सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी अपनी आंतरिक टीम के साथ मिलकर कांग्रेस को लगभग 60 से 70 सीटें देने के विकल्प पर गंभीरता से मंथन कर रही है। हालांकि, कांग्रेस पार्टी की दावेदारी इससे कहीं ज्यादा बड़ी है, जो साल 2017 के गठबंधन के आंकड़ों पर टिकी है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
चुनाव से पहले सीटों का गणित और जमीनी आकलन
साल 2027 का चुनाव भले ही दूर नजर आ रहा हो, लेकिन सपा और कांग्रेस ने अभी से सीटों के सियासी समीकरणों पर काम करना शुरू कर दिया है। सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी की ओर से प्रदेश के हर जिले की हर एक विधानसभा सीट पर बेहद बारीकी से जानकारी जुटाई जा रही है।
इस प्रक्रिया में यह परखा जा रहा है कि किस सीट पर किस जाति की कितनी प्रभावी मौजूदगी है, किस क्षेत्र में कौन सा दल मजबूत स्थिति में है, पिछले चुनावों में किसका प्रदर्शन कैसा रहा और किस संभावित उम्मीदवार की जमीन पर मजबूत पकड़ है। सबसे अहम बात यह है कि सपा यह देख रही है कि कौन सी सीट गठबंधन के लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित और जीतने योग्य है। इसी आधार पर सपा कांग्रेस के लिए सीटों का एक प्रारंभिक खाका तैयार कर रही है।
सपा का स्पष्ट संदेश: संख्या नहीं, जीत है सबसे महत्वपूर्ण
अखिलेश यादव पहले भी गठबंधन की राजनीति को लेकर यह संकेत दे चुके हैं कि सिर्फ सीटों की संख्या मायने नहीं रखती। असली पैमाना यह है कि जिस सीट पर जिस दल की जीत की सबसे ज्यादा संभावना हो, मैदान में उसी दल के उम्मीदवार को उतारा जाए।
यही सोच 2027 के सीट बंटवारे में भी प्रमुखता से दिखाई दे सकती है। सपा का मुख्य तर्क यह हो सकता है कि सिर्फ इसलिए किसी सीट पर कांग्रेस का दावा नहीं माना जा सकता कि वहां पार्टी ने पहले चुनाव लड़ा था। इसके बजाय यह देखना होगा कि आज की तारीख में उस खास जमीन पर कांग्रेस का संगठन कितना सक्रिय और मजबूत है।
कांग्रेस से मांगे गए संभावित उम्मीदवारों के नाम
सीटों को लेकर चल रही बातचीत के बीच सपा ने कांग्रेस से उसके संभावित उम्मीदवारों की पूरी सूची और विवरण भी मांग लिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि कांग्रेस को केवल यह नहीं बताना होगा कि उसे कौन-कौन सी सीटें चाहिए, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि उन सीटों पर चुनाव जीतने वाला मजबूत चेहरा कौन सा है।
कांग्रेस को यह भी स्पष्ट करना होगा कि उसके पास कहां मजबूत स्थानीय संगठन है, पुराने कार्यकर्ता कहां सक्रिय हैं, पारंपरिक मतदाता आधार कहां मौजूद है और वह किन सीटों पर भाजपा या अन्य दलों को सीधी टक्कर देने की स्थिति में है। इन सभी जमीनी पहलुओं पर ही अंतिम मुहर लगेगी।
किन-किन जिलों पर टिकी हैं दोनों दलों की नजरें?
सूत्रों के मुताबिक, जिन जिलों की कई सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी पर विचार चल रहा है, उनमें रायबरेली, लखनऊ, गोरखपुर, महाराजगंज, आगरा, वाराणसी, बाराबंकी, लखीमपुर, अमेठी, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, गोंडा, जौनपुर, मेरठ, सहारनपुर, प्रतापगढ़, हाथरस, कानपुर और प्रयागराज जैसे प्रमुख जिले शामिल हैं। इनमें कुछ जिले ऐसे हैं जहां कांग्रेस का पुराना राजनीतिक इतिहास रहा है, कुछ शहरी प्रभाव वाले हैं और कुछ पर कांग्रेस अपने स्थानीय नेताओं के बूते दावा ठोक रही है।
अमेठी-रायबरेली और शहरी सीटों पर पेचीदा पेंच
सीट बंटवारे की इस प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प और पेचीदा मुकाबला उन सीटों पर हो सकता है जिन्हें कांग्रेस अपनी पारंपरिक राजनीतिक पहचान मानती है। अमेठी और रायबरेली इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कांग्रेस के लिए ये केवल दो लोकसभा क्षेत्र या विधानसभा सीटें नहीं हैं, बल्कि दशकों पुराना सियासी वजूद हैं।
हालाँकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इन दोनों जिलों की एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, जबकि सपा ने रायबरेली की 4 और अमेठी की 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अब चर्चा है कि सपा इन दोनों जिलों में से केवल एक-एक सीट ही कांग्रेस को देने पर विचार कर रही है।
इसके साथ ही, सपा कांग्रेस को बड़ी संख्या में शहरी और अर्धशहरी सीटें देने के विकल्प पर भी विचार कर रही है। लखनऊ, कानपुर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, आगरा, प्रयागराज और वाराणसी जैसे शहरों में कांग्रेस की संभावित दावेदारी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है, क्योंकि सपा का मानना है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस का शहरी काडर गठबंधन को फायदा पहुंचा सकता है।
2017 के आंकड़े और कांग्रेस की बड़ी दावेदारी
अब बात करते हैं कांग्रेस की उस बड़ी दावेदारी की जो पूरे विवाद की जड़ है। कांग्रेस पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव का हवाला दे रही है, जब सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था और सीट समझौते के तहत कांग्रेस को 105 सीटें मिली थीं। हालांकि, चुनावी परिणामों में कांग्रेस केवल 7 सीटों पर ही सिमट गई थी।
यही पुराना आंकड़ा अब समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस की मौजूदा बड़ी मांग पर सवाल उठाने का मुख्य आधार बन सकता है। सपा का स्पष्ट तर्क यह हो सकता है कि 2017 का राजनीतिक वातावरण और चुनावी समीकरण पूरी तरह अलग थे, और आज के वक्त में गठबंधन की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। ऐसे में देखना यह होगा कि क्या कांग्रेस 60-70 सीटों के इस नए फॉर्मूले पर सहमत होती है या नहीं।
