न्याय की दहलीज से अस्पताल की चौखट तक सवाल: अधिवक्ता को धमकी, हाईकोर्ट में अहम मामले और रुद्रपुर का स्वास्थ्य तंत्र!

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न्याय की दहलीज से अस्पताल की चौखट तक सवाल: अधिवक्ता को धमकी, हाईकोर्ट में अहम मामले और रुद्रपुर का स्वास्थ्य तंत्र
न्याय की दहलीज से अस्पताल की चौखट तक सवाल: अधिवक्ता को धमकी, हाईकोर्ट में अहम मामले और रुद्रपुर का स्वास्थ्य तंत्र
नैनीताल/रुद्रपुर। उत्तराखंड में मंगलवार का दिन न्याय व्यवस्था और स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े कई गंभीर सवाल सामने लेकर आया। एक ओर अंकिता भंडारी हत्याकांड और कोटद्वार के मोहम्मद दीपक प्रकरण में हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अधिवक्ता नवनीश नेगी को कथित रूप से बहुभाषीय धमकी भरा पत्र मिलने से अधिवक्ताओं में रोष दिखाई दिया, वहीं दूसरी ओर हाईकोर्ट में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी से जुड़े आय से अधिक संपत्ति मामले में सुरक्षित फैसला दूसरी पीठ को भेजने की प्रक्रिया सामने आई। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़ी जनहित याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के आधार पर निस्तारित हुई।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


