विशेष रिपोर्ट
सरकार द्वारा पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने (E20 Fuel) के लक्ष्य को पूरा करने की अंधी दौड़ ने अब आम आदमी की रसोई और जेब पर सीधा हमला बोल दिया है। एक तरफ सरकार इसे ‘हरित ईंधन’ और ‘आत्मनिर्भरता’ का जामा पहनाकर अपनी पीठ थपथपा रही है, वहीं दूसरी तरफ इस नीति के कारण देश में चीनी का संकट गहराने लगा है और वाहन मालिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
1. चीनी पर सबसे बड़ा प्रहार: मीठी चीनी में घुली महंगाई की कड़वाहट
इथेनॉल मिश्रण नीति का सबसे घातक और सीधा असर चीनी उद्योग और उसकी कीमतों पर पड़ा है:
- गन्ने के रस का डायवर्जन: चीनी मिलें ज्यादा मुनाफे के चक्कर में गन्ने के रस और ‘बी-हैवी मोलासेस’ का इस्तेमाल चीनी बनाने के बजाय इथेनॉल बनाने के लिए कर रही हैं।
- उत्पादन में भारी गिरावट: गन्ने का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल में तब्दील होने के कारण देश में वास्तविक चीनी के उत्पादन में भारी कमी आई है।
- आसमान छूती कीमतें: बाजार में चीनी की सप्लाई कम होने से इसके दाम लगातार बढ़ रहे हैं। त्योहारों के सीजन में आम उपभोक्ताओं को चीनी खरीदने के लिए अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ रही है।
- सरकारी नियंत्रण और अस्थिरता: सरकार कभी चीनी मिलों पर इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के इस्तेमाल पर रोक लगाती है तो कभी ढील देती है। सरकार की इस अस्थिर नीति के कारण चीनी उद्योग में भ्रम का माहौल है और बाजार में जमाखोरी बढ़ रही है।
2. आम जनता और अन्य चीजों पर क्या पड़ रहा है फर्क?
- वाहनों के इंजन को नुकसान (इंजन कोरोजन): पुरानी गाड़ियां (जो E20 ईंधन के अनुकूल नहीं हैं) में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल डालने से उनके इंजन के पुर्जे, रबर की पाइपें और फ्यूल पंप तेजी से खराब हो रहे हैं। इथेनॉल नमी को सोखता है, जिससे टैंक के अंदर जंग लगने की समस्या आ रही है। इसका खामियाजा आम गाड़ी मालिकों को महंगे रिपेयरिंग बिल के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
- कम माइलेज, ज्यादा खर्च: इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) शुद्ध पेट्रोल से कम होती है। इसका मतलब है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों का माइलेज 5% से 10% तक गिर जाता है। सरकार पेट्रोल की कीमत कम नहीं कर रही, यानी जनता को उतने ही पैसों में कम माइलेज मिल रहा है।
- खाद्य सुरक्षा पर संकट: केवल गन्ना ही नहीं, सरकार अब मक्का और टूटे हुए चावल (अनाज) से भी इथेनॉल बनाने को बढ़ावा दे रही है। अनाज का उपयोग ईंधन बनाने में होने से पशु चारे (Poultry Feed) की कमी हो गई है, जिससे दूध, चिकन और अंडों के दाम भी बढ़ रहे हैं। यह नीति सीधे तौर पर इंसानों और मवेशियों के निवाले को छीनकर गाड़ियों के टैंक में भरने जैसी है।
- किसानों को भुगतान में देरी: भले ही सरकार दावा करे कि किसानों को फायदा हो रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि कई राज्यों में चीनी मिलें इथेनॉल से तगड़ा मुनाफा कमाने के बावजूद किसानों का गन्ने का बकाया समय पर नहीं चुका रही हैं।
जनता के पैसे पर सरकार का प्रयोग
सरकार की यह इथेनॉल नीति आम आदमी की थाली को महंगी करके और उनकी गाड़ियों को नुकसान पहुंचाकर केवल कुछ बड़े उद्योगपतियों और डिस्टिलरी मालिकों को फायदा पहुंचा रही है। जब तक सरकार चीनी के घरेलू स्टॉक को सुरक्षित नहीं करती और पुराने वाहनों के नुकसान की भरपाई के उपाय नहीं करती, तब तक यह नीति आम जनता के लिए ‘अमृत’ नहीं बल्कि ‘आफत’ ही साबित होगी।
