विशेष संपादकीय | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
जब एक बेटी की अस्मिता, उसके परिवार की पीड़ा और न्याय की पुकार राजनीतिक सत्ता के सामने कमजोर पड़ने लगे, तब सवाल केवल एक हत्याकांड का नहीं रहता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है। अंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक सत्ता, पुलिस, जांच एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
भारतीय राजनीति में जब भी चुनाव आते हैं, विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने पर इसे ‘डबल इंजन’ की ताकत बताया जाता है। दावा किया जाता है कि इससे विकास की रफ्तार तेज होगी, गरीबों को राहत मिलेगी, महिलाओं को सुरक्षा मिलेगी और जनता को त्वरित न्याय मिलेगा। लेकिन जब किसी गरीब परिवार की बेटी के साथ ऐसा जघन्य अपराध होता है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देती है, तब यही सवाल सामने खड़ा हो जाता है कि सत्ता की यह ताकत आखिर किसके काम आ रही है?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
अंकिता भंडारी हत्याकांड इसी सवाल का सबसे दर्दनाक उदाहरण है। देवभूमि उत्तराखंड की एक युवा बेटी की हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। अंकिता एक सामान्य परिवार से आती थी। उसने अपने भविष्य के सपने देखे थे, परिवार की उम्मीदों को पूरा करने की चाह रखी थी। लेकिन उसकी जिंदगी असमय समाप्त हो गई। उसके परिवार के लिए यह केवल बेटी को खोने का दुख नहीं, बल्कि उस न्याय की प्रतीक्षा भी है, जो आज तक सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में बनी हुई है।
वीआईपी कनेक्शन: सवाल गंभीर, जवाबदेही जरूरी
इस मामले में कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित ऑडियो, सार्वजनिक बयानों और परिवार की ओर से उठाई गई मांगों ने इस प्रकरण को और संवेदनशील बनाया। लोगों के मन में सवाल है कि आखिर वह वीआईपी कौन था, जिसका उल्लेख इस मामले से जुड़े आरोपों में किया गया? क्या जांच की हर महत्वपूर्ण कड़ी तक निष्पक्षता से पहुंचा गया? क्या जनता के सामने उन सवालों के स्पष्ट जवाब रखे गए, जिनका उत्तर परिवार और प्रदेश के लोग मांग रहे हैं?
लोकतंत्र में किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और उसका दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन यही सिद्धांत सत्ता में बैठे लोगों पर भी लागू होता है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति का नाम सामने आने पर जांच की गंभीरता कम नहीं होनी चाहिए। कानून की निष्पक्षता का अर्थ यही है कि गरीब और ताकतवर, दोनों के लिए एक ही कसौटी हो।
यदि किसी कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं, तो जांच एजेंसी को तथ्यों के आधार पर उनका उत्तर देना चाहिए। यदि कोई आरोप निराधार है, तो उसे भी साक्ष्यों के साथ स्पष्ट किया जाना चाहिए। संदेह का समाधान चुप्पी से नहीं, पारदर्शिता से होता है।
रिसॉर्ट पर बुलडोजर: सबूतों की सुरक्षा पर उठे सवाल
अंकिता हत्याकांड के बाद संबंधित रिसॉर्ट में हुई तोड़फोड़ भी सार्वजनिक बहस का बड़ा विषय बनी। सवाल उठा कि कार्रवाई किसके आदेश पर हुई, किस प्रक्रिया के तहत हुई और उस समय संभावित साक्ष्यों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए?
