देहरादून के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से जुड़े फर्जी प्रमाणपत्र प्रकरण में अब कार्रवाई का दायरा बढ़ रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दो लेखपाल निलंबित किए गए हैं और दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों से भी काम लिया जाना बंद कर दिया गया है। साथ ही पुलिस जांच में कचहरी से जुड़े एक निजी बिचौलिए की भूमिका की भी पड़ताल हो रही है।फर्जी प्रमाणपत्रों का खेल: मेहनती युवाओं के हक पर डाका, पूरे उत्तराखंड में हो सत्यापन अभियान
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस दाखिलों के लिए जारी किए गए कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले ने सरकारी प्रमाणपत्र व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला प्रशासन ने जांच समिति की संस्तुति के बाद तहसील सदर के दो लेखपालों जगदीश राठौर और डिंपल को निलंबित कर दिया है। प्रशासनिक जांच में प्रमाणपत्र आवेदनों के सत्यापन में प्रथम दृष्टया लापरवाही सामने आने की बात कही गई है।
मामला उस समय सामने आया जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित कोटे से एमबीबीएस में दाखिला लेने वाले चार अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच की गई। जांच में जिस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धर्मवीर वर्मा पुत्र खजान सिंह के नाम का परिचय पत्र लगाया गया था, उसका नाम जिला प्रशासन की संबंधित पंजिका में नहीं मिला। आवेदन में दर्ज पतों पर भी संबंधित अभ्यर्थियों या उनके परिवारों की मौजूदगी की पुष्टि नहीं हुई। इसके बाद चारों प्रमाणपत्र निरस्त किए गए और एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय ने चारों एमबीबीएस दाखिले रद्द कर दिए।
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ गई क्योंकि जांच में सामने आया कि अलग-अलग परिवारों के चार आवेदनों में एक ही व्यक्ति के नाम का स्वतंत्रता सेनानी परिचय पत्र इस्तेमाल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार आवेदन प्रक्रिया में फोटो, पेंशन पट्टा, पहचान पत्र, निवास प्रमाणपत्र और स्वतंत्रता सेनानी कार्ड जैसे दस्तावेज आवश्यक थे।
सवाल सिर्फ दो लेखपालों तक सीमित क्यों?
दो लेखपालों का निलंबन प्रशासनिक जवाबदेही की दिशा में एक कार्रवाई है, लेकिन जांच का दायरा केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन की संयुक्त जांच समिति ने दो लेखपालों के साथ दो डाटा एंट्री ऑपरेटरों के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की थी। दोनों डाटा एंट्री ऑपरेटर एसडीएम सदर के डिजिटल सिग्नेचर से जुड़े कार्य देख रहे थे और फिलहाल उनसे काम नहीं लिया जा रहा है।
वहीं पुलिस पूछताछ में कचहरी से जुड़े एक निजी व्यक्ति और कथित बिचौलिए का नाम सामने आने की रिपोर्ट है। पुलिस इस पहलू की भी जांच कर रही है कि कहीं प्रमाणपत्र हासिल कराने के लिए किसी संगठित नेटवर्क या सेटिंग का इस्तेमाल तो नहीं हुआ। यह आरोप अभी जांच का विषय है, इसलिए अंतिम जिम्मेदारी जांच पूरी होने के बाद ही तय होगी।
मेहनत करने वाले युवाओं के साथ सबसे बड़ा अन्याय
सरकारी नौकरी, मेडिकल प्रवेश और अन्य अवसरों में प्रमाणपत्र केवल कागज का टुकड़ा नहीं होते। वे किसी अभ्यर्थी की पात्रता और उसके अधिकार का आधार बनते हैं। यदि कोई अपात्र व्यक्ति फर्जी प्रमाणपत्र के सहारे आरक्षण या किसी विशेष कोटे का लाभ हासिल करता है, तो उसका सीधा असर उस युवा पर पड़ सकता है जो वर्षों की मेहनत के बाद वास्तविक रूप से पात्रता हासिल करता है।
इसीलिए देहरादून का यह मामला केवल चार एमबीबीएस दाखिलों तक सीमित मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा। राज्य में जारी किए गए स्थायी निवास, जाति, आय, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस तथा अन्य लाभकारी प्रमाणपत्रों की जोखिम-आधारित जांच की व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता है। फर्जी प्रमाणपत्र के जरिए सरकारी नौकरी, शिक्षा या अन्य लाभ लेने के मामलों की पहचान होने पर लाभार्थी और फर्जीवाड़े में शामिल किसी भी सहयोगी की भूमिका कानून के अनुसार तय होनी चाहिए।
पूरे उत्तराखंड में अभियान की जरूरत
देहरादून की घटना के बाद सरकार के सामने बड़ा सवाल यह है कि क्या इसी तरह की जांच हर जिले में की जाएगी?
