उत्तराखंड रुद्रपुर देहरादून। उत्तराखंड में एक ओर ई-चालान के नाम पर साइबर ठगी रोकने के लिए यातायात पुलिस ने डिजिटल भुगतान की नई सुविधा शुरू की है, तो दूसरी ओर चमोली में आए 4.8 तीव्रता के भूकंप ने हिमालय के संवेदनशील भूगर्भीय क्षेत्र को लेकर वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एक तरफ आम नागरिकों को ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचाने की पहल है, तो दूसरी तरफ प्राकृतिक आपदा के संभावित खतरे से निपटने के लिए सुरक्षित भवन निर्माण, वैज्ञानिक निगरानी और जनजागरूकता की आवश्यकता सामने आई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड
दोनों घटनाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी का सही उपयोग आम जनता की सुरक्षा के लिए कितना महत्वपूर्ण है। साइबर अपराध से बचाव हो या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा का जोखिम, समय रहते सावधानी बरतना ही नुकसान कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
अब पेटीएम, फोनपे और गूगल पे से भर सकेंगे ई-चालान
ई-चालान के नाम पर साइबर ठगी करने वालों पर लगाम लगाने के लिए उत्तराखंड यातायात पुलिस ने महत्वपूर्ण पहल की है। ई-चालान पोर्टल को पेटीएम, फोनपे और गूगल पे जैसे प्रमुख डिजिटल भुगतान एप से जोड़ दिया गया है। इससे वाहन स्वामी अपने मोबाइल फोन के माध्यम से लंबित ट्रैफिक चालान की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे और संबंधित एप के जरिए भुगतान कर सकेंगे।
दरअसल, पिछले कुछ समय से साइबर अपराधी वाहन स्वामियों को उनके वाहन नंबर का हवाला देकर फर्जी चालान के संदेश भेज रहे हैं। इन संदेशों में दिए गए लिंक सरकारी ई-चालान पोर्टल की तरह दिखाई देते हैं। लोग संदेश को वास्तविक सरकारी सूचना समझकर लिंक खोल लेते हैं और इसी का फायदा उठाकर ठग उनकी बैंकिंग संबंधी जानकारी तथा निजी डेटा हासिल करने का प्रयास करते हैं।
इन घटनाओं को देखते हुए यातायात पुलिस ने ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जिससे लोगों को अनजान संदेशों में दिए गए लिंक पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अब वाहन स्वामी अपने मोबाइल में उपलब्ध भुगतान एप के ट्रैफिक चालान विकल्प में जाकर उत्तराखंड पुलिस का चयन कर सकते हैं। इसके बाद वाहन नंबर डालकर लंबित चालान की जानकारी देखी जा सकती है और उपलब्ध आधिकारिक भुगतान प्रक्रिया के माध्यम से राशि जमा की जा सकती है।
यातायात पुलिस के अनुसार, इस सुविधा के माध्यम से अब तक 572 चालानों का भुगतान किया जा चुका है। इससे पुलिस को 6 लाख 9 हजार 100 रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है। नई व्यवस्था से चालान जमा करने की प्रक्रिया आसान होने के साथ ही फर्जी भुगतान लिंक के जरिए होने वाली ठगी का जोखिम कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
इससे पहले चालान भुगतान के लिए कुछ थर्ड पार्टी एप का उपयोग करने पर अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ सकता था। नई सुविधा वाहन स्वामियों को भुगतान का एक और सुविधाजनक विकल्प उपलब्ध कराती है।
फर्जी लिंक पर क्लिक करते ही खाली हो सकता है बैंक खाता
साइबर अपराधियों की ठगी का तरीका बेहद शातिर होता है। वाहन नंबर और चालान का उल्लेख होने के कारण संदेश वास्तविक प्रतीत होता है। इसके साथ भेजे गए लिंक पर क्लिक करने के बाद उपयोगकर्ता को ऐसी वेबसाइट पर पहुंचाया जा सकता है, जो देखने में सरकारी पोर्टल जैसी होती है। इसके बाद बैंकिंग विवरण, ओटीपी या अन्य संवेदनशील जानकारी हासिल करके ठगी को अंजाम देने का प्रयास किया जाता है।
ऐसे में वाहन स्वामियों को सलाह दी जाती है कि किसी अनजान नंबर से आए चालान संबंधी संदेश पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। संदेश में दिए गए लिंक को खोलने के बजाय आधिकारिक ई-चालान पोर्टल या सत्यापित भुगतान एप का इस्तेमाल करें। किसी भी स्थिति में ओटीपी, बैंकिंग पासवर्ड या गोपनीय जानकारी साझा न करें।
यातायात पुलिस की यह पहल डिजिटल भुगतान को सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन नागरिकों की सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है। तकनीक सुविधा देती है, मगर उसका सुरक्षित इस्तेमाल करना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
चमोली में 4.8 तीव्रता के भूकंप ने बढ़ाई चिंता
इसी बीच चमोली में सोमवार रात आए 4.8 तीव्रता के भूकंप ने उत्तराखंड के संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज कर दी है। रात 10 बजकर 23 मिनट 12 सेकंड पर दर्ज इस भूकंप का क्षेत्र मेन सेंट्रल थ्रस्ट यानी एमसीटी की संरचनात्मक पट्टी के निकट बताया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, भूकंप की गहराई लगभग 10 किलोमीटर थी।