किसी भी आपराधिक मामले में घटनास्थल और उससे जुड़े भौतिक साक्ष्य जांच की रीढ़ होते हैं। यदि किसी स्थान पर तोड़फोड़ या बदलाव किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जांच के लिए जरूरी साक्ष्य नष्ट न हों। यह जिम्मेदारी केवल पुलिस या प्रशासन की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जो कानून के शासन का दावा करती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार से भी यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि घटनास्थल पर हुई कार्रवाई के संबंध में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और साक्ष्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था की गई थी। किसी भी सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि जनता के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास बनाए रखना भी है।
यदि किसी कार्रवाई को लेकर जनता के मन में संदेह पैदा हुआ है, तो उसका जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, तथ्यात्मक स्पष्टीकरण और निष्पक्ष जांच से दिया जाना चाहिए।
राज्यपाल का पद और संवैधानिक मर्यादा
इस प्रकरण में कथित वीआईपी को लेकर उठते सवालों के बीच किसी व्यक्ति की राज्यपाल पद पर नियुक्ति जैसे विषय पर भी सार्वजनिक बहस हुई है। यहां संवैधानिक मर्यादा और कानूनी तथ्यों को समझना आवश्यक है।
राज्यपाल का पद किसी राजनीतिक व्यक्ति को दिया जाने वाला सामान्य पद नहीं है। यह संविधान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण संस्था है, जिससे निष्पक्षता, गरिमा और सार्वजनिक विश्वास की अपेक्षा की जाती है। इसलिए यदि किसी नियुक्त व्यक्ति को लेकर कोई गंभीर आरोप या जांच संबंधी प्रश्न मौजूद हों, तो सरकार से पारदर्शिता की अपेक्षा और बढ़ जाती है।
हालांकि, किसी व्यक्ति के विरुद्ध जांच होने मात्र से उसकी नियुक्ति अपने आप अवैध नहीं हो जाती। इसी तरह यह दावा भी बिना कानूनी आधार के नहीं किया जाना चाहिए कि राज्यपाल बनते ही किसी व्यक्ति को हर प्रकार के आपराधिक मुकदमे से स्थायी सुरक्षा मिल जाती है। संविधान के अनुच्छेद 361 में राष्ट्रपति और राज्यपाल को उनके पद पर रहते हुए कुछ प्रकार की कानूनी कार्यवाहियों से संरक्षण दिया गया है। इस संरक्षण की सीमा और उसका प्रभाव विशिष्ट कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
यही कारण है कि किसी संवैधानिक पद पर नियुक्ति के प्रश्न को राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। यदि नियुक्ति के समय कोई प्रासंगिक तथ्य, जांच या कानूनी बाधा मौजूद थी, तो उसकी समीक्षा तथ्यों और संविधान के अनुरूप होनी चाहिए। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सार्वजनिक विश्वास और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई या नहीं।
डबल इंजन सरकार से जनता के पांच सवाल
आज जनता के सामने कई बुनियादी सवाल हैं।
पहला, अंकिता के परिवार को न्याय दिलाने के लिए जांच की प्रत्येक महत्वपूर्ण कड़ी का निष्पक्ष परीक्षण हुआ या नहीं?
दूसरा, कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर उठे सवालों का उत्तर साक्ष्यों के आधार पर दिया गया या नहीं?
तीसरा, रिसॉर्ट में हुई तोड़फोड़ और संभावित साक्ष्यों की सुरक्षा को लेकर जो प्रश्न उठे, उनका संतोषजनक स्पष्टीकरण सामने आया या नहीं?
चौथा, यदि किसी जांच या कानूनी प्रक्रिया में प्रभावशाली व्यक्तियों से संबंधित तथ्य सामने आते हैं, तो क्या वही मानक अपनाए जाएंगे जो किसी सामान्य नागरिक के मामले में अपनाए जाते हैं?
पांचवां, सरकार और जांच एजेंसियां परिवार की न्याय संबंधी मांगों पर कितनी पारदर्शिता से काम कर रही हैं?