एक व्यापक डिजिटल ऑडिट में पुराने और नए प्रमाणपत्रों का मूल राजस्व रिकॉर्ड से मिलान, संबंधित परिवारों का सत्यापन, प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया की जांच और संदिग्ध मामलों की स्वतंत्र जांच की जा सकती है। इससे वास्तविक पात्र युवाओं का अधिकार सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी और सीमित सरकारी अवसरों के बीच यदि किसी फर्जी प्रमाणपत्र के कारण एक भी पात्र युवा अवसर से वंचित होता है तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।
सरकार से उठते पांच सवाल
पहला— पिछले वर्षों में जारी ऐसे प्रमाणपत्रों का जिलेवार ऑडिट कब होगा?
दूसरा— जिन प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी, मेडिकल प्रवेश या सरकारी लाभ लिया जा चुका है, उनका पुनः सत्यापन होगा या नहीं?
तीसरा— केवल प्रमाणपत्र सत्यापित करने वाले कर्मचारी ही जिम्मेदार होंगे या पूरी प्रक्रिया में शामिल प्रत्येक स्तर की भूमिका जांची जाएगी?
चौथा— कथित बिचौलियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका की जांच किस स्तर तक पहुंचेगी?
पांचवां— यदि जांच में किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी की जानबूझकर मिलीभगत प्रमाणित होती है तो उसके खिलाफ निलंबन से आगे बर्खास्तगी और कानूनी कार्रवाई की जाएगी या नहीं?
सरकार की असली परीक्षा
यह मामला किसी एक कर्मचारी को निलंबित करने से समाप्त नहीं होना चाहिए। असली परीक्षा यह है कि जांच फर्जी प्रमाणपत्र बनाने वाले, उपलब्ध कराने वाले, सत्यापन में लापरवाही करने वाले और यदि कोई मिलीभगत हुई है तो उसमें शामिल हर व्यक्ति तक पहुंचती है या नहीं।
यदि किसी सरकारी कर्मचारी की जानबूझकर मिलीभगत जांच में प्रमाणित होती है, तो उसके खिलाफ सेवा नियमों के तहत कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन केवल आरोप के आधार पर किसी कर्मचारी को दोषी मानना भी उचित नहीं होगा; अंतिम जिम्मेदारी जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही तय होनी चाहिए।
उत्तराखंड सरकार को देहरादून के इस प्रकरण को एक चेतावनी के रूप में लेते हुए पूरे राज्य में प्रमाणपत्र सत्यापन की मजबूत व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, ताकि किसी फर्जी दस्तावेज के कारण मेहनती और वास्तविक पात्र युवा का हक न मारा जाए।
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नोट: उपलब्ध रिपोर्टों में अभी दो लेखपालों पर सत्यापन में लापरवाही की कार्रवाई दर्ज है; उन्हें फर्जी प्रमाणपत्र बनाने का अंतिम दोषी घोषित नहीं किया गया है। इसी तरह बिचौलिए और अन्य लोगों की भूमिका अभी जांच का विषय है।
