उत्तराखंड देहरादून। उत्तराखण्ड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस और स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के दौरान प्रस्तुत किए गए स्थायी निवास, जाति तथा विभिन्न आरक्षण श्रेणियों से संबंधित प्रमाण-पत्रों की राज्य गठन के बाद से अब तक व्यापक जांच कराने की मांग उठी है। इस संबंध में मुख्यमंत्री को भेजे गए एक विस्तृत पत्र में वर्ष 2004 से वर्ष 2025 तक राजकीय मेडिकल कॉलेजों में हुए प्रवेशों के अभिलेखों का उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष सत्यापन कराने का अनुरोध किया गया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
पत्र में कहा गया है कि उत्तराखण्ड में राजकीय मेडिकल कॉलेजों में सीमित सीटों पर राज्य के विद्यार्थियों को प्रवेश का अवसर मिलता है। ऐसे में यदि किसी अपात्र अभ्यर्थी ने गलत तथ्यों, संदिग्ध अथवा नियमविरुद्ध प्रमाण-पत्रों के आधार पर राज्य कोटे या आरक्षण का लाभ प्राप्त किया है, तो इसकी जांच आवश्यक है। पत्र में हालांकि किसी विशेष व्यक्ति या अभ्यर्थी पर सीधे आरोप नहीं लगाया गया है, बल्कि समय-समय पर सामने आने वाली शिकायतों और आशंकाओं के आधार पर व्यापक अभिलेखीय जांच की मांग की गई है।
2004 से शुरू होने वाले रिकॉर्ड की जांच का प्रस्ताव
मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में उत्तराखण्ड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस प्रवेश के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राजकीय मेडिकल कॉलेज एवं डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय, हल्द्वानी में एमबीबीएस कक्षाएं वर्ष 2004 से संचालित हैं। इसके बाद वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्विज्ञान एवं शोध संस्थान श्रीनगर में वर्ष 2008, राजकीय दून मेडिकल कॉलेज देहरादून में वर्ष 2016, सोबन सिंह जीना राजकीय आयुर्विज्ञान एवं शोध संस्थान अल्मोड़ा में वर्ष 2021 तथा राजकीय मेडिकल कॉलेज हरिद्वार में वर्ष 2023 से एमबीबीएस कक्षाएं संचालित होने का उल्लेख किया गया है।
पत्र में मांग की गई है कि केवल वर्तमान प्रवेश प्रक्रिया की जांच तक मामला सीमित न रखा जाए, बल्कि पिछले वर्षों में हुए प्रवेशों का भी रिकॉर्ड देखा जाए। विशेष रूप से वर्ष 2004 से 2025 तक के प्रवेश रिकॉर्ड का दस्तावेजी परीक्षण कराने का आग्रह किया गया है।
बाहरी राज्यों से प्रमाण-पत्र हासिल करने की शिकायतों की जांच की मांग
पत्र में कहा गया है कि समय-समय पर ऐसी शिकायतें और आशंकाएं सामने आती रही हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान सहित अन्य राज्यों से आने वाले कुछ अभ्यर्थियों ने उत्तराखण्ड में स्थायी निवास, जाति या अन्य आरक्षण संबंधी प्रमाण-पत्र हासिल कर राज्य कोटे अथवा आरक्षण का लाभ प्राप्त किया हो सकता है।
हालांकि पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इन आशंकाओं की वास्तविकता का निर्धारण केवल आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच के बाद ही किया जा सकता है। इसी कारण संबंधित जिलों, तहसीलों और सक्षम अधिकारियों के मूल अभिलेखों से प्रमाण-पत्रों का सत्यापन कराने की मांग की गई है।
स्थायी निवास प्रमाण-पत्रों का राजस्व रिकॉर्ड से मिलान
जांच के प्रस्ताव में सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में स्थायी निवास प्रमाण-पत्रों का सत्यापन शामिल है। मांग की गई है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के समय प्रस्तुत किए गए स्थायी निवास या डोमिसाइल प्रमाण-पत्रों का संबंधित जिला प्रशासन, तहसील और राजस्व अभिलेखों से मिलान किया जाए।
यह भी जांच की मांग की गई है कि प्रमाण-पत्र जारी करते समय संबंधित अभ्यर्थी द्वारा दिए गए आवेदन, संलग्न दस्तावेज, स्थानीय जांच रिपोर्ट और सक्षम अधिकारी की संस्तुति क्या थी तथा प्रमाण-पत्र निर्धारित नियमों के अनुरूप जारी किया गया था या नहीं।
यदि प्रमाण-पत्र किसी डिजिटल या ऑनलाइन व्यवस्था के माध्यम से जारी हुआ है तो उस रिकॉर्ड का भी सत्यापन करने का प्रस्ताव रखा गया है।