इन सवालों को किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का मुद्दा बनाकर खारिज नहीं किया जा सकता। ये सवाल उस लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े हैं, जिसमें जनता सरकार चुनती है और सरकार से जवाब मांगने का अधिकार भी रखती है।
बेटी बचाओ का नारा और जमीनी हकीकत
देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और महिला सशक्तीकरण की योजनाओं का व्यापक प्रचार होता है। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, मंचों से बड़े-बड़े संकल्प लिए जाते हैं। लेकिन किसी बेटी के साथ जघन्य अपराध होने के बाद यदि उसका परिवार वर्षों तक सवालों के उत्तर तलाशता रहे, तो उन नारों की सार्थकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
महिला सुरक्षा का अर्थ केवल अपराध होने से पहले सावधानियां बरतना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि अपराध होने के बाद पीड़िता और उसके परिवार को सम्मान मिले, जांच निष्पक्ष हो, अभियोजन प्रभावी हो और न्यायालय में साक्ष्यों के आधार पर दोषियों को सजा मिले।
अंकिता भंडारी के मामले में न्याय की मांग किसी राजनीतिक दल के खिलाफ अभियान नहीं होनी चाहिए। यह उस सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा है, जिसके तहत किसी भी बेटी के साथ हुए अन्याय को गंभीरता से लिया जाता है। यदि सत्ता में बैठे लोगों से प्रश्न पूछना लोकतंत्र में गलत माना जाने लगे, तो जवाबदेही की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ जाएगी।
न्याय केवल फैसला नहीं, जनता का विश्वास भी है
लोकतंत्र की हत्या हमेशा संसद या विधानसभा में नहीं होती। कभी-कभी लोकतंत्र तब भी कमजोर होता है, जब जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच रही, जब प्रभावशाली लोगों के संबंध में उठे सवालों का उत्तर नहीं मिलता और जब न्याय की प्रक्रिया पर संदेह गहराने लगता है।
हालांकि, किसी मामले में राजनीतिक आरोपों या जनभावनाओं के आधार पर न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अदालतों का काम साक्ष्यों, गवाहों और कानून के आधार पर निर्णय देना है। जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे बिना दबाव के तथ्य जुटाएं और अभियोजन पक्ष उन तथ्यों को अदालत के सामने रखे।
अंकिता के परिवार को न्याय दिलाने का वास्तविक अर्थ यही होगा कि मामले की हर प्रासंगिक कड़ी की निष्पक्ष जांच हो, किसी दोषी को उसके प्रभाव या पद के कारण संरक्षण न मिले और किसी निर्दोष को बिना प्रमाण दोषी न ठहराया जाए।
सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसकी असली परीक्षा तब होती है जब मामला किसी सामान्य नागरिक के अधिकार, सम्मान और जीवन से जुड़ा हो। यदि ‘डबल इंजन’ सरकार जनता के विश्वास को मजबूत करना चाहती है, तो उसे सवालों से बचने के बजाय जवाबदेही का उदाहरण प्रस्तुत करना होगा।
अंतिम सवाल यही है: क्या अंकिता भंडारी के परिवार को ऐसा न्याय मिलेगा, जिस पर पूरा उत्तराखंड गर्व कर सके?
अंकिता अब लौटकर नहीं आएगी। उसके परिवार का खोया हुआ संसार भी पहले जैसा नहीं हो सकता। लेकिन न्याय की निष्पक्ष प्रक्रिया यह भरोसा जरूर दे सकती है कि किसी बेटी की जिंदगी और उसकी गरिमा सत्ता, प्रभाव या राजनीतिक समीकरणों से छोटी नहीं है।
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, पद बदलते रहते हैं और राजनीतिक समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं। लेकिन न्याय की विश्वसनीयता एक बार टूट जाए, तो उसे बहाल करने में वर्षों लग जाते हैं।
अंकिता भंडारी को न्याय केवल एक परिवार की मांग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नैतिक परीक्षा है। इस परीक्षा में सरकार, जांच एजेंसियों, अभियोजन और न्यायिक व्यवस्था की भूमिका इतिहास के सामने दर्ज होगी। जनता को भाषण नहीं, निष्पक्ष कार्रवाई चाहिए; आरोप-प्रत्यारोप नहीं, तथ्यों पर आधारित जवाब चाहिए और आश्वासन नहीं, न्याय की विश्वसनीय प्रक्रिया चाहिए।
यही लोकतंत्र की रक्षा है। यही एक बेटी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर
