डॉक्टर नहीं तो फार्मासिस्ट से इलाज?उत्तराखंड की स्वास्थ्य नीति पर बड़ा सवालसंपादकीय | अवतार सिंह बिष्ट

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उत्तराखंड राज्य बने 26 वर्ष हो चुके हैं। इन 26 वर्षों में पहाड़ की सबसे बड़ी जरूरतों में स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी सवालों के घेरे में खड़ी है। दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी पुरानी समस्या है, अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद खाली हैं और मरीज बेहतर इलाज के लिए मैदानी शहरों अथवा निजी अस्पतालों की ओर जाने को मजबूर हैं। अब सरकार डॉक्टर विहीन अस्पतालों में फार्मासिस्टों को सीमित दवा लिखने का अधिकार देने की दिशा में प्रस्ताव तैयार कर रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

योजना के तहत फार्मासिस्टों को खांसी, जुकाम, बुखार के साथ ही यूटीआई इंफेक्शन और सांस संबंधी रोगों की सीमित दवा लिखने का अधिकार दिया जाएगा। हालांकि इससे पहले एक कमेटी गठित की जाएगी जो असम और हिमाचल जैसे राज्यों में फार्मासिस्टों को दिए गए दवा लिखने संबंधी अधिकारों की समीक्षा करेगी। विदित है कि फार्मासिस्ट देश के कई अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तराखंड में भी दवा लिखने का अधिकार मांग रहे हैं। हाल ही में स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के साथ हुई बैठक के दौरान भी यह मांग उठी थी।

दुर्गम क्षेत्र के मरीजों को मिलेगा फायदा

राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में कई ऐसे अस्पताल हैं जहां पर डॉक्टर न होने की वजह से मरीजों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यदि सरकार फार्मासिस्टों को दवा लिखने का अधिकार देती है तो उससे मरीजों को राहत मिलेगी। साथ ही इस फैसले से फार्मासिस्ट संवर्ग को भी बड़ी राहत मिलेगी।