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. नरेश कुमार के अनुसार, हिमालय का यह क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। यहां धरती के भीतर होने वाली गतिविधियों और जमा तनाव की स्थिति को समझने के लिए निरंतर वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। उन्होंने भवन निर्माण के मानकों को सख्ती से लागू करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से यह स्पष्ट रहना चाहिए कि किसी एक भूकंप के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में कब, कहां और कितनी तीव्रता का बड़ा भूकंप आएगा। भूकंप की तीव्रता, गहराई और क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना महत्वपूर्ण संकेत हैं, लेकिन इनके आधार पर किसी बड़े भूकंप की निश्चित भविष्यवाणी संभव नहीं है।
1999 का चमोली भूकंप आज भी चेतावनी देता है
चमोली का मौजूदा भूकंप ऐसे व्यापक क्षेत्र में दर्ज हुआ है, जहां पहले भी विनाशकारी भूकंपीय गतिविधियां हो चुकी हैं। 29 मार्च 1999 को चमोली क्षेत्र में लगभग 6.6 तीव्रता का भूकंप आया था। इसका केंद्र चमोली-पिपलकोटी क्षेत्र के आसपास और गहराई लगभग 15 किलोमीटर बताई गई थी।
उस भूकंप में 100 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के घायल होने का उल्लेख विभिन्न रिकॉर्ड में मिलता है। हजारों मकानों को नुकसान पहुंचा था। चमोली, गोपेश्वर, नंदप्रयाग, पिपलकोटी और आसपास के क्षेत्रों में इमारतों के क्षतिग्रस्त होने के साथ भूस्खलन, चट्टानों के खिसकने, सड़कों के टूटने और जमीन में दरारें पड़ने जैसी घटनाएं सामने आई थीं।
वैज्ञानिक अध्ययनों में 1999 के भूकंप से हुई क्षति का संबंध एमसीटी के आसपास की भूगर्भीय संरचनाओं से जोड़ा गया है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में होने वाली नई भूकंपीय गतिविधियों का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जाता है।
2017 में भी कांपा था केंद्रीय हिमालय
6 फरवरी 2017 को रुद्रप्रयाग क्षेत्र में लगभग 5.8 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके झटके दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में महसूस किए गए थे। कुछ स्थानों पर मकानों की दीवारों और छतों में मामूली दरारों की खबरें आईं, हालांकि व्यापक स्तर पर जान-माल के नुकसान की सूचना नहीं थी।
वाडिया संस्थान के अध्ययनों में 2017 की भूकंपीय गतिविधि को केंद्रीय हिमालय की सक्रिय भूगर्भीय संरचनाओं से जोड़कर देखा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र लगातार भूगर्भीय हलचलों के प्रभाव में रहता है और इसकी निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भवन निर्माण के मानकों का पालन ही सबसे बड़ा बचाव
हिमालय का निर्माण भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के बीच लगातार जारी भूगर्भीय हलचलों से जुड़ा है। इन प्लेटों की परस्पर गति के कारण एमसीटी, मुनस्यारी थ्रस्ट और अन्य भूगर्भीय संरचनाओं में तनाव उत्पन्न होता रहता है। इसी कारण उत्तराखंड के अनेक क्षेत्र भूकंप के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में भूकंपरोधी भवन निर्माण, निर्माण कार्यों में निर्धारित मानकों का पालन, पुराने और कमजोर भवनों का सुरक्षा मूल्यांकन तथा आपदा के समय बचाव के लिए नियमित अभ्यास अत्यंत आवश्यक हैं। विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और सुरक्षा मानकों की अनदेखी बड़े खतरे का कारण बन सकती है।
प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय निकायों को जनजागरूकता बढ़ाने के साथ यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भवन निर्माण के नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें। स्कूलों, अस्पतालों, सरकारी कार्यालयों और भीड़भाड़ वाली इमारतों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सुरक्षा के लिए सतर्कता ही सबसे प्रभावी उपाय
ई-चालान के नाम पर होने वाली साइबर ठगी और चमोली में आया भूकंप दोनों अलग-अलग प्रकार की चुनौतियां हैं, लेकिन इनसे मिलने वाला संदेश एक ही है—सुरक्षा के लिए जागरूकता, तकनीक का सही इस्तेमाल और समय रहते तैयारी जरूरी है।
साइबर अपराध से बचने के लिए नागरिकों को केवल सत्यापित पोर्टल और भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल करना होगा, जबकि भूकंप के खतरे को कम करने के लिए वैज्ञानिक निगरानी, सुरक्षित निर्माण और आपदा प्रबंधन को मजबूत बनाना होगा।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में विकास की गति के साथ सुरक्षा के मानकों को भी प्राथमिकता देना जरूरी है। डिजिटल सुविधा तभी सार्थक होगी जब नागरिक ठगी से सुरक्षित रहें और विकास तभी टिकाऊ होगा जब भवन तथा बुनियादी ढांचा प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए।