जाति प्रमाण-पत्रों की भी हो जांच
पत्र में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य लागू आरक्षण श्रेणियों के प्रमाण-पत्रों की जांच कराने की मांग की गई है।
इसके लिए संबंधित सक्षम प्राधिकारी के मूल रिकॉर्ड से प्रमाण-पत्र का मिलान कराने का सुझाव दिया गया है। जांच में यह देखा जाए कि संबंधित अभ्यर्थी वास्तव में उस आरक्षण श्रेणी की पात्रता रखता था या नहीं और प्रमाण-पत्र निर्धारित प्रक्रिया के तहत जारी किया गया था या नहीं।
पत्र में यह भी कहा गया है कि यदि किसी प्रमाण-पत्र की वैधता संदिग्ध पाई जाती है तो संबंधित जिले या तहसील के सक्षम अधिकारी से मूल रिकॉर्ड के आधार पर दोबारा सत्यापन कराया जाना चाहिए।
क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर आरक्षण भी जांच के दायरे में
प्रस्तावित जांच को केवल स्थायी निवास और जाति प्रमाण-पत्र तक सीमित नहीं रखा गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित, सैनिक एवं पूर्व सैनिक आश्रित, दिव्यांगजन, महिला तथा अन्य लागू क्षैतिज आरक्षण श्रेणियों के प्रमाण-पत्रों की भी जांच कराने की मांग की गई है।
इसी प्रकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा अन्य लागू ऊर्ध्वाधर आरक्षण श्रेणियों के तहत प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की पात्रता और प्रमाण-पत्रों का भी सत्यापन कराने की मांग की गई है।
एमबीबीएस से एमडी/एमएस तक रिकॉर्ड का मिलान क्यों?
पत्र में जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू एमबीबीएस से लेकर एमडी/एमएस तक के रिकॉर्ड के मिलान को बनाया गया है।
मांग की गई है कि जिन अभ्यर्थियों ने एमबीबीएस में राज्य कोटे या किसी आरक्षण श्रेणी के आधार पर प्रवेश प्राप्त किया और बाद में एमडी/एमएस अथवा अन्य स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश लिया, उनके दोनों चरणों में प्रस्तुत दस्तावेजों की तुलना की जाए।
इसमें यह देखा जा सकता है कि एमबीबीएस प्रवेश के समय प्रस्तुत स्थायी निवास, जाति अथवा आरक्षण संबंधी प्रमाण-पत्र और बाद में स्नातकोत्तर प्रवेश के समय प्रस्तुत प्रमाण-पत्रों में कोई अंतर तो नहीं है।
पत्र के अनुसार यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी विद्यार्थी को एमबीबीएस स्तर पर प्राप्त पात्रता या आरक्षण का रिकॉर्ड आगे की शिक्षा में भी संदर्भित हो सकता है। इसलिए पूरे शैक्षणिक रिकॉर्ड का दस्तावेजी मिलान कराने की मांग की गई है।
मेडिकल कॉलेजों से लिए जाएं प्रवेश के मूल रिकॉर्ड
जांच के लिए सभी संबंधित राजकीय मेडिकल कॉलेजों से प्रवेश के समय जमा किए गए आवेदन-पत्र, दस्तावेज सत्यापन रिपोर्ट, मेरिट सूची, राज्य कोटा अथवा आरक्षण के तहत मिली सीट, श्रेणीवार प्रवेश रिकॉर्ड और अन्य संबंधित दस्तावेज प्राप्त करने की मांग की गई है।
पत्र में कहा गया है कि इन रिकॉर्ड का संबंधित जिला प्रशासन और प्रमाण-पत्र जारी करने वाले विभागों के अभिलेखों से मिलान कराया जाए। इससे यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के समय प्रस्तुत दस्तावेज और प्रमाण-पत्र वास्तव में संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद हैं या नहीं।
स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच समिति बनाने की मांग
इस पूरे मामले की जांच के लिए पत्र में स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति गठित करने का सुझाव दिया गया है। प्रस्तावित समिति में सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी अथवा न्यायिक विशेषज्ञ, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारी, राजस्व विभाग के वरिष्ठ अधिकारी तथा संबंधित जिलों के जिलाधिकारी अथवा उनके द्वारा नामित सक्षम अधिकारियों को शामिल करने की मांग की गई है।
पत्र में यह तर्क दिया गया है कि अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड अलग-अलग स्तरों पर उपलब्ध होते हैं। इसलिए यदि जांच एक बहु-विभागीय समिति के माध्यम से की जाती है तो मेडिकल कॉलेज के प्रवेश रिकॉर्ड, राजस्व रिकॉर्ड और प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया का आपस में मिलान किया जा सकता है।