सवाल यह है कि क्या डॉक्टरों की कमी का समाधान फार्मासिस्टों को दवा लिखने का अधिकार देना है?
खांसी, जुकाम, बुखार, यूटीआई और सांस संबंधी कुछ रोगों के लिए सीमित दवा लिखने की व्यवस्था तत्काल राहत का रास्ता दिखाई दे सकती है, मगर यह उत्तराखंड की मूल स्वास्थ्य समस्या का समाधान कैसे बनेगी? असली सवाल डॉक्टरों की उपलब्धता का है। विशेषज्ञ चिकित्सक कहां हैं? ग्रामीण और पहाड़ी अस्पतालों में चिकित्सकों की नियमित तैनाती क्यों सुनिश्चित नहीं हो पा रही है? वर्षों से खाली पड़े पदों को भरने की ठोस नीति कहां है?
रुद्रपुर जैसे शहर में डॉक्टरों की कमी तो पहाड़ का क्या होगा?
पहाड़ के दुर्गम इलाकों की बात बाद में करते हैं। रुद्रपुर जैसे औद्योगिक शहर में मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और आधुनिक जांच सुविधाएं मौजूद हैं। अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एक्स-रे सहित अनेक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके बावजूद यदि मरीजों को पर्याप्त डॉक्टर और विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध कराने में व्यवस्था संघर्ष कर रही है तो सरकार को अपने स्वास्थ्य मॉडल पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए।
जब राज्य के प्रवेश द्वार और प्रमुख औद्योगिक शहर में चिकित्सकों की उपलब्धता सवाल बन रही है, तब पहाड़ के दूरस्थ अस्पतालों में मरीज किस भरोसे इलाज कराए?
डॉक्टर पहाड़ क्यों नहीं चढ़ना चाहते?
उत्तराखंड में वर्षों से यह सवाल उठ रहा है कि चिकित्सकों को दुर्गम क्षेत्रों में सेवा के लिए कैसे तैयार किया जाए। क्या सरकार ने कभी गंभीरता से यह अध्ययन किया कि डॉक्टर पहाड़ जाने से किन कारणों से बचते हैं?
दुर्गम सेवा के लिए बेहतर आवास, शिक्षा सुविधा, सुरक्षा, पदोन्नति में प्रोत्साहन, विशेषज्ञ भत्ते, आधुनिक उपकरण और पारदर्शी ट्रांसफर नीति जैसे विषयों पर ठोस व्यवस्था क्यों नहीं बन पाई?
और सबसे गंभीर सवाल ट्रांसफर नीति पर है। यदि कोई चिकित्सक पहाड़ में नियुक्त होता है और बाद में मैदानी क्षेत्र में आकर निजी प्रैक्टिस करने लगता है, तो सरकार की निगरानी व्यवस्था क्या कर रही है? सरकारी अस्पताल की नौकरी और निजी प्रैक्टिस के बीच नियमों की निगरानी कितनी प्रभावी है?
गर्भवती महिला को फार्मासिस्ट नहीं, विशेषज्ञ डॉक्टर चाहिए
स्वास्थ्य व्यवस्था का असली परीक्षण सामान्य बुखार की दवा से नहीं होता। असली परीक्षा तब होती है जब किसी गर्भवती महिला को प्रसव के दौरान जटिलता आती है, जब बच्चे को तत्काल विशेषज्ञ उपचार चाहिए, जब किसी मरीज को हार्ट अटैक पड़ता है, जब दुर्घटना में गंभीर चोट आती है या जब किसी मरीज को ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है।
ऐसे समय फार्मासिस्ट की सीमित दवा लिखने की व्यवस्था कितनी मदद करेगी?
उत्तराखंड की माताएं और बहनें आज भी गर्भावस्था के दौरान बेहतर चिकित्सा सुविधा के लिए निजी अस्पतालों तक पहुंचने को विवश होती हैं। पहाड़ से मरीजों को रेफर करके मैदानी शहरों तक लाना स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूरी बन गया है। क्या 26 वर्ष बाद भी यही उत्तराखंड के सरकारी स्वास्थ्य मॉडल की पहचान रहेगी?
पीजी डॉक्टरों की हड़ताल ने व्यवस्था की कमजोरी उजागर की
दूसरी ओर एमबीबीएस इंटर्न और पीजी डॉक्टरों की हड़ताल का असर दून अस्पताल की व्यवस्थाओं पर दिखाई दे रहा है। इलेक्टिव सर्जरी की संख्या घट रही है और मरीजों की भर्ती तथा ऑपरेशन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
यह परिस्थिति एक और सवाल खड़ा करती है—जब मेडिकल कॉलेज और बड़े अस्पतालों की व्यवस्था प्रशिक्षु तथा पीजी डॉक्टरों की सेवाओं पर इतनी निर्भर है, तब सरकार ने वैकल्पिक मानव संसाधन की व्यवस्था कितनी मजबूत बनाई है?
सरकार को फार्मासिस्ट नहीं, स्वास्थ्य नीति का इलाज करना होगा
फार्मासिस्ट स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। उनका सम्मान और उनकी जिम्मेदारी दोनों जरूरी हैं। मगर डॉक्टरों की कमी का स्थायी विकल्प फार्मासिस्टों को सीमित दवा लिखने का अधिकार देना बना दिया गया तो सरकार मूल समस्या से बच निकलने का रास्ता तलाशती दिखाई देगी।
सरकार को चाहिए कि वह पहले अपनी स्वास्थ्य नीति का गंभीरता से मूल्यांकन करे।
कितने पद स्वीकृत हैं? कितने डॉक्टर कार्यरत हैं? कितने पद खाली हैं? पहाड़ में डॉक्टर कितने दिन सेवा देते हैं? कितने विशेषज्ञ चिकित्सक दुर्गम क्षेत्रों में उपलब्ध हैं? ट्रांसफर के बाद चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस पर निगरानी कैसी है? कितने अस्पताल वास्तव में 24 घंटे चिकित्सकीय सेवा दे रहे हैं?
इन सवालों के जवाब जनता के सामने आने चाहिए।
उत्तराखंड को ऐसा स्वास्थ्य मॉडल चाहिए जहां मरीज को बीमारी के बाद यह सोचकर घर से न निकलना पड़े कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर मिलेगा या फार्मासिस्ट।
26 वर्ष बाद उत्तराखंड को डॉक्टर विहीन अस्पतालों का समाधान नहीं, डॉक्टरों से भरपूर अस्पताल चाहिए।
सरकार फार्मासिस्टों को सीमित दवा लिखने का अधिकार देने पर विचार करे, मगर इसे डॉक्टरों की कमी का विकल्प बनाने के बजाय तत्काल सहायक व्यवस्था के रूप में देखे। स्थायी समाधान डॉक्टरों की भर्ती, विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती, पारदर्शी ट्रांसफर नीति और पहाड़ में सेवा के लिए प्रभावी प्रोत्साहन व्यवस्था में है।
क्योंकि सवाल सिर्फ दवा लिखने का अधिकार देने का नहीं है।
सवाल यह है कि उत्तराखंड के मरीज को इलाज का अधिकार कब पूरी तरह मिलेगा?


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