देहरादून/नैनीताल/पिथौरागढ़। उत्तराखंड इन दिनों विकास, स्थानीय अर्थव्यवस्था, राजनीतिक विकल्प और बढ़ते पर्यटन के बीच एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां एक तरफ पहाड़ के उत्पाद देश-दुनिया के बाजार तक पहुंच रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं पहाड़ों की कैरिंग कैपेसिटी पर लगातार बढ़ता दबाव गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। ग्रामीण महिलाओं के उत्पादों को बाजार देने वाले ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ ने करीब छह करोड़ रुपये का कारोबार पार कर लिया है। दूसरी ओर राज्य में तीसरे राजनीतिक विकल्प की चर्चा तेज हो रही है। इसी बीच कैंची धाम, बद्रीनाथ, केदारनाथ, आदि कैलाश और ओम पर्वत जैसे धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर उमड़ रही भीड़ ने पहाड़ों की क्षमता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हाउस ऑफ हिमालयाज ने पार किया छह करोड़ का कारोबार
उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं, किसानों और स्थानीय उद्यमियों के उत्पादों को एक छत के नीचे बाजार उपलब्ध कराने वाला हाउस ऑफ हिमालयाज अपनी शुरुआत के बाद करीब छह करोड़ रुपये का कारोबार कर चुका है। दिसंबर 2023 में देहरादून में आयोजित उत्तराखंड ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ब्रांड का विमोचन किया था।
प्रधानमंत्री ने इसे ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ की अवधारणा को आगे बढ़ाने वाला प्रयास बताया था।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस उपलब्धि पर कारोबार से जुड़े लोगों और उत्पादकों को बधाई देते हुए कहा कि हाउस ऑफ हिमालयाज उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाने की महत्वपूर्ण पहल है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकल से ग्लोबल विजन के अनुरूप प्रदेश की मातृशक्ति, किसान और ग्रामीण उद्यमियों के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है।
वर्तमान में इस ब्रांड में 60 विशिष्ट उत्पादों सहित कुल 83 उत्पाद शामिल हैं। इनमें पहाड़ी दालें, अनाज, मिलेट्स, मसाले, शहद, तेल-घी, हर्बल और पर्सनल केयर उत्पाद, बेकरी तथा हस्तशिल्प शामिल हैं।
इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका महिला-केंद्रित आजीविका तंत्र है। 55 क्लस्टर लेवल फेडरेशन से जुड़ी करीब 5,500 प्रत्यक्ष महिला लाभार्थी इसकी आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी हैं। यानी पहाड़ में तैयार होने वाले उत्पादों को बाजार मिलने के साथ उसका लाभ ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।
विकास के साथ राजनीति में भी ‘तीसरे विकल्प’ की दस्तक
इसी बीच उत्तराखंड की राजनीति में तीसरे विकल्प की आवाज भी तेज होती दिखाई दे रही है। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय अधिकार तथा प्राकृतिक संसाधनों से प्रदेश को वास्तविक आर्थिक लाभ दिलाने के मुद्दे को लेकर एक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम से पहले न्याय के देवता गोलू देवता के दर्शन किए गए। इसके बाद बालाजी वाटिका हॉल में आयोजित संवाद में शांभवी पीठ के पीठाधीश्वर आनंद स्वरूप महाराज ने कहा कि उत्तराखंड में तीसरे राजनीतिक विकल्प की तैयारी की जा रही है।
उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों पर तीखा राजनीतिक हमला करते हुए आरोप लगाया कि दोनों दलों ने प्रदेश की जनता को निराश किया है। उनके शब्दों में, “एक पार्टी नागनाथ है तो दूसरी सांपनाथ है।”
आनंद स्वरूप महाराज ने प्रदेश में भ्रष्टाचार, प्रशासनिक व्यवस्था और जनता की परेशानियों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जनता अब राजनीतिक विकल्प चाहती है।
उन्होंने आर्थिक आधार पर गरीबों को आरक्षण देने तथा समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की बात कही। उनके अनुसार 1 नवंबर को देहरादून में विशाल जनसभा के माध्यम से तीसरे राजनीतिक विकल्प का शंखनाद किया जाएगा।
यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन तैयार हो रही है। ऐसे में तीसरे विकल्प की यह पहल कितनी जमीन तैयार करती है, यह आने वाला समय बताएगा।
कैंची धाम की भीड़ ने पहाड़ों की क्षमता पर उठाए सवाल
दूसरी तरफ धार्मिक पर्यटन में तेजी ने उत्तराखंड के सामने एक अलग चुनौती खड़ी कर दी है। कैंची धाम में लगातार बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या के कारण हाल के दिनों में लंबा ट्रैफिक जाम देखने को मिला। वीकेंड पर दिल्ली-NCR समेत देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग कैंची धाम पहुंचे।
स्थिति ऐसी बनी कि कई यात्रियों को घंटों जाम में फंसे रहना पड़ा। इसका असर अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ की ओर जाने वाले सामान्य यात्रियों पर भी पड़ा।
जाम की समस्या भले ही वीकेंड खत्म होने के बाद कम हो गई हो, लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है—क्या पहाड़ इतने बड़े पर्यटक दबाव को लंबे समय तक झेल सकते हैं?