इन घटनाओं के बीच प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था भी चर्चा में है। देहरादून में एच1एन1 संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों और अस्पतालों की क्षमता पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं रुद्रपुर स्थित जवाहरलाल नेहरू अस्पताल एवं मेडिकल कॉलेज की दैनिक व्यवस्थाओं को लेकर आम लोगों की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। सवाल केवल अस्पताल की इमारत या मशीनों का नहीं, बल्कि यह है कि गंभीर बीमारी की स्थिति में मरीज को समय पर चिकित्सक, जांच, दवा, बेड और आवश्यक उपचार मिल पा रहा है या नहीं।
अधिवक्ता को धमकी से हाईकोर्ट में रोष
अंकिता भंडारी हत्याकांड और कोटद्वार के मोहम्मद दीपक प्रकरण की हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अधिवक्ता नवनीश नेगी को कथित रूप से धमकी भरा पत्र मिलने के बाद अधिवक्ताओं ने इसे गंभीर मामला बताया है। बताया गया कि पत्र में पहले सड़क हादसा कराने और इसके बाद हमला करने की धमकी का उल्लेख था।
अधिवक्ता की ओर से भवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत के साथ कथित धमकी भरा पत्र और लिफाफा भी पुलिस को सौंपे जाने की बात सामने आई है। अब इस मामले में पुलिस जांच से यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि पत्र किसने भेजा, उसका उद्देश्य क्या था और धमकी की वास्तविकता कितनी गंभीर है।
मामले को लेकर मंगलवार को हाईकोर्ट बार सभागार में बैठक हुई। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीसीएस रावत, महासचिव सौरभ अधिकारी, पूर्व सांसद डॉ. महेंद्र सिंह पाल, भुवनेश जोशी, एमसी पंत और कमलेश तिवारी सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ता मौजूद रहे।
बैठक में घटना की निंदा करते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि न्यायालय में किसी मामले की पैरवी करने वाले अधिवक्ता को भयमुक्त वातावरण मिलना आवश्यक है। इसी क्रम में उत्तराखंड में एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की मांग भी उठाई गई।
मंत्री गणेश जोशी से जुड़े मामले में फैसला दूसरी पीठ को
उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी से जुड़े आय से अधिक संपत्ति के मामले में हाईकोर्ट की कार्यवाही भी मंगलवार को महत्वपूर्ण रही।
बताया गया कि न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था। अब अदालत ने फैसला जारी करने के बजाय मामले को दूसरी पीठ के समक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।
अदालत के आदेश के अनुसार 8 सितंबर 2026 को मामले में बहस पूरी होने के बाद निर्णय सुरक्षित रखा गया था। आदेश में अपरिहार्य परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि पूर्व पीठ द्वारा निर्णय दिया जाना उचित नहीं होगा। इसके बाद रजिस्ट्री को आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को नई पीठ नामित करने के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए।
यह मामला देहरादून निवासी विकेश नेगी की याचिका से जुड़ा है। इससे पहले विशेष न्यायाधीश विजिलेंस/अपर जिला जज देहरादून की अदालत ने वर्ष 2025 में याचिका खारिज की थी, जिसके बाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
इस प्रकरण में अंतिम निर्णय क्या होगा, यह नई पीठ द्वारा सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा। इसलिए फिलहाल किसी पक्ष के पक्ष या विपक्ष में परिणाम मान लेना उचित नहीं होगा।
एसआईआर मामले में हाईकोर्ट ने याचिका निस्तारित की
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मामले में भी हाईकोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपनाई।
हल्द्वानी निवासी शादाब आलम की जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि एक व्यक्ति द्वारा फॉर्म-7 के माध्यम से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आपत्तियां दाखिल की गईं। याचिका में लगभग छह हजार मतदाताओं के नाम हटाने की आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि एसआईआर से संबंधित विषय सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इसके बाद याची ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पुनः हाईकोर्ट आने की स्वतंत्रता मांगते हुए याचिका वापस ले ली। अदालत ने इसे स्वीकार करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।
देहरादून में एच1एन1 के बढ़ते मामले
इसी बीच स्वास्थ्य क्षेत्र से सामने आए आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। मंगलवार को देहरादून में 92 सैंपलों की जांच की गई, जिनमें 22 मरीजों में इन्फ्लुएंजा एच1एन1 संक्रमण की पुष्टि बताई गई है। इनमें 19 मरीज देहरादून और तीन अन्य जिलों के हैं।
अब तक जिले में 1386 सैंपल लिए जाने और 506 मरीजों में संक्रमण की पुष्टि की जानकारी दी गई है। इनमें 337 मरीज देहरादून तथा 169 अन्य जिलों के बताए गए हैं। 430 मरीज स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि 74 सक्रिय मामले बताए गए हैं। दो मरीजों की मृत्यु के बाद ऑडिट में एच1एन1 संक्रमण की पुष्टि होने की बात भी सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार संक्रमितों में 267 पुरुष और 239 महिलाएं हैं। एक वर्ष से लेकर 100 वर्ष तक की आयु के मरीज दर्ज किए गए हैं।
इसके अलावा डेंगू के पांच नए मामले सामने आने के बाद कुल संख्या 171 बताई गई है। चिकनगुनिया के छह नए मामलों के साथ कुल संख्या 93 हो गई है।
रुद्रपुर का जवाहरलाल नेहरू अस्पताल: सवाल सुविधाओं से आगे का है
अब नजर रुद्रपुर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल एवं मेडिकल कॉलेज पर भी है। यह क्षेत्र के बड़े सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में शामिल है और आसपास के ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मरीज सरकारी इलाज की उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं।
ऐसे समय में जब प्रदेश में वायरल संक्रमण, डेंगू, चिकनगुनिया और एच1एन1 जैसे मामले सामने आ रहे हैं, सरकारी अस्पतालों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
रुद्रपुर में आम लोगों की अपेक्षा साफ है—अस्पताल में चिकित्सकों की उपलब्धता, जरूरी जांच, दवाएं, पर्याप्त बेड, इमरजेंसी सेवाएं, विशेषज्ञ चिकित्सक और गंभीर मरीजों के लिए तत्काल उपचार की व्यवस्था प्रभावी हो।
‘अस्पताल भगवान भरोसे’ जैसी धारणा यदि मरीजों और उनके परिजनों के बीच बन रही है तो यह केवल अस्पताल प्रशासन का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए गंभीर संकेत है। हालांकि किसी अस्पताल की वास्तविक स्थिति का आकलन केवल धारणा के आधार पर नहीं, बल्कि डॉक्टरों की उपलब्धता, मरीजों की संख्या, बेड ऑक्यूपेंसी, दवा स्टॉक, जांच सुविधाओं, रेफरल व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं के प्रमाणित आंकड़ों से किया जाना चाहिए।
न्याय और स्वास्थ्य—दोनों जगह भरोसा जरूरी
उत्तराखंड के मौजूदा घटनाक्रम को एक साथ देखें तो दो अलग-अलग क्षेत्रों में एक समान सवाल दिखाई देता है—आम व्यक्ति का भरोसा।
न्यायालय में पैरवी करने वाला अधिवक्ता यदि धमकी की शिकायत करता है तो जांच एजेंसियों से निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है। वहीं अस्पताल पहुंचने वाला मरीज चाहता है कि उसे बीमारी के समय व्यवस्था का सहारा मिले, न कि वह एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटकता रहे।
न्याय व्यवस्था में अधिवक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में मरीज की सुरक्षा—दोनों लोकतांत्रिक और जनकल्याणकारी व्यवस्था की बुनियादी जरूरत हैं।
उत्तराखंड सरकार के सामने इसलिए चुनौती केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि व्यवस्था को जमीन पर मजबूत करने की है। अदालतों में भयमुक्त वातावरण, पुलिस जांच में निष्पक्षता और सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त संसाधन—ये तीनों सीधे जनता के विश्वास से जुड़े विषय हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स का सवाल सीधा है—जब न्याय मांगने वाला अदालत तक पहुंचता है और इलाज मांगने वाला अस्पताल तक, तो क्या दोनों जगह उसे भयमुक्त, पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था मिल रही है?
इसी सवाल का जवाब आने वाले दिनों में उत्तराखंड की न्याय और स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर तय करेगा।


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