियमितताओं की जांच आगे बढ़ी तो धन के लेन-देन का पहलू भी सामने आया। इसी क्रम में प्रवर्तन निदेशालय ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जांच शुरू की।
ईडी की दिसंबर 2024 की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार एजेंसी ने आयोग से जुड़ी विभिन्न परीक्षाओं में कथित पेपर लीक मामलों के संबंध में जांच शुरू की थी। जांच के दौरान बैंक खातों में उपलब्ध धनराशि फ्रीज करने और नकदी जब्त करने जैसी कार्रवाई भी की गई।
अब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ठिकानों पर ईडी की दस्तक ने इस पुराने प्रकरण को फिर राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
दो मामले, एक बड़ा सवाल: व्यवस्था कब सुधरेगी?
समर्थ पोर्टल की तकनीकी खामी और वीपीडीओ-2016 भर्ती परीक्षा की लंबी जांच भले ही दो अलग-अलग मामले हैं, लेकिन दोनों उत्तराखंड की प्रशासनिक और शैक्षिक व्यवस्था के सामने एक समान सवाल खड़ा करते हैं—व्यवस्था बनाने के बाद उसकी निगरानी और समय पर सुधार की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
एक तरफ हजारों विद्यार्थी केवल इसलिए अगले सेमेस्टर में प्रवेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि पोर्टल में आवश्यक विकल्प मौजूद नहीं है। दूसरी तरफ करीब दस वर्ष पुरानी भर्ती परीक्षा में कथित गड़बड़ियों की परतें आज भी जांच और कार्रवाई के रूप में सामने आ रही हैं।
डिजिटल शिक्षा व्यवस्था की सफलता केवल पोर्टल शुरू करने से नहीं होगी। उसमें सभी आवश्यक विकल्प समय पर उपलब्ध कराना, तकनीकी खामियों को दूर करना और विद्यार्थियों को बिना परेशानी के प्रवेश से परीक्षा तक की सुविधा देना भी उतना ही जरूरी है।
इसी तरह भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल परीक्षा कराने से नहीं, बल्कि प्रश्नपत्र, ओएमआर, परिणाम और चयन की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और सुरक्षित रखने से तय होती है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां युवाओं के लिए सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा दोनों बेहद महत्वपूर्ण हैं, ऐसी खामियां सीधे उनके भविष्य को प्रभावित करती हैं। इसलिए समर्थ पोर्टल की मौजूदा समस्या का तत्काल समाधान और वीपीडीओ-2016 जैसे मामलों की निष्पक्ष जांच—दोनों ही सरकार और संबंधित संस्थाओं की प्राथमिकता होनी चाहिए।