नैनीताल की कैरिंग कैपेसिटी ने बढ़ाई चिंता
इसी सवाल को नैनीताल से जुड़ी एक रिसर्च और गंभीर बनाती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स यानी NIUA से जुड़ी रिसर्च, जिसे इस वर्ष मई में Springer Nature में प्रकाशित किया गया, नैनीताल की वास्तविक कैरिंग कैपेसिटी को लेकर महत्वपूर्ण संकेत देती है।
सैद्धांतिक रूप से नैनीताल की क्षमता प्रतिदिन करीब 8.34 लाख लोगों तक बताई गई, लेकिन जब भूस्खलन, बारिश और पहाड़ की संवेदनशीलता को शामिल किया गया तो यह क्षमता घटकर करीब 1.49 लाख प्रतिदिन रह जाती है।
वहीं पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन और पार्किंग जैसी वास्तविक बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखने पर क्षमता करीब 8,422 लोगों प्रतिदिन तक सिमट जाती है।
यही आंकड़ा पहाड़ों में बढ़ते पर्यटन को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है।
14,500 फीट पर भी ट्रैफिक जाम!
उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटन की बढ़ती रफ्तार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि करीब 14,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित आदि कैलाश मार्ग पर भी वाहनों की लंबी कतार देखने को मिली।
हाल में भारी बर्फबारी के बाद आदि कैलाश और ओम पर्वत जाने वाले मार्ग पर करीब डेढ़ से दो किलोमीटर लंबा जाम लगने की जानकारी सामने आई। चारों ओर बर्फ के बीच वाहनों की कतारें दिखाई दीं। पिछले दिनों इस क्षेत्र में तीन से चार फीट तक बर्फ जमा हुई।
BRO ने जेसीबी की मदद से बर्फ हटाकर यातायात बहाल किया, लेकिन सड़क किनारे जमा बर्फ के कारण सड़क की चौड़ाई कम होने से यातायात प्रभावित हुआ।
तीन साल में तीन गुना से ज्यादा बढ़े श्रद्धालु
आदि कैलाश और ओम पर्वत की लोकप्रियता कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका अंदाजा आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वर्ष 2023 में यहां करीब 10,079 पर्यटक और श्रद्धालु पहुंचे थे। 2024 में संख्या बढ़कर 29,423, जबकि 2025 में 31,558 पहुंच गई। वर्ष 2026 में अब तक करीब 61,950 पर्यटक यहां पहुंच चुके हैं।
यानी कुछ ही वर्षों में धार्मिक पर्यटन का दबाव कई गुना बढ़ गया है।
अब असली चुनौती—पर्यटन बढ़े, लेकिन पहाड़ न टूटे
उत्तराखंड के सामने आज दो तस्वीरें एक साथ खड़ी हैं। एक तस्वीर में हाउस ऑफ हिमालयाज है, जहां पहाड़ की महिलाओं और किसानों के उत्पाद बाजार में अपनी पहचान बना रहे हैं। दूसरी तस्वीर में कैंची धाम से लेकर आदि कैलाश तक बढ़ती भीड़, जाम, कचरा, पानी, पार्किंग और पर्यावरण का दबाव है।
पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है, लेकिन इसके लिए कैरिंग कैपेसिटी आधारित पर्यटन नीति जरूरी दिखाई देती है। सवाल केवल यह नहीं कि पहाड़ों पर कितने पर्यटक पहुंच रहे हैं, सवाल यह भी है कि पहाड़ कितने पर्यटकों को सुरक्षित और टिकाऊ तरीके से संभाल सकते हैं।
यदि स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार देना विकास है, तो प्राकृतिक संसाधनों और पहाड़ों की क्षमता की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। उत्तराखंड के लिए आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही होगी—विकास की रफ्तार और हिमालय की सहनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
