काशीपुर। ऊधम सिंह नगर के काशीपुर स्थित ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के गोविषाण टीले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की चल रही खोदाई ने तराई के दबे इतिहास को लेकर एक बार फिर जिज्ञासा बढ़ा दी है। खोदाई के दौरान ईंटों से निर्मित गोलाकार संरचना सामने आई है, जो प्रारंभिक तौर पर कुएं जैसी दिखाई देती है। इसकी गहराई करीब 10 से 11 फीट और व्यास लगभग पांच से सात फीट बताया जा रहा है। एएसआइ के अधिकारियों के प्रारंभिक अवलोकन में संरचना के गुप्त काल से संबंधित होने की संभावना जताई गई है,
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हालांकि अंतिम निष्कर्ष विस्तृत खोदाई और वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही सामने आएगा।
16 जुलाई से शुरू हुई इस खोदाई का उद्देश्य केवल किसी एक संरचना को खोज निकालना नहीं, बल्कि गोविषाण टीले के नीचे दबे पुरातात्विक अवशेषों, प्राचीन स्मारकों के सांस्कृतिक अनुक्रम और क्षेत्र की संरचनात्मक विरासत को समझना है। मानसून के कारण फिलहाल खोदाई रोक दी गई है। संरचना को जलभराव और मिट्टी धंसने से बचाने के लिए पन्नी से ढककर मिट्टी डाल दी गई है। अक्टूबर में काम दोबारा शुरू होने के बाद इसके आसपास की परतों को सावधानी से हटाकर आगे अध्ययन किया जाएगा।
ईंटों की संरचना ने बढ़ाई उत्सुकता
एएसआइ देहरादून के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. एमसी जोशी के अनुसार, अभी तक ऐसा कोई विशिष्ट शिलापट या कलाकृति नहीं मिली है, जिससे संरचना को निश्चित रूप से किसी एक काल से जोड़ा जा सके। निर्माण शैली, ईंटों का स्वरूप, इस्तेमाल की गई सामग्री, मिट्टी की विभिन्न परतें और आगे मिलने वाली पुरावशेष सामग्री ही इसके वास्तविक काल निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
यानी फिलहाल यह संरचना इतिहास के एक खुले पन्ने की तरह है। खोदाई दोबारा शुरू होने के बाद इसके भीतर या आसपास से मिलने वाली सामग्री यह तय करने में मदद कर सकती है कि इसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जाता था और यह किस कालखंड से संबंधित है।
90 एकड़ में फैला है पुरातात्विक क्षेत्र
गोविषाण टीले को स्थानीय स्तर पर द्रोण का किला भी कहा जाता है। करीब 90 एकड़ में फैले इस संरक्षित क्षेत्र में पहले हुई पुरातात्विक खोदाइयों में किलेनुमा दीवारों, प्राचीन संरचनाओं, तांबे के सिक्कों, मूर्तियों और मिट्टी के बर्तनों सहित अनेक अवशेष मिलने की जानकारी सामने आती रही है।
1862-63 में तत्कालीन पुरातत्व सर्वेक्षक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस क्षेत्र का दौरा किया था। बाद में एएसआइ की खोदाई में भी प्राचीन संरचनाओं के अवशेष सामने आए। यही वजह है कि वर्तमान उत्खनन को केवल स्थानीय स्तर की खोदाई न मानकर तराई के प्राचीन इतिहास की कड़ियों को जोड़ने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
जब तराई की मिट्टी से निकलती थीं पुरानी धरोहरें
गोविषाण की वर्तमान खोदाई ने तराई क्षेत्र में प्रचलित उन पुरानी कहानियों को भी फिर चर्चा में ला दिया है, जिनमें बंजर भूमि को आबाद करने और खेत तैयार करने के दौरान लोगों को जमीन के भीतर से पुराने सिक्के, धातु की वस्तुएं और अन्य पुरावशेष मिलने की बातें कही जाती रही हैं।
स्थानीय लोगों की स्मृतियों और चर्चाओं में 1960 से 1980 के दशक के बीच तराई के अलग-अलग हिस्सों में जमीन की खुदाई के दौरान पुराने सोने-चांदी के सिक्के अथवा धातु की पुरानी वस्तुएं मिलने के किस्से सुनने को मिलते हैं। पंतनगर और आसपास के इलाकों को लेकर भी ऐसी चर्चाएं रही हैं। कुछ मामलों में पुरानी वस्तुएं लोगों के बीच बंट जाने और कुछ सामग्री सरकारी तंत्र तक पहुंचने की बातें भी कही जाती हैं।
हालांकि इन स्थानीय दावों में से प्रत्येक घटना का प्रमाणित पुरातात्विक रिकॉर्ड उपलब्ध होना जरूरी है। इसलिए इन्हें फिलहाल लोकस्मृति और स्थानीय कथाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।
गड़े खजाने की कहानियां भी जुड़ी हैं तराई से
तराई की पुरानी कहानियों में गड़े धन और छिपाए गए खजाने का जिक्र भी मिलता है। लोककथाओं में कहा जाता है कि युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता अथवा लूट के भय से राजा-महाराजा और संपन्न परिवार अपने धन को जमीन में सुरक्षित रखने के लिए दबा देते थे। समय बीतने के साथ स्थान की पहचान समाप्त हो जाती और वह धन मिट्टी की परतों के नीचे दबा रह जाता।
इसी तरह तराई और कुमाऊं की लोककथाओं में सुल्ताना डाकू से जुड़ी अनेक कहानियां भी सुनने को मिलती हैं। उसके ठिकानों, छिपे धन और जंगलों में दबे खजाने को लेकर तरह-तरह के किस्से प्रचलित हैं। लेकिन इन कथाओं और वास्तविक पुरातात्विक प्रमाणों के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी स्थान से सिक्का या पुरानी वस्तु मिलना अपने आप में किसी राजा, डाकू या खजाने की कहानी को प्रमाणित नहीं करता।
फिर भी ये लोककथाएं महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे बताती हैं कि तराई की जमीन के नीचे छिपे अतीत को लेकर स्थानीय समाज की स्मृति कितनी गहरी रही है।
क्या गोविषाण खोलेगा कोई नया रहस्य?
गोविषाण टीले की वर्तमान खोदाई का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यहां मिलने वाली प्रत्येक वस्तु इतिहास की किसी भूली हुई कड़ी को जोड़ सकती है। एक साधारण दिखाई देने वाली ईंटों की संरचना भी अपने निर्माण काल, उपयोग और आसपास की अन्य संरचनाओं से संबंध के आधार पर महत्वपूर्ण पुरातात्विक प्रमाण बन सकती है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सामने आई संरचना वास्तव में गुप्त कालीन कुआं है या किसी अन्य काल की संरचना। वैज्ञानिक परीक्षण, मिट्टी की परतों का अध्ययन, निर्माण तकनीक और आगे मिलने वाली सामग्री ही इसका उत्तर देगी।
तराई की मिट्टी में दबी पुरानी कहानियां और गोविषाण की वैज्ञानिक खोदाई—दोनों इस समय आमने-सामने हैं। एक ओर लोकस्मृति में राजा-महाराजाओं के छिपाए धन और पुराने सिक्कों की कथाएं हैं, तो दूसरी ओर पुरातत्वविद हर परत को प्रमाण के रूप में पढ़ रहे हैं। अब अक्टूबर में दोबारा शुरू होने वाली खोदाई पर नजर रहेगी कि मिट्टी की अगली परत से इतिहास निकलता है, कोई नई संरचना सामने आती है या फिर तराई की किसी पुरानी कथा को नया सुराग मिलता है।