फर्जी दस्तावेज मिले तो कार्रवाई की मांग
पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि जांच में किसी अभ्यर्थी द्वारा गलत तथ्य, कूटरचित दस्तावेज, गलत या अवैध प्रमाण-पत्र अथवा पात्रता के विपरीत आरक्षण लाभ प्राप्त किए जाने का प्रमाण मिलता है, तो उसके विरुद्ध प्रचलित कानून और प्रवेश नियमों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसी तरह यदि किसी प्रमाण-पत्र को जारी करने अथवा उसके सत्यापन की प्रक्रिया में किसी अधिकारी या कर्मचारी की जानबूझकर की गई अनियमितता या लापरवाही प्रमाणित होती है, तो संबंधित अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी भी तय करने की मांग की गई है।
भविष्य में डिजिटल सत्यापन की व्यवस्था का सुझाव
पत्र में केवल पुराने मामलों की जांच की मांग ही नहीं की गई है, बल्कि भविष्य के लिए व्यवस्था मजबूत करने का भी सुझाव दिया गया है।
इसके तहत मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से पहले स्थायी निवास, जाति और आरक्षण से जुड़े प्रमाण-पत्रों का संबंधित विभागों के डिजिटल रिकॉर्ड से अनिवार्य सत्यापन कराने की व्यवस्था विकसित करने की मांग की गई है।
प्रस्ताव के अनुसार प्रवेश प्रक्रिया में दस्तावेजों का केवल कागजी परीक्षण पर्याप्त न हो, बल्कि प्रमाण-पत्र जारी करने वाले विभाग के डिजिटल रिकॉर्ड से भी उनका सत्यापन हो। इससे भविष्य में गलत दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश लेने की संभावनाओं को रोकने में मदद मिल सकती है।
राज्य के विद्यार्थियों के अवसर और प्रवेश व्यवस्था की पारदर्शिता का सवाल
मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि उत्तराखण्ड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों की प्रत्येक सीट विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। राज्य के अनेक विद्यार्थी सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और एमबीबीएस तथा एमडी/एमएस में प्रवेश हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।
ऐसे में यदि किसी अपात्र अभ्यर्थी को गलत दस्तावेज या नियमविरुद्ध तरीके से राज्य कोटे अथवा आरक्षण का लाभ मिला हो तो उससे पात्र अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित होने की आशंका रहती है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि प्रवेश प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता की पुष्टि होने पर उसका प्रभाव केवल एक विद्यार्थी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रवेश व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
सरकार के सामने अब रिकॉर्ड-आधारित जांच की मांग
मुख्यमंत्री को भेजे गए इस पत्र में चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव, महानिदेशक/निदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं प्रशिक्षण तथा संबंधित सक्षम प्राधिकारियों को भी प्रतिलिपि भेजकर आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया गया है।
अब इस मांग का मूल केंद्र यह है कि क्या सरकार वर्ष 2004 से 2025 तक राजकीय मेडिकल कॉलेजों में हुए प्रवेशों का व्यापक रिकॉर्ड ऑडिट कराने की दिशा में कदम उठाती है और क्या स्थायी निवास, जाति तथा आरक्षण प्रमाण-पत्रों को संबंधित विभागों के मूल अभिलेखों से सत्यापित कराया जाता है।
फिलहाल पत्र में लगाए गए संदेह और आशंकाएं जांच का विषय हैं। किसी व्यक्ति अथवा अभ्यर्थी के संबंध में अनियमितता तभी प्रमाणित मानी जा सकती है, जब सक्षम जांच एजेंसी या संबंधित सरकारी प्राधिकारी मूल रिकॉर्ड के आधार पर इसकी पुष्टि करे।
राजकीय मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए दस्तावेजों का रिकॉर्ड-आधारित सत्यापन, संदिग्ध मामलों की निष्पक्ष जांच और भविष्य में डिजिटल सत्यापन की मजबूत व्यवस्था इस मांग के प्रमुख बिंदु हैं। अब निगाह सरकार की ओर है कि वह इस प्रस्ताव पर क्या निर्णय लेती है और यदि जांच होती है तो उसके निष्कर्ष क्या सामने आते हैं।
