पीयूष धामी ने संभाली कमान: सीमांत में लोक कलाओं के प्रचार-प्रसार के लिए जीजीआईसी की बेटियों को दी लोकगीतों की दीक्षा

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पिथौरागढ़। आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच उत्तराखंड की लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की चुनौती लगातार बढ़ रही है। बदलती जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक लोकगीत और लोक परंपराएं धीरे-धीरे समाज से दूर होती जा रही हैं। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए आगे आता है और युवाओं को उससे जोड़ने का प्रयास करता है, तो यह पहल समाज के लिए प्रेरणा का विषय बन जाती है। इसी दिशा में पिथौरागढ़ के गंगोत्री गर्बियाल राजकीय बालिका इंटर कॉलेज (जीजीआईसी) में आयोजित एक दिवसीय ‘सातूं-आंठू’ लोकगीत गायन कार्यशाला ने लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है।
‘लोक विरासत जनजातीय एवं लोक कला समिति’ के बैनर तले आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य छात्राओं को उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं से परिचित कराना और उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना था। कार्यशाला का संचालन इस प्रकार किया गया कि विद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियों पर कोई प्रभाव न पड़े। इसके लिए प्रशिक्षण को अलग-अलग सत्रों में आयोजित किया गया, जिससे छात्राओं को पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रशिक्षण का भी लाभ मिल सके।
कार्यशाला के दौरान छात्राओं को गौरा-महेश्वर की उत्पत्ति से जुड़े पारंपरिक गीतों का अभ्यास कराया गया। इसके साथ ही उन्हें उत्तराखंड के पारंपरिक खेलों, झोड़ा और चांचरी जैसी लोक विधाओं की बारीकियों से भी अवगत कराया गया। प्रशिक्षकों ने छात्राओं को इन लोकगीतों के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
उत्तराखंड के पर्व और लोकगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे यहां के इतिहास, लोकजीवन और सामाजिक मूल्यों के संवाहक भी हैं। ‘सातूं-आंठू’ पर्व कुमाऊं क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें लोकगीतों के माध्यम से प्रकृति, परिवार, आस्था और सामाजिक संबंधों को अभिव्यक्ति दी जाती है। यही कारण है कि इस परंपरा को जीवित रखना आज की सबसे बड़ी सांस्कृतिक जरूरतों में शामिल हो गया है।
कार्यक्रम में विद्यालय की प्रधानाचार्या हंसा धामी ने समिति के संस्थापक और अध्यक्ष पीयूष धामी के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि युवाओं को नि:शुल्क प्रशिक्षण देकर लोक संस्कृति के संरक्षण का जो अभियान चलाया जा रहा है, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के साथ संस्कृति का समन्वय विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। ऐसे कार्यक्रम छात्राओं में आत्मविश्वास बढ़ाने के साथ-साथ अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना भी विकसित करते हैं।
समिति के संस्थापक और अध्यक्ष पीयूष धामी ने कहा कि ‘सातूं-आंठू’ की गायन परंपरा बहुत व्यापक रही है। समय के साथ इस परंपरा के अनेक दुर्लभ और अमूल्य गीत विलुप्त हो चुके हैं। यदि वर्तमान पीढ़ी को इन गीतों से परिचित नहीं कराया गया, तो आने वाले समय में यह सांस्कृतिक धरोहर केवल पुस्तकों तक सीमित होकर रह जाएगी। इसलिए जमीनी स्तर पर लोकगीतों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अभियान किसी एक विद्यालय तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में विभिन्न शिक्षण संस्थानों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इस प्रकार की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोक संस्कृति का संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं के माध्यम से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों को मिलकर काम करना होगा। जब विद्यालयों में इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, तो विद्यार्थियों के भीतर अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं के प्रति स्वाभाविक लगाव विकसित होता है।
पिथौरागढ़ में आयोजित यह कार्यशाला केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त प्रयास भी था। यदि ऐसे प्रयास निरंतर जारी रहे, तो उत्तराखंड की लोक संस्कृति आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुंच सकेगी और लोकगीतों की मधुर धुनें लंबे समय तक समाज में गूंजती रहेंगी। सीमांत जनपद में पीयूष धामी की यह पहल यह संदेश देती है कि संस्कृति का संरक्षण केवल पुस्तकों और मंचों तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसे नई पीढ़ी के बीच जीवंत बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। यही प्रयास भविष्य में उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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